तमिलनाडु विधानसभा सत्र 18 जून से होगा शुरू, वंदे मातरम बनाम तमिल वाझथु पर रहेगी नजर

Author: Nandkishoryadav
UPDATED: Mon, 08 Jun 2026 01:45 PM
तमिलनाडु विधानसभा सत्र 18 जून से होगा शुरू, वंदे मातरम बनाम तमिल वाझथु पर रहेगी नजर
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तमिलनाडु: तमिलनाडु विधानसभा का सत्र 18 जून को शुरू होगा। इसमें राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर सत्र के उद्घाटन के मौके पर सदस्यों को संबोधित करेंगे। इसके साथ ही ध्यान इस बात पर केंद्रित है कि क्या कार्यवाही बिना किसी विवाद के शुरू होगी। या लोक भवन और राज्य सरकार के बीच आधिकारिक समारोहों में वंदे मातरम, राष्ट्रगान और तमिल वाझथु के गायन को लेकर एक नया टकराव देखने को मिलेगा।

राज्य में एक संवेदनशील घटना बन गई
जो कभी एक सामान्य संवैधानिक औपचारिकता मानी जाती थी। वह हाल के वर्षों में तमिलनाडु में एक राजनीतिक रूप से संवेदनशील घटना बन गई है। पूर्व राज्यपाल आर.एन. रवि के कार्यकाल के दौरान, विधानसभा में दिए गए भाषणों ने अक्सर विवाद पैदा किया। खासकर राष्ट्रीय प्रतीकों के उपयोग और औपचारिक प्रोटोकॉल से संबंधित मुद्दों पर। रवि की एक चिंता यह भी थी कि आधिकारिक कार्यक्रमों और विधानसभा की कार्यवाही के दौरान राष्ट्रगान किस तरह गाया जाता है। मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली टीवीके सरकार में राजकीय समारोहों में औपचारिक गीतों के क्रम को लेकर असहमति के बाद यह मुद्दा फिर से सामने आया है।

विपक्षी दलों ने क्यों आलोचना की
10 मई को विजय और उनके मंत्रियों के शपथ ग्रहण समारोह में वंदे मातरम और राष्ट्रगान के बाद ‘तमिलथाई वाझथु’ गाया गया। लोक भवन में आयोजित मंत्रिमंडल विस्तार समारोह में भी इसी प्रकार की परंपरा का पालन किया गया। इस व्यवस्था की विपक्षी दलों, विशेष रूप से डीएमके और उसके कुछ सहयोगियों ने आलोचना की। उन्होंने तर्क दिया कि आधिकारिक राजकीय समारोहों की शुरुआत में थमिझथाई वाझथु को अपना पारंपरिक स्थान बनाए रखना चाहिए।

केरल में क्या हुआ था?

विपक्षी नेताओं ने सरकार पर राज्य के राष्ट्रगान को हाशिए पर रखकर तमिल सांस्कृतिक पहचान को कमजोर करने का आरोप लगाया है। पड़ोसी राज्य केरल में हाल के घटनाक्रमों ने 18 जून की कार्यवाही के संभावित परिणामों को लेकर लोगों की दिलचस्पी और बढ़ा दी है। मई में केरल विधानसभा के उद्घाटन सत्र के दौरान, राज्यपाल के भाषण से पहले और बाद में वंदे मातरम का केवल एक छोटा संस्करण बजाया गया था, जिसके कारण कथित तौर पर अर्लेकर ने आपत्ति जताई थी, जो केरल के राज्यपाल के रूप में भी कार्यरत हैं।

केरल के मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशान ने इसका बचाव करते हुए कहा कि कोई भी कानून वंदे मातरम के पहले पाठ को अनिवार्य नहीं बनाता है। राज्य ने अपनी स्थापित परंपरा का पालन किया है। आधव अर्जुन समेत तमिलनाडु के मंत्रियों ने कहा है कि राज्य सरकार ने इस मुद्दे को राज्यपाल के समक्ष पहले ही उठा लिया है। जनवरी में जारी केंद्रीय गृह मंत्रालय के परिपत्र के संबंध में कानूनी विकल्पों की जांच कर रही है।

पीएम के सामने भी उठाया यह मुद्दा

सरकार का कहना है कि परिपत्र में ‘तमिलथाई वाझथु’ जैसे राजकीय आह्वान गीतों को आधिकारिक समारोहों के आरंभ में गाए जाने पर कोई रोक नहीं है। मुख्यमंत्री विजय ने 27 मई को नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हुई मुलाकात के दौरान भी यह मुद्दा उठाया था। खबरों के अनुसार, मुख्यमंत्री विजय ने केंद्र सरकार के दिशानिर्देशों में स्पष्टीकरण या संशोधन की मांग की ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि ‘तमिलथाई वाझथु’ सहित राजकीय आह्वान गीतों को सरकारी कार्यक्रमों में उनका पारंपरिक स्थान मिलता रहे।

अब इस पृष्ठभूमि में, 18 जून को राज्यपाल के संबोधन से काफी ध्यान आकर्षित होने की उम्मीद है। इसस ना केवल सरकार के विधायी एजेंडे के लिए बल्कि इस बात के संकेतों के लिए भी कि क्या प्रोटोकॉल विवाद का समाधान हो गया है। या यह लोक भवन और राज्य सरकार के बीच एक और दौर के टकराव को जन्म देने वाला है।

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