जावेद अख्तर का कार्यक्रम स्थगित होने पर नागरिक संस्थाओं के सदस्य निराश, मुख्यमंत्री को पत्र लिखा

Author: Yogesh Kumar Sahu
UPDATED: Wed, 03 Sep 2025 09:58 PM
जावेद अख्तर का कार्यक्रम स्थगित होने पर नागरिक संस्थाओं के सदस्य निराश, मुख्यमंत्री को पत्र लिखा
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कोलकाता. मुस्लिम समाज के सदस्यों समेत नागरिक संस्थाओं के सदस्यों के एक समूह ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को पत्र लिखकर राज्य उर्दू अकादमी द्वारा शहर में प्रसिद्ध गीतकार जावेद अख्तर के एक कार्यक्रम को स्थगित करने के निर्णय पर निराशा व्यक्त की.

मुख्यमंत्री को दीदी कहकर संबोधित किये गए एक खुले पत्र में, प्रमुख हस्तियों ने पश्चिम बंगाल उर्दू अकादमी के निर्णय पर खेद व्यक्त किया और दावा किया कि “यह निर्णय स्पष्ट रूप से मुस्लिम धार्मिक संगठनों के विरोध के कारण लिया गया, जिन्होंने यह आपत्ति जताई थी कि जावेद अख्तर को आमंत्रित नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि वे नास्तिक हैं.”

अकादमी ने हालांकि 30 अगस्त से शुरू होने वाले चार दिवसीय कार्यक्रम को स्थगित करने के लिए अपरिहार्य परिस्थितियों का हवाला दिया था, तथा पटकथा लेखक को आमंत्रण वापस लेने के मुद्दे पर कोई प्रतिबद्धता नहीं जताई थी. मुदर पथेरिया, जीशान मजीद, तैय्यब ए. खान, जहीर अनवर, पलाश चतुर्वेदी और नवीन वोहरा सहित अन्य द्वारा हस्ताक्षरित पत्र में कहा गया है, “हकीकत में, पश्चिम बंगाल उर्दू अकादमी (जिसके नाम में कहीं भी ‘मुस्लिम’ शब्द नहीं है) ने कट्टरपंथियों को खुश करने के लिए झुकते हुए तुरंत ही अपना निमंत्रण वापस ले लिया.” हस्ताक्षरकर्ताओं ने बताया कि अकादमी का निर्णय “इस मान्यता के विपरीत है कि उर्दू सबकी भाषा है” और इसे किसी समुदाय की “विशेष संपत्ति” नहीं माना जाना चाहिए.

नागरिक संस्थाओं के सदस्यों ने यह भी दावा किया कि इस निर्णय से यह बात उजागर हो गई है कि किसी कवि (या किसी भी व्यक्ति) की धार्मिक प्रवृत्तियां उस विषय से कहीं अधिक महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं, जिस पर वह अपनी राय व्यक्त कर रहा है – भले ही वह विषय धर्म से असंबंधित ही क्यों न हो. पश्चिम बंगाल उर्दू अकादमी ने कुछ मुस्लिम समूहों के विरोध के बाद अख्तर के एक कार्यक्रम को स्थगित कर दिया है. मुस्लिम संगठनों ने दावा किया कि अख्तर की कुछ टिप्पणियों से समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंची है.

नागरिक संस्थाओं के सदस्यों ने पत्र में कहा, “जावेद को हिंदी सिनेमा और उर्दू विषय पर बोलना था, जिसका धर्म से कोई लेना-देना नहीं है.” उन्होंने पत्र में कहा, “निमंत्रण वापसी के इस शर्मनाक फैसले से उदारवादियों के अंतिम गढ़ के रूप में कोलकाता की छवि प्रभावित हुई है.” हस्ताक्षरकर्ताओं ने बनर्जी से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने का आग्रह किया. एक कार्यकर्ता मुदर पथेरिया ने ‘पीटीआई भाषा’ को बताया, “दो दिन पहले पत्र जारी होने के बाद से हमें अभी तक मुख्यमंत्री कार्यालय या अकादमी से कोई जवाब नहीं मिला है. मुझे आश्चर्य है कि उर्दू, एक भाषा के रूप में, केवल कुछ समूहों के धर्म से ही क्यों जुड़ी है.”

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