नयी दिल्ली. राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ ने सोमवार को विपक्ष से पूछा कि पूर्व के मिसालों का हवाला देकर वह कब तक संसद की कार्यवाही बाधित करने को उचित ठहराता रहेगा? संसद के पिछले सत्र के दौरान विपक्षी दलों के रवैये की ओर इशारा करते हुए कहा कि जब अपनी बात रखने का समय था तो कांग्रेस सदन से अनुपस्थित थी.
संविधान सभा से शुरू होकर 75 साल की संसदीय यात्रा- उपलब्धियां, अनुभव, स्मृतियां और सीख विषय पर चर्चा में भाग लेते हुए राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि व्यवधान के जरिए उनकी पार्टी केवल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के दिवंगत नेताओं अरुण जेटली और सुषमा स्वराज के उदाहरण का अनुसरण कर रही है. भाजपा के विपक्ष में रहने के दौरान दोनों दिवंगत नेताओं के व्यवधान पर दिए गए बयानों का उन्होंने उल्लेख किया.
खरगे ने 30 जनवरी, 2011 को उच्च सदन की कार्यवाही के दौरान जेटली की एक टिप्पणी का हवाला देते हुए कहा, ”संसद का काम चर्चा करना है. जब भी मुद्दों की अनदेखी की जाती है, व्यवधान पैदा करना सार्वजनिक प्रणाली के हित में है. इसलिए संसदीय व्यवधान को अलोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता.” उन्होंने कहा, ”स्वराज ने भी लोकसभा में कहा था कि संसद को नहीं चलने देना भी दूसरे शब्दों में लोकतंत्र का एक रूप है.” खरगे ने कहा, ”जब हम ऐसा कर रहे होते हैं तो हम पर हमला किया जाता है.”
सभापति ने उनकी इस टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, ”ध्यान से सोचने के बाद मुझे बताइए कि हम कब तक अतीत की मिसाल के आधार पर सदन को बाधित करते रहेंगे? कब तक हम अशांति को सही ठहराते रहेंगे?” खरगे ने टिप्पणी की कि वह उन्हें बोलने की अनुमति नहीं देते. इस पर सभापति ने उन्हें यह कहते हुए रोक दिया कि उन्हें दुख होता है क्योंकि ‘जब भागीदारी हो सकती थी, तो आप लोग वहां नहीं थे’. इस दौरान जयराम रमेश सहित कांग्रेस नेताओं ने सभापति से विपक्ष के नेता को अपना भाषण पूरा करने की अनुमति देने का आग्रह किया.
रमेश ने कहा, ”आप उनके भाषण पर टिप्पणी क्यों कर रहे हैं? उन्हें बोलने दीजिए. आप लगातार व्यवधान डाल रहे हैं.” धनखड़ ने खरगे की ओर से हस्तक्षेप करने के लिए रमेश की खिंचाई की और कहा कि उन्हें ‘सुपर नेता प्रतिपक्ष’ नहीं बनना चाहिए. उन्होंने कहा, ”आप सुपर एलओपी नहीं हो सकते. उन्हें (खरगे को) आपकी सहायता की जरूरत नहीं है.” धनखड़ ने आगे कहा कि जब चर्चा में हिस्सेदारी के लिए समय दिया गया था तो उन्होंने कांग्रेस को सदन से अनुपस्थित देखा था.
उन्होंने कहा, ”समस्या यह है कि जब किसी मुद्दे पर बहस, चर्चा और विचार-विमर्श करना होता है तो आप (कांग्रेस सदस्य) सदन से बहिर्गमन कर जाते हैं.” धनखड़ ने कहा, ”मैं राजनीति में कोई हितधारक नहीं हूं. मैं निश्चित रूप से इस सदन का एक हितधारक हूं… यह उच्च सदन, वरिष्ठों का सदन है. ऐसा काम करें ताकि यह दूसरों से सम्मान मिले. ” उन्होंने विपक्ष के नेता से अपने सदस्यों को अनुशासन में रखने के लिए भी कहा. विपक्ष के एक अन्य सदस्य ने सभापति से सभी दलों पर आक्षेप नहीं लगाने का आग्रह किया.
व्यवधान को हथियार बनाने की रणनीति को लोग कभी स्वीकार नहीं करेंगे: सभापति धनखड़
राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ ने सोमवार को कहा कि ‘व्यवधान को हथियार बनाने’ की रणनीति को लोग कभी स्वीकार नहीं करेंगे. उन्होंने उच्च सदन के सदस्यों से टकराव से बचने को कहा. संसद के पांच दिवसीय सत्र के पहले दिन राज्यसभा की कार्यवाही शुरू होने पर धनखड़ ने अपनी प्रारंभिक टिप्पणी में कहा, ”संविधान सभा से लेकर आज अमृत काल तक, सात दशक से अधिक की यात्रा करते हुए, इन पवित्र परिसरों ने कई मील के पत्थर देखे हैं.”
उन्होंने कहा, ”इस यात्रा में – 15 अगस्त, 1947 की मध्यरात्रि में ‘नियति के साथ वादा’ करने से लेकर 30 जून, 2017 की मध्यरात्रि में अभिनव अग्रगामी जीएसटी व्यवस्था के अनावरण तक कई ऐतिहासिक क्षण आए.” राज्यसभा के पांच दिवसीय 261वें सत्र की शुरुआत सोमवार को ‘संविधान सभा से शुरू हुई 75 साल की संसद यात्रा- उपलब्धियां, अनुभव, यादें और सीख’ विषय पर चर्चा के साथ हुई.
सभापति ने कहा कि संविधान सभा में लगभग तीन वर्षों तक चले विभिन्न सत्रों में हुए विचार-विमर्श ने मर्यादा और स्वस्थ बहस का उदाहरण पेश किया. उन्होंने कहा कि विवादास्पद और अत्यधिक विभाजनकारी मुद्दों पर सर्वसम्मति की भावना से बातचीत की गई.
उन्होंने कहा, ”हम सभी के लिए इससे काफी कुछ सीखने को मिलता है.” उन्होंने जोर देकर कहा कि सदस्यों को संवैधानिक रूप से लोकतांत्रिक मूल्यों का पोषण करने के लिए नियुक्त किया गया है और इसलिए उन्हें लोगों के विश्वास पर खरा उतरना चाहिए और उसकी पुष्टि करनी चाहिए.
उन्होंने कहा, ”स्वस्थ बहस एक फलते-फूलते लोकतंत्र की पहचान है. हमें टकराव से बचना चाहिए. एक रणनीति के रूप में व्यवधान को हथियार के रूप में प्रयोग करने का लोग कभी भी समर्थन नहीं करेगें.” धनखड़ ने सदस्यों से सत्र के दौरान अवसर और समय का बेहतर इस्तेमाल जनहित को पूरा करने में करने की अपील की.
सदन के पिछले सत्रों में मणिपुर हिंसा और अडाणी समूह से संबंधित आरोपों सहित विभिन्न मुद्दों पर विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों के बीच टकराव के कारण सदन की कार्यवाही कई बार बाधित और स्थगित करनी पड़ी थी. धनखड़ ने कहा कि यह भारत के स्वतंत्रता सेनानियों के साथ-साथ संविधान निर्माताओं को याद करने का भी अवसर है क्योंकि वे दूरदर्शी थे जिन्होंने एक ऐसा संविधान दिया जो समय की कसौटी पर खरा उतरा है.
उन्होंने कहा, ”हमारे राजनेताओं ने समय-समय पर संवैधानिक आदर्शों का सम्मान किया है और उसका पालन किया है और इसके सार को जनता तक पहुंचाकर संविधान का लोकतंत्रीकरण किया है.” धनखड़ ने कहा कि सिविल सेवकों के योगदान को भी याद किया जाना चाहिए क्योंकि वे यह सुनिश्चित करने के लिए दिन-रात दृढ़ रहे हैं कि व्यवस्था स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से काम करे.
उन्होंने विश्वास जताया, ”आज के दिन सदस्य सदन को समृद्ध करेंगे और बड़े पैमाने पर लोगों को हमारी 75 साल की यात्रा के बारे में बताएंगे और आने वाले वर्षों के लिए दृष्टिकोण प्रकट करेंगे.” उन्होंने संसद के अंदर विवेक, हास्य, व्यंग्य और यहां तक कि तीखी टिप्पणियों के उपयोग को एक सशक्त लोकतंत्र का महत्वपूर्ण अभिन्न पहलू बताया और कहा कि आजकल ऐसी हल्की-फुल्की बातें सुनने को नहीं मिलतीं.
उन्होंने कहा, ”उम्मीद है कि हम विवेक, हास्य और विद्वतापूर्ण बहस फिर से देख सकेंगे.” धनखड़ ने कहा कि संसद के पवित्र परिसर ने वर्षों से उतार-चढ़ाव देखे हैं, जिन पर विचार-विमर्श करने की आवश्यकता है ताकि 2047 में जब देश स्वतंत्रता की शताब्दी मनाए, तो अपने भारत को उसके सही स्थान पर स्थापित किया जा सके.