कांग्रेस अपना आधार खो चुकी, लगातार गिरावट हो रही : सिंधिया

Author: Yogesh Kumar Sahu
UPDATED: Thu, 07 Nov 2024 09:13 PM
कांग्रेस अपना आधार खो चुकी, लगातार गिरावट हो रही : सिंधिया
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नयी दिल्ली. केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा कि कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व का जनता से संपर्क टूट गया है और यह अपना आधार खो चुकी है. सिंधिया ने 2020 में कांग्रेस छोड़कर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सदस्यता ले ली थी. उन्होंने ”पीटीआई-भाषा’ के साथ एक साक्षात्कार में कहा, ”मुझे लगता है कि कांग्रेस पार्टी अपना आधार खो चुकी है. इस बारे में कोई  बहस की बात ही नहीं है.” सिंधिया से पूछा गया था कि क्या अप्रैल-मई में हुए आम चुनाव में अपेक्षा से बेहतर प्रदर्शन करने के बाद अब कांग्रेस पार्टी की गति कमजोर पड़ गई है.

केंद्रीय संचार और पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्री ने उत्तर में कहा, ”मैं आपके साथ बिल्कुल स्पष्ट बात करता हूं कि मेरे पास कांग्रेस पार्टी को लेकर कोई मूल्यांकन नहीं है. मेरा मानना है कि कांग्रेस पार्टी लगातार गिरावट की स्थिति में है और मुझे लगता है कि इसके तीन कारण हैं. मुझे लगता है कि कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व का संपर्क टूट चुका है….” उन्होंने कहा, ”जनता से उसका संपर्क टूट चुका है और मुझे लगता है कि भारत के दृष्टिकोण के संबंध में भी कांग्रेस का संपर्क टूट चुका है. और आप जब इन तीनों विशेषताओं को खो देते हैं तो आप भारत की जनता का विश्वास खो देते हैं और आज कांग्रेस पार्टी का यही हाल है.”

सिंधिया ने हालांकि कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को लेकर कोई सीधी टिप्पणी नहीं की और कहा कि वह ”किसी एक व्यक्ति को लेकर किसी निर्णय पर नहीं पहुंच सकते.” उन्होंने कहा, ”मुझे लगता है कि हममें से हर एक को अपना भाग्य और अपनी जगह खुद बनानी होगी, और मुझे लगता है कि जीवन में आप जो करना चाहते हैं, उसकी सकारात्मकता पर ध्यान केंद्रित करना महत्वपूर्ण है, और मैं भी अपने जीवन में ऐसा करना चाहूंगा.” सिंधिया ने कहा कि मानव संसाधन मूल्यांकन निर्णय लेने का एक अति महत्वपूर्ण कारक है जो किसी संस्था की सफलता निर्धारित करता है.

उन्होंने कहा, ”कांग्रेस ने उन लोगों से नेतृत्व के गुणों को अलग करके देखने की अपनी क्षमता खो दी है, जिनमें ये गुण नहीं हैं.” केंद्रीय मंत्री के अनुसार, ”मानव संसाधन का मूल्यांकन किसी भी उद्यम की सफलता में सबसे महत्वपूर्ण निर्णय लेने वाले कारकों में से एक है, चाहे वह एक बहुराष्ट्रीय निगम हो, भारत में कोई कंपनी हो, या कोई राजनीतिक दल हो.” मार्च 2020 में जब सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ी थी, तो कहा गया था कि वह पार्टी द्वारा अपने घोषणापत्र के अनुसार मध्यप्रदेश के लोगों से किए गए वादे से मुकरने से दुखी हैं, जिसके कारण उन्हें युवाओं और किसानों की आलोचना का सामना करना पड़ा. राज्य में नेतृत्व की भूमिका के लिए नजरअंदाज किए जाने को भी उनके पार्टी छोड़ने की वजह बताया गया था.

उन्होंने साक्षात्कार में कहा, ”जो लोग आपके उद्यम का हिस्सा होते हैं, उनकी गुणवत्ता महत्वपूर्ण है. क्योंकि अंत में वही परिणाम दिलाता है.” सिंधिया ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत का विश्वास जताते हुए कहा कि हरियाणा विधानसभा चुनाव की तरह ही पार्टी को जीत मिलेगी.

उन्होंने कहा, ”जहां तक ??महाराष्ट्र का सवाल है, यह एक ऐसा राज्य है जिससे मैं अत्यंत भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ हूं, क्योंकि मैं मूल रूप से उसी राज्य से आता हूं. मैंने उस राज्य में बहुत समय बिताया है, और मुझे पूरा विश्वास है कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में भाजपा निश्चित रूप से इस चुनाव में एक बार फिर लोगों के दिलों में अपनी जगह बनाएगी. इसके परिणामों पर इस महीने की 23 तारीख को आप और मैं बैठकर चर्चा करेंगे.” अपने पिता और नौ बार लोकसभा सदस्य रहे माधवराव सिंधिया की 2001 में एक विमान दुर्घटना में मृत्यु होने के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने राजनीति में प्रवेश किया था.

सिंधिया से जब उनकी राजनीतिक आकांक्षा विशेष रूप से मध्य प्रदेश को लेकर, के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि उनके पिता और दादी विजयाराजे सिंधिया ने उन्हें बहुत कम उम्र में ही सिखा दिया था कि उनका लक्ष्य राजनीति नहीं बल्कि जनसेवा होना चाहिए और राजनीति केवल लक्ष्य को पूरा करने का एक माध्यम होनी चाहिए.

उन्होंने कहा, ”यदि आप इसे उस सीमा में परिभाषित करते हैं, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कहां बैठे हैं या कहां नहीं. मायने यह रखता है कि क्या आप लोगों की सेवा कर रहे हैं? क्या आप उनकी भलाई के लिए काम कर रहे हैं? और यदि यह आपका जुनून है, तो यह किसी भी रूप में सामने आ सकता है. मेरी दादी ने अपने जीवन में, मेरे पिता ने अपने जीवन में, और मैंने अपने जीवन में कभी किसी पद की लालसा नहीं की.” हार्वर्ड विश्वविद्यालय से स्नातक और स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय से एमबीए की डिग्री प्राप्त करने वाले सिंधिया राजनीति में प्रवेश करने से पहले मॉर्गन स्टेनली में निवेश बैंकर के रूप में काम करते थे. उन्होंने कहा कि उनके पहले के जीवन और जनसेवा के बीच कोई तुलना नहीं की जा सकती.

सिंधिया ने कहा, ”कोई तुलना ही नहीं है. जनसेवा के क्षेत्र में यदि आप एक भी व्यक्ति के जीवन को छू सकें तो आपकी आत्मा को जो संतोष मिलता है उसकी तुलना किसी भी मूर्त भौतिक चीज से नहीं की जा सकती.” केंद्रीय मंत्री से जब पूछा गया कि क्या उनके पुत्र महाआर्यमन सिंधिया उनकी विरासत को आगे बढ़ाएंगे तो उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि अपने बेटे का भविष्य तय करने का उन्हें कोई अधिकार है.

उन्होंने कहा, ”मेरा मानना है कि आपका भाग्य आप खुद बनाते हैं. मैं यह नहीं मानता कि चूंकि आप एक अभिभावक हैं, इसलिए आपको यह तय करने का अधिकार है कि आपके बच्चे का भविष्य क्या हो. हर इंसान को अपने कर्म करने होते हैं और उसे अपना रास्ता तय करना होता है. हम माता-पिता के रूप में केवल वही काम कर सकते हैं जो हमें ईश्वर ने सौंपा है, यानी यह सुनिश्चित करना कि हम बच्चों में अच्छे मूल्यों का संचार करें. हम उन्हें दयालु और सहानुभूतिपूर्ण बनाते हैं. हम उन्हें शिक्षित करते हैं और बाकी सब कुछ उन्हें खुद तय करना होता है.”

सिंधिया ने किया राहुल पर हमला, कांग्रेस ने इतिहास का हवाला देकर किया पलटवार

कांग्रेस ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के एक लेख को लेकर केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया द्वारा किए गए हमले के बाद, सिंधिया राजघराने से जुड़े इतिहास का हवाला देते हुए बृहस्पतिवार को दावा किया कि सिंधिया परिवार ने आमतौर पर अंग्रेजी हुकूमत के साथ सहयोग की नीति अपनाई थी.

पार्टी के मीडिया विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा ने यह भी कहा कि इतिहास, झूठी मनगढ.ंत बातों के सहारे जीने के लिए नहीं, बल्कि सबक लेकर आगे बढ.ने के लिए प्रेरित करता है. राहुल गांधी ने बुधवार को अंग्रेजी दैनिक ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में लिखे एक लेख में कहा था कि ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ भले ही बहुत पहले खत्म हो गई हो, लेकिन उसने जो डर पैदा किया था, वह आज फिर से दिखाई देने लगा है और एकाधिकारवादियों की एक नयी पीढ.ी ने उसकी जगह ले ली है. इसमें उन्होंने कुछ ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य का उल्लेख भी किया था.

उनके इस लेख का जिक्र करते हुए सिंधिया ने बुधवार को सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, ”नफरत बेचने वालों को भारतीय गौरव और इतिहास पर व्याख्यान देने का कोई अधिकार नहीं है. भारत की समृद्ध विरासत के बारे में उनकी (राहुल की) अज्ञानता और उनकी औपनिवेशिक मानसिकता ने सभी सीमाएं पार कर ली हैं.”

उन्होंने कहा, ”यदि आप राष्ट्र के ‘उत्थान’ का दावा करते हैं, तो भारत माता का अपमान करना बंद करें और महादजी सिंधिया, युवराज बीर टिकेंद्रजीत, कित्तूर चेन्नम्मा और रानी वेलु नचियार जैसे सच्चे भारतीय नायकों के बारे में जानें, जिन्होंने हमारी आजादी के लिए जमकर लड़ाई लड़ी.” खेड़ा ने सिंधिया पर पलटवार करते हुए बृहस्पतविार को ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, ”सिंधिया जी, आपने राहुल जी के एकाधिकारवादी निगम पर हमले को थोड़ा व्यक्तिगत ले लिया. इस निगम ने अपने शिकंजे से भारत के नवाबों और राजे-रजवाड़ों को डरा-धमकाकर भारत को गुलाम बनाकर हमें लूटने का काम किया था.” उन्होंने कहा कि इतिहास के अनुसार, ग्वालियर के सिंधिया परिवार की भूमिका 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में जटिल रही.

खेड़ा ने दावा किया, ”श्रीमंत जयाजीराव सिंधिया, जो उस समय ग्वालियर के शासक थे, उन्होंने अपनी सेना को ईस्ट इंडिया कंपनी की मदद के लिए भेजा और विद्रोहियों के खिलाफ कार्रवाई करवाई. इतिहास में यह स्पष्ट है कि श्रीमंत जयाजीराव ने उस एकाधिकारवादी निगम का साथ दिया. हम उनकी वतनपरस्ती पर शक नहीं करते, उनपर दबाव रहा होगा. उसी दबाव का ज.क्रि राहुल जी ने अपने लेख में भी किया है.” उन्होंने कहा कि ग्वालियर की सेना के कई सैनिक और अधिकारी विद्रोह में शामिल हो गए थे, क्योंकि उन्होंने अपने डर से पार पा लिया था तथा हिंदुस्तानी बागियों के नेता रहे तात्या टोपे और रानी लक्ष्मीबाई ने ग्वालियर पर क.ब्ज.ा कर लिया था.

खेड़ा के अनुसार, ”श्रीमंत जयाजीराव सिंधिया को अपना महल छोड़कर भागना पड़ा, लेकिन बाद में ईस्ट इंडिया कंपनी की मदद से उन्होंने फिर से ग्वालियर पर नियंत्रण हासिल कर लिया था. इस प्रकार औपचारिक रूप से सिंधिया शासकों ने ईस्ट इंडिया कंपनी का समर्थन किया, लेकिन उनकी सेना के कई सदस्य स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हुए, क्योंकि जनता शासकों से ज्यादा समझदार, वतन परस्त और बेख.ौफ. थी.” उन्होंने दावा किया कि बाद के वर्षों में भी सिंधिया परिवार ने आमतौर पर ब्रिटिश राज के साथ सहयोग की नीति अपनाई थी.

खेड़ा ने कहा, ”सिंधिया जी, इतिहास हमें सबक लेकर आगे बढ.ने के लिए प्रेरित करता है, ना कि झूठी मनगढ.ंत बातों के सहारे जीने के लिए. भारत में भूत (अतीत) चढ.ना इसी को कहते हैं. खैर, मैंने आपका भूत 1857 में उस एकाधिकारवादी निगम से हिंदुस्तानियों की बगावत के सच्चे इतिहास से उतारने की कोशिश की है. उम्मीद है कि उतर गया होगा.” उन्होंने यह भी कहा, ”वरना मुझे आपके आवास पर इतिहास की किताबों का एक पूरा बंडल भिजवाना पड़ेगा ताकि आपका भूत उतरे. दूसरा… मुझे देश के किसान, मजदूरों, दलित आदिवासियों से एक ट्रक हौसला भी लेकर भिजवाना पड़ेगा ताकि आप देश में अभी चल रहे एकाधिकारवादी निगम के खिलाफ बोलने के लिए मजबूत हो सकें.” सिंधिया कई वर्षों तक कांग्रेस में रहे और राहुल गांधी के करीबी माने जाते थे. उन्होंने मार्च, 2020 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया था. वह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार में संचार मंत्री हैं.

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