सऊदी अरब में बांग्लादेश के दंपति का सर कलम करके मौत की सजा देने के बाद उनके शव बांग्लादेश पहुंच गए जिसका अंतिम संस्कार कर दिया गया। दूसरी ओर कल बांग्लादेश में सऊदी अरब के इस कृत्य के खिलाफ देशभर में प्रदर्शन हुए हैं और दुनिया भर में इसकी आलोचना की जा रही है।
आरोप है कि यह पति-पत्नी मक्का की एक मस्जिद में अश्लिल हरकत नहीं कर रहे थे बल्कि एक दूसरे का चुंबन ले रहे थे, रील बना रहे थे ! इसी गुनाह पर दोनों का तलवार से सर धड़ से अलग कर दिया गया ! इसके बाद बांग्लादेश में सऊदी अरबिया सरकार के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं तथा विश्वभर में ऐसी सजा का विरोध किया जा रहा है।
असल में, सऊदी आंतरिक मंत्रालय की ओर से ‘सऊदी प्रेस एजेंसी’ के आधिकारिक बयान में केवल यह कहा गया कि उन्हें एक मस्जिद के अंदर एक गंभीर “अश्लील/अनैतिक कृत्य” (फ़ाहिशा – जिसका आमतौर पर मतलब यौन कृत्य या व्यभिचार होता है) का दोषी पाया गया था, जिससे मस्जिद की धार्मिक पवित्रता का गंभीर उल्लंघन हुआ।
मृतक व्यक्ति के परिवार ने बांग्लादेशी मीडिया को बताया कि वह अविवाहित था, और वे उस महिला को नहीं जानते थे। असल में, ये दोनों सऊदी अरब में रहने वाले प्रवासी मजदूर थे, जिन्हें एक साल से भी पहले गिरफ्तार कर लिया गया था।
एक रिपोर्ट के अनुसार, जेद्दा में बांग्लादेश के महावाणिज्य दूतावास (कॉन्सुलट जनरल) को इन सजाओं के बारे में पहले से कोई सूचना नहीं दी गई थी। इसके बाद, बांग्लादेश सरकार ने सऊदी अधिकारियों से इस मामले के बारे में औपचारिक स्पष्टीकरण और न्यायिक विवरण मांगा है।
लेकिन सऊदी अरब में क़ानून सबके लिए बराबर है, चाहे शहज़ादा हो या आम आदमी!
पहला वाक़िआ 1977
19 साल की शहज़ादी मिशाल बिन्त फ़हद को तालीम के लिए बेरूत (लेबनान) भेजा गया। वहाँ सऊदी सफ़ीर के भतीजे ख़ालिद अश्शाएर से उसका ताल्लुक़ क़ायम हो गया। वापस आने के बाद भी वे छिप-छिपकर मिलते रहे। जब शाही ख़ानदान को ख़बर हुई, तो दोनों जेद्दा एयरपोर्ट से भागने की कोशिश में पकड़े गए। शहज़ादी मर्दाना लिबास में थी। अदालत में दोनों ने अपने जुर्म का ख़ुद एतिराफ़ किया। 15 जुलाई 1977 को दोनों को जेद्दा में सरेआम सज़ा-ए-मौत दे दी गई।
दूसरा वाक़िआ 2012
दिसंबर 2012 में रियाद के क़रीब अल-समामा के रेगिस्तानी कैंप में झगड़ा हुआ। शहज़ादा तुर्की बिन सऊद ने ग़ुस्से में अपने ही दोस्त आदिल अल-मुहैमिद को गोली मारकर क़त्ल कर दिया। आदिल एक आम और ग़रीब ख़ानदान से था। शाही ख़ानदान ने ख़ून-बहा की भारी रक़म पेश की, ख़ुद बादशाह की तरफ़ से भी माफ़ी माँगी गई, मगर आदिल के घरवाले इंसाफ़ पर डटे रहे। आख़िरकार 18 अक्टूबर 2016 को शहज़ादा तुर्की को भी सरेआम सज़ा-ए-मौत दे दी गई।