मौजूदा समय में शांति अभियान अभूतपूर्व जटिलताओं का सामना कर रहे हैं: सीआईएससी

Author: Yogesh Kumar Sahu
UPDATED: Thu, 23 Oct 2025 08:19 PM
मौजूदा समय में शांति अभियान अभूतपूर्व जटिलताओं का सामना कर रहे हैं: सीआईएससी
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नयी दिल्ली. एकीकृत रक्षा स्टाफ प्रमुख (सीआईएससी) एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित ने बृहस्पतिवार को कहा कि आधुनिक युद्ध तेजी से बहुआयामी और सीमाहीन होते जा रहे हैं तथा आजकल संघर्षों में संयुक्त रूप से देशों की सेनाएं, मिलिशिया और आतंकवादी समूह शामिल होते हैं, जिससे शांति अभियानों के लिए ”अभूतपूर्व जटिलताएं” पैदा हो जाती हैं.

नयी दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में व्याख्यान देते हुए एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित ने कहा कि इस बात पर मंथन करने की जरूरत है कि शांति स्थापना और अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून को आधुनिक वास्तविकताओं के अनुरूप कैसे ढाला जाए. उन्होंने कहा, ”हम वैश्विक भू-राजनीति में एक निर्णायक मोड़ पर खड़े हैं. अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की संरचना में गहरा बदलाव आ रहा है. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की व्यवस्था सामूहिक उत्तरदायित्व, साझा मानदंडों और मानवीय मूल्यों पर आधारित थी, लेकिन यह (व्यवस्था) अब अत्यधिक दबाव में है.” सीआईएससी ने रेखांकित किया कि दुनिया का लगभग एक-चौथाई हिस्सा संघर्ष प्रभावित है और आज दुनिया भर में 61 संघर्ष चल रहे हैं, जो 1946 के बाद से सबसे अधिक संख्या है.

”संघर्षरत विश्व में शांति स्थापना और मानवीय अनिवार्यता को आगे ब­ढ़ाना” विषय पर 23 और 24 अक्टूबर को दिल्ली स्थित रक्षा क्षेत्र से जुड़े ‘थिंक टैंक’ यूएसआई द्वारा संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना केंद्र (सीयूएनपीके) और अंतरराष्ट्रीय रेड क्रॉस समिति (आईसीआरसी) के सहयोग से ‘यूएसआई संयुक्त राष्ट्र वार्षिक फोरम’ का आयोजन किया जा रहा है.

एयर मार्शल दीक्षित ने कहा, ”हमें इस बात पर विचार करना चाहिए कि शांति स्थापना और अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून को आधुनिक वास्तविकताओं के अनुरूप कैसे ढालना चाहिए, तथा इस संघर्ष के बीच हमें मानवीय मूल्यों को कैसे कायम रखना चाहिए.” उन्होंने कहा कि इस मंच का विषय प्रासंगिक और सामयिक है, क्योंकि यह संयुक्त राष्ट्र की स्थापना की 80वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित किया जा रहा है. यह द्वितीय विश्व युद्ध के तुरंत बाद 24 अक्टूबर, 1945 को अस्तित्व में आया था.

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, नागरिकों की सुरक्षा, युद्ध की भयावहता को कम करने और वैश्विक स्थिरता बनाए रखने के लिए संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई थी और जिनेवा संधि अस्तित्व में आई थी. एयर मार्शल दीक्षित ने कहा कि इसमें गैर-लड़ाकों की सुरक्षा और अंधाधुंध हिंसा के निषेध जैसे सिद्धांतों को संहिताबद्ध किया गया है. उन्होंने कहा कि शीतयुद्ध के आरंभिक दौर में शांति मिशन की संख्या अपेक्षाकृत सीमित थी. उन्होंने पश्चिम एशिया में शांति स्थापना के लिए 1948 में स्थापित यूएनटीएसओ (संयुक्त राष्ट्र युद्धविराम पर्यवेक्षण संगठन) तथा 1953 में कोरिया में मिशन का उदाहरण दिया.

सीआईएससी ने कहा, ”आईएचएल के आधारभूत सिद्धांत अब भी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन समकालीन संघर्षों की जटिल प्रकृति उनके कार्यान्वयन के लिए मुश्किल पैदा करती है.” अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून (आईएचएल) नियमों के एक समूह को संर्दिभत करता है, जो मानवीय कारणों से सशस्त्र संघर्ष के प्रभावों को सीमित करने का प्रयास करता है.

एयर मार्शल दीक्षित ने कहा, ”आधुनिक युद्ध तेजी से बहुआयामी और सीमाहीन होते जा रहे हैं. आजकल के संघर्षों में अक्सर देश की सेनाएं, मिलिशिया, विद्रोही, आतंकवादी समूह, निजी सैन्य कंपनियों और छद्म किरदार संयुक्त रूप से संलिप्त होते हैं.” उन्होंने कहा कि ये समूह आमतौर पर खुली सीमाओं और अस्थिर भूभागों में सक्रिय होते हैं. उदाहरण के लिए, पश्चिम एशिया में, गैर-सरकारी तत्व नियमित सेनाओं के साथ या उनके विरुद्ध लड़ते हैं.

सीआईएससी ने कहा, ”इसकी प्रमुख विशेषताओं में बहुध्रुवीय और गैर-रैखिक युद्धक्षेत्र शामिल हैं, युद्ध अब ‘देश बनाम देश’ नहीं रह गए हैं, बल्कि सशस्त्र समूहों और मिलिशिया का एक नेटवर्क एक ही क्षेत्र में शामिल हो सकता है, जैसा कि हमने लीबिया और सीरिया के गृह युद्धों में देखा है.” एयर मार्शल दीक्षित ने अपने संबोधन में आधुनिक संघर्षों में असैन्य आबादी पर ब­ढ़ते खतरों को रेखांकित किया.
उन्होंने कहा, ”सशस्त्र बलों या अन्य किरदारों द्वारा रणनीति के रूप में नागरिक बुनियादी ढांचे को निशाना बनाना, नागरिकों को ढाल के रूप में इस्तेमाल करना या उन्हें हथियार बनाना अब आम बात हो गई है.” शीर्ष सैन्य अधिकारी ने रेखांकित किया कि हालांकि अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के तहत ऐसा करना निषिद्ध है.

सीआईएससी ने कहा कि गाजा, सूडान और अन्य स्थानों पर इस तरह के संरक्षण का अक्सर उल्लंघन किया जाता है. उन्होंने कहा कि आधुनिक युद्ध लंबे समय तक चलते हैं और ”गहरे मानवीय संकट” पैदा करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप विस्थापन, खाद्य असुरक्षा और आघात समय के साथ ब­ढ़ते जाते हैं. सीआईएससी ने अपने इस कथन के समर्थन में सूडान और गाजा में संघर्ष के मद्देनजर बड़ी संख्या में लोगों की मृत्यु और विस्थापन का हवाला दिया.

सीआईएससी ने जोर देकर कहा कि इन चुनौतियों के बावजूद, ”संयुक्त राष्ट्र जैसी बहुपक्षीय संस्थाएं अपरिहार्य बनी हुई हैं.” उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र शांति सेना ने कई देशों को गृहयुद्ध या तानाशाही से उबरने में मदद की है. जिन क्षेत्रों में शांति सैनिक तैनात हैं, वहां नागरिकों की मृत्यु दर कम है और शांति समझौते ज़्यादा स्थिर हैं. एयर मार्शल ने कहा, ”फिर भी शांति अभियान समुदाय को अभूतपूर्व जटिलताओं का सामना करना पड़ रहा है. दुनिया भर में कई स्थानों पर सशस्त्र संघर्ष हो रहे हैं, और शांति अभियान अभूतपूर्व जटिलताओं का सामना कर रहे हैं, जिनमें गैर-राज्यीय तत्व, छद्म युद्ध, सीमित संसाधन और असैन्य आबादी पर ब­ढ़ता खतरा शामिल है.”

उन्होंने कहा कि शांति सैनिकों को नए खतरों, संर्विधत विस्फोटक उपकरण (आईईडी), घात लगाकर किए गए हमलों, ड्रोन से निशाना बनाया जा रहा है, जिससे यह चिंता उत्पन्न हो रही है कि अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए नागरिकों की सुरक्षा कैसे की जाए.
कार्यक्रम में संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियान विभाग के अवर महासचिव (शांति अभियान) जीन-पियरे लैक्रोइक्स का फोरम में रिकॉर्ड किया गया वीडियो संदेश सुनाया गया.

लैक्रोइक्स ने कहा, ”हम ऐसे समय में मिल रहे हैं जब वैश्विक परिदृश्य में अभूतपूर्व संघर्ष और ध्रुवीकरण है. उप्साला संघर्ष डेटा कार्यक्रम के अनुसार, संघर्ष चिंताजनक स्तर तक ब­ढ़ गया है और 2024 में 61 सक्रिय संघर्ष हो रहे थे, जो 1946 के बाद से सबसे अधिक संख्या है.” उन्होंने कहा, ” हमें बदलती वैश्विक व्यवस्था और उभरते खतरों, अंतरराष्ट्रीय अपराध से लेकर डिजिटल तकनीकों के इस्तेमाल और जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न ब­ढ़ते जोखिम के अनुरूप शांति स्थापना को अपनाना होगा. हमें मानवतावाद को भी अपने केंद्र में रखना होगा.” लैक्रोइक्स ने यह भी कहा कि संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना में भारत के ”उल्लेखनीय योगदान” को विश्व निकाय स्वीकार करता है.

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