नयी दिल्ली. प्रयागराज में घरों को गिराने की कार्रवाई को ”अमानवीय और अवैध” करार देते हुए उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को शहर विकास प्राधिकरण को छह सप्ताह के अंदर प्रत्येक मकान मालिक को 10-10 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया.
न्यायमूर्ति अभय एस ओका और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने कहा, ”जिस तरीके से मकान गिराये गये हैं, वह हमारी अंतरात्मा को झकझोर देने वाला है. अपीलकर्ताओं के घरों को मनमाने तरीके से ध्वस्त कर दिया गया. आश्रय का अधिकार, कानून की उचित प्रक्रिया नाम की कोई चीज होती है.” पीठ ने ‘देश में कानून के शासन’ पर बल देते हुए कहा कि मकान गिरा देने का ‘मनमाना’ तरीका प्रशासन की असंवेदनशीलता को दर्शाता है.
शीर्ष अदालत ने कहा कि नागरिकों के मकानों को इस तरह से ध्वस्त नहीं किया जा सकता. उच्चतम न्यायालय ने कहा कि प्रयागराज विकास प्राधिकरण को याद रखना चाहिए कि आश्रय का अधिकार अनुच्छेद 21 का अभिन्न अंग है और कानून शासन संविधान का मूल हिस्सा है. शीर्ष अदालत ने कहा कि प्राधिकरण ने उत्तर प्रदेश शहरी नियोजन और विकास अधिनियम, 1973 की धारा 27 के तहत मकान गिराये थे.
पीठ ने कहा कि 18 दिसंबर 2020 को एक कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए इसे उसी दिन घरों पर चिपकाया गया था जिसमें यह उल्लेख भी था कि दो मौकों पर यह नोटिस व्यक्तिगत रूप से भी देने का प्रयास किया गया था. शीर्ष अदालत ने कहा कि मकान गिराने से संबंधित अगला आदेश भी आठ जनवरी, 2021 को चिपका दिया गया था, लेकिन उसे पंजीकृत डाक से नहीं भेजा गया.
पीठ ने कहा, ”पहली पंजीकृत डाक एक मार्च, 2021 को भेजी गयी थी जो छह मार्च, 2021 को प्राप्त हुई. लेकिन अगले ही दिन मकान गिरा दिया गया, जिससे अपीलकर्ताओं को अधिनियम की धारा 27 (2) के तहत अपील करने का कोई अवसर नहीं मिला.” शीर्ष अदालत ने कहा, ”धारा 27(1) के प्रावधान का उद्देश्य मकान गिराने से पहले कारण बताने का उचित अवसर प्रदान करना है. यह उचित अवसर प्रदान करने का कोई तरीका नहीं है.” पीठ ने कहा कि प्रावधानों के अनुसार, नोटिस चिपकाने से पहले व्यक्तिगत रूप से नोटिस देने के लिए वास्तविक प्रयास किए जाने चाहिए.
उच्चतम न्यायालय ने कहा, ” जब प्रावधान कहता है कि यदि संबंधित व्यक्ति मिल नहीं पाता है, तो यह स्पष्ट है कि व्यक्तिगत रूप से नोटिस देने के लिए वास्तविक प्रयास किए जाने की आवश्यकता है. ऐसा नहीं हो सकता कि जिस इंसान को नोटिस देने का काम सौंपा गया है, वह घर जाए और यह पता चलने के बाद कि उस दिन संबंधित व्यक्ति उपलब्ध नहीं है नोटिस को चस्पा कर दे.
अदालती आदेश में कहा गया कि यह स्पष्ट है कि व्यक्तिगत सेवा को लेकर ”बार-बार प्रयास करने होंगे.” पीठ ने कहा, ”यदि वे प्रयास विफल हो जाते हैं तब दो विकल्प उपलब्ध हैं. पहला (नोटिस) चस्पा करने का और दूसरा पंजीकृत डाक से भेजने का.” सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकील ने मुआवजे की मांग करते हुए कहा कि उनके मुवक्किलों के पास अपने घरों के पुर्निनर्माण के लिए वित्तीय साधन नहीं हैं.
अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने धन(भरपाई) देने का विरोध करते हुए तर्क दिया कि अवैधता की भरपाई नहीं की जा सकती और प्रभावित व्यक्तियों के पास वैकल्पिक आवास सुविधा है. हालांकि, शीर्ष न्यायालय ने इस तर्क को स्वीकार करने से इनकार कर दिया तथा कहा कि यह ”उचित प्रक्रिया का पालन नहीं करने को सही ठहराना” है.
न्यायालय ने कहा, “इस वजह से उन्हें अपने घर गंवाने पड़े हैं. आपको नोटिस देने के लिए ईमानदारी से प्रयास करना चाहिए, न कि इसे बेतरतीब ढंग से चिपका देना चाहिए. यह चस्पा करने का धंधा बंद होना चाहिए. केवल इसलिए कि उनके पास पैसे नहीं हैं, वे पीड़ित हैं.” याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा था कि राज्य सरकार ने यह सोचकर गलत तरीके से मकानों को ध्वस्त किया कि यह जमीन गैंगस्टर से नेता बने अतीक अहमद की है जिसे 2023 में पुलिस अभिरक्षा में दो हमलावरों ने गोली मार दी थी.
शीर्ष अदालत अधिवक्ता जुल्फिकार हैदर, प्रोफेसर अली अहमद और अन्य लोगों की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिनके मकान ध्वस्त कर दिए गए थे. इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मकान गिराने की इस कार्रवाई को चुनौती देने वाली उनकी याचिका को खारिज कर दिया था. याचिकाकर्ताओं को कथित तौर पर प्रयागराज जिले के लूकरगंज में कुछ निर्माणों के संबंध में छह मार्च, 2021 को नोटिस दिया गया था.
अतिक्रमण विरोधी अभियान के दौरान किताबें लेकर भागती लड़की के वीडियो ने सबको स्तब्ध कर दिया : न्यायालय
उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि हाल ही में सामने आए उस वीडियो ने “सभी को स्तब्ध कर दिया है”, जिसमें आठ साल की एक बच्ची को उत्तर प्रदेश में अतिक्रमण विरोधी अभियान के दौरान उसकी झुग्गी पर बुलडोजर चलाए जाने के दौरान अपनी किताबें लेकर भागते हुए देखा जा सकता है.
न्यायमूर्ति अभय एस ओका और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में अवैध ध्वस्तीकरण से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान अंबेडकर नगर के जलालपुर इलाके में रिकॉर्ड किए गए इस वीडियो का जिक्र किया, जिसे बड़े पैमाने पर सोशल मीडिया पर साझा किया जा रहा है.
न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा, “हाल ही में बुलडोजर से छोटी-छोटी झुग्गियों को ध्वस्त किए जाने का एक वीडियो सामने आया है. वीडियो में एक छोटी बच्ची को अपनी किताबें लेकर ध्वस्त की गई झोपड़ी से बाहर भागते देखा जा सकता है. इस वीडियो ने सभी को स्तब्ध कर दिया है.” वीडियो के सामने आने के बाद उत्तर प्रदेश के विपक्षी दलों ने कार्रवाई की कड़ी आलोचना की थी. हालांकि, अंबेडकर नगर पुलिस ने ध्वस्तीकरण कार्रवाई का बचाव किया था.