नयी दिल्ली. सरकार ने शुक्रवार को दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश यशवंत वर्मा को इलाहाबाद उच्च न्यायालय स्थानांतरित करने की अधिसूचना जारी कर दी. न्यायमूर्ति वर्मा के दिल्ली स्थित आधिकारिक आवास से कथित तौर पर भारी मात्रा में नकदी मिलने को लेकर उत्पन्न विवाद के बीच विधि मंत्रालय ने यह अधिसूचना जारी की है.
उच्चतम न्यायालय के कॉलेजियम ने सोमवार को न्यायमूर्ति वर्मा के स्थानांतरण की सिफारिश करते हुए कहा था कि यह कदम 14 मार्च को होली की रात आग लगने की घटना के बाद उनके आवास से कथित तौर पर नकदी मिलने के संबंध में शीर्ष अदालत द्वारा दिये गये आंतरिक जांच के आदेश से अलग है.
प्रधान न्यायाधीश ने घटना के बाद दिल्ली उच्च न्यायालय को न्यायमूर्ति वर्मा से न्यायिक कार्य वापस लेने का निर्देश दिया था. उच्चतम न्यायालय ने 21 मार्च को कहा था कि दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय ने न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ आंतरिक जांच शुरू की है और न्यायाधीश को स्थानांतरित करने का प्रस्ताव इससे अलग है.
बताया गया कि न्यायमूर्ति उपाध्याय ने 20 मार्च को उच्चतम न्यायालय के कोलेजियम की बैठक से पहले ही जांच शुरू कर दी थी. प्रधान न्यायाधीश ने 22 मार्च को मुख्य न्यायाधीश उपाध्याय की जांच रिपोर्ट शीर्ष अदालत की वेबसाइट पर अपलोड कर दी और आंतरिक जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की. इसके दो दिन बाद उच्चतम न्यायालय के कॉलेजियम ने केंद्र से न्यायमूर्ति वर्मा के तबादले की औपचारिक सिफारिश की.
उच्चतम न्यायालय द्वारा सोमवार को दिये गए प्रस्ताव में कहा गया, ”उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम ने 20 और 24 मार्च, 2025 को हुई अपनी बैठकों में दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वापस भेजने की सिफारिश की है.” अगले दिन, उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित तीन सदस्यीय समिति ने न्यायमूर्ति वर्मा के आवास का दौरा किया और मामले की जांच शुरू की.
न्यायमूर्ति वर्मा ने सभी आरोपों का खंडन किया और कहा कि उनके या उनके परिवार के किसी भी सदस्य द्वारा बताई जा रही जगह पर कभी भी कोई नकदी नहीं रखी गई. इससे पहले दिन में उच्चतम न्यायालय ने उस जनहित याचिका को ”असामयिक” बताते हुए खारिज कर दिया, जिसमें दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के सरकारी आवास से कथित तौर पर बड़ी मात्रा में नकदी मिलने के मामले में दिल्ली पुलिस को प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया था.
न्यायमूर्ति अभय एस ओका और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइंया की पीठ ने कहा कि आंतरिक जांच चल रही है और निष्कर्ष आने के बाद प्रधान न्यायाधीश के सामने कई विकल्प खुले होंगे. इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के सदस्य न्यायमूर्ति वर्मा को इलाहाबाद उच्च न्यायालय वापस भेजने की कॉलेजियम की सिफारिश का विरोध कर रहे हैं. प्रदर्शनकारी वकीलों ने बृहस्पतिवार को दिल्ली में प्रधान न्यायाधीश खन्ना से मुलाकात की.
इसके अलावा, सरकार ने अलग से दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश चंद्र धारी सिंह को इलाहाबाद उच्च न्यायालय वापस भेजने की अधिसूचना जारी की. कॉलेजियम ने पिछले वर्ष नवंबर में न्यायमूर्ति सिंह के तबादले की सिफारिश की थी. एक अन्य आदेश में न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा को उड़ीसा उच्च न्यायालय से इलाहाबाद उच्च न्यायालय स्थानांतरित कर दिया गया. उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम ने इस महीने की शुरुआत में उनके स्थानांतरण की सिफारिश की थी.
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सीजे से न्यायमूर्ति वर्मा को न्यायिक कार्य नहीं देने को कहा गया है
उच्चतम न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से शुक्रवार को कहा कि नकदी बरामदगी मामले में घिरे न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा को कार्यभार संभालने के बाद फिलहाल कोई न्यायिक कार्य न सौंपा जाए. उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम ने 24 मार्च को न्यायमूर्ति वर्मा को उनकी मूल अदालत ‘इलाहाबाद उच्च न्यायालय’ में वापस भेजने की सिफारिश की थी. इससे पहले दिल्ली उच्च न्यायालय ने प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) के निर्देश के बाद न्यायमूर्ति वर्मा से न्यायिक कार्य वापस ले लिया था.
उच्चतम न्यायालय की ओर से शुक्रवार को जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया, ”इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से कहा गया है कि न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा जब वहां कार्यभार संभालेंगे तब उन्हें फिलहाल कोई न्यायिक कार्य नहीं सौंपा जाए.” यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि सरकार ने शुक्रवार को दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश यशवंत वर्मा को इलाहाबाद स्थानांतरित करने की अधिसूचना जारी की.
यह आदेश राष्ट्रीय राजधानी में न्यायाधीश के सरकारी आवास में 14 मार्च की रात आग लगने के बाद वहां से कथित तौर पर नकदी की जली हुई गड्डियां मिलने की घटना के बीच आया है. विधि मंत्रालय ने एक अधिसूचना जारी कर उनके स्थानांतरण की घोषणा की. उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम ने न्यायमूर्ति वर्मा के तबादले की सिफारिश सरकार से करते हुए कहा था कि यह कदम 14 मार्च की रात लगभग 11.35 बजे आग लगने की घटना के बाद न्यायाधीश के लुटियंस दिल्ली स्थित आवास से कथित तौर पर नकदी मिलने पर शीर्ष अदालत द्वारा आदेशित आंतरिक जांच से अलग है.
इस बीच, उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को उस जनहित याचिका को ”असामयिक” बताते हुए खारिज कर दिया, जिसमें दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के सरकारी आवास से कथित तौर पर बड़ी मात्रा में नकदी मिलने के मामले में दिल्ली पुलिस को प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया था.
प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना ने 22 मार्च को आरोपों की आंतरिक जांच करने के लिए तीन-सदस्यीय समिति गठित की और दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश डी के उपाध्याय की जांच रिपोर्ट को शीर्ष अदालत की वेबसाइट पर अपलोड करने का निर्णय लिया. इसमें कथित रूप से भारी मात्रा में नकदी मिलने की तस्वीरें और वीडियो शामिल थे. न्यायमूर्ति वर्मा ने किसी भी तरह के आरोप को खारिज कर दिया और कहा कि उनके या उनके परिवार के किसी सदस्य द्वारा स्टोर रूम में कभी भी नकदी नहीं रखी गई.