विकिरण, परमाणु अपशिष्ट से पैदा होने वाले खतरे को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया: थरूर

भाजपा ने 2008 में अविश्चास प्रस्ताव लाकर परमाणु कार्यक्रम को पटरी से उतारने का प्रयास किया: कांग्रेस

नयी दिल्ली. कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने परमाणु ऊर्जा विधेयक में विभिन्न खामियों का उल्लेख करते हुए बुधवार को लोकसभा में दावा किया कि इसमें रेडियोधर्मी पदार्थों के विकिरण और परमाणु अपशिष्ट से उत्पन्न होने वाले ”जोखिम को पूरी तरह से नजरअंदाज” किया गया है.

उन्होंने ‘भारत के रुपांतरण के लिए नाभिकीय ऊर्जा का संधारणीय दोहन और अभिवर्द्धन (शांति) विधेयक, 2025’ पर चर्चा में भाग लेते हुए कहा कि यह विधेयक परमाणु ऊर्जा क्षेत्र के बारे में स्पष्ट दृष्टिकोण प्रस्तुत नहीं करता और इस संबंध में अनिश्चितता को गहराता है कि भारत का परमाणु ऊर्जा क्षेत्र किस ओर जा रहा है.

थरूर ने कटाक्ष करते हुए कहा, ”मैं आश्वस्त नहीं हूं कि यह ”न्यूक्लियर बिल है या अनक्लियर बिल.” उन्होंने कहा कि विधेयक के मौजूदा स्वरूप में मूलभूत खामियां हैं और इस पर व्यापक रूप से काम करने की जरूरत है, न कि ‘कॉस्मेटिक’ संशोधन करना.
कांग्रेस सांसद ने कहा कि इसे चर्चा के लिए सदन में रखे जाने से पहले संसद की स्थायी समिति या संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेजा जाना चाहिए था.

उन्होंने कहा, ”विधेयक में रेडियोधर्मी पदार्थों के विकिरण और लंबे समय तक रहने वाले परमाणु अपशिष्ट से पैदा होने वाले जोखिम को पूरी तरह से नजरअंदाज किया गया है.” थरूर ने कहा कि विधेयक सरकार द्वारा अनुमति प्राप्त किसी (निजी) कंपनी या व्यक्ति को परमाणु ऊर्जा संयंत्र के संचालन के लिए लाइसेंस का आवेदन करने का पात्र बनाता है, जो संपूर्ण परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को पूरी तरह से खोलने जैसा है.

उन्होंने कहा कि परमाणु ईंधन के खनन से लेकर अपशिष्ट निपटान तक, इसके विभिन्न चरण के लिए विधेयक एकल समग्र लाइसेंस का प्रावधान करता है और इस तरह एक ही कंपनी खनन पर नियंत्रण कर सकती है तथा ईंधन तैयार कर सकेगी, रिएक्टर का संचालन और अपशिष्ट निपटान करेगी.

कांग्रेस सांसद ने कहा, ”इस तरह, नियंत्रण को एक ही कंपनी या कॉरपोरेट समूह में केंद्रित करना जोखिम को रोकने के बजाय अत्यधिक बढ़ा देगा.” उन्होंने कहा, ”लाभ अर्जित करना पूरी प्रक्रिया का मुख्य मकसद हो जाएगा, जबकि सुरक्षा से हर स्तर पर समझौता होगा.” उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि विधेयक के प्रावधानों के अनुसार, नागरिक समाज या राज्य सरकार ऑपरेटर के खिलाफ मामला दायर नहीं कर सकेंगे.

उन्होंने शायराना अंदाज में कहा, ”इस विधेयक के हर वादे के पीछे एक कीमत छिपी है मिस्टर मिनिस्टर और अक्सर यह कीमत वही चुकाता है, जिसका फैसले में कोई हिस्सा नहीं होता और उन वादों की कीमत तुम क्या जानो सरकार….” राकांपा (एसपी) की सुप्रिया सुले ने चर्चा में भाग लेते हुए कहा कि सत्तापक्ष की ओर से कहा गया कि वे एकाधिकार नहीं चाहते और मुझे यह विचार अच्छा लगा. उन्होंने कहा, ”लेकिन मैं पूछना चाहती हूं कि किस एकाधिकार के बारे में बात हो रही है? क्या यह न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआईएल) के बारे में है, जो हमारा पीएसयू (सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम) है और हमेशा लाभ अर्जित किया है.”

उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने इंडिगो को एकाधिकार स्थापित करने दिया, जिससे विमानन क्षेत्र में पूरे देश में अव्यवस्था की स्थिति पैदा हुई. उन्होंने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा, ”लेकिन एनपीसीआईएल जैसे पीएसयू के लिए इस सरकार में कोई सहानुभूति नहीं है. सरकार को इसे स्पष्ट करना चाहिए, जब आपके मुख्य वक्ता ने कहा है कि हम एकाधिकार नहीं चाहते.” सुले ने कहा, ”हम कहीं से भी निजीकरण के खिलाफ नहीं हैं, हम एक आधुनिक पार्टी हैं…(शरद) पवार ने हमेशा ही उदारीकरण के बारे में बात की है.” उन्होंने सरकार से आग्रह करते हुए कहा, ”कृपया उस पीएसयू को ना रोकें जिसने इस राष्ट्र का निर्माण किया है.”

राकांपा (एसपी) सांसद ने कहा कि सत्ता पक्ष की ओर से कहा गया कि अनुसंधान एवं विकास (आर एंड डी) सरकार के पास बना रहेगा, लेकिन ”जब सत्तापक्ष कहता है कि ‘बना रहेगा’ तो यह चिंतित करने वाला है.” उन्होंने आरोप लगाया कि महाराष्ट्र में जैतापुर परमाणु ऊर्जा परियोजना को ”11 साल से सरकार आगे नहीं बढ़ा सकी है.”

सुले ने सवाल किया कि परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के ‘डीकमीशनिंग’ के लिए इस विधेयक में क्या प्रावधान किया गया है? उन्होंने कहा, ”इसकी गारंटी क्या है कि निजी कंपनी भी जिम्मेदारीपूर्वक अपना दायित्व निभाएगी.” उन्होंने विधेयक में, सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत सवाल पूछे जाने का प्रावधान नहीं होने पर चिंता जताते हुए कहा कि ”यदि राष्ट्रीय सुरक्षा की बात है तो हमें जवाब नहीं दीजिए, लेकिन निजी क्षेत्र शामिल है तो राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल कहां से आता है? आप कहते हैं कि यह एक पारदर्शी सरकार है तो सरकार को छिपाने की जरूरत क्या है?” उन्होंने विधेयक को जेपीसी के पास भेजने की मांग की ताकि इसपर व्यापक विचार-विमर्श किया जा सके.

तेलुगु देशम पार्टी (तेदेपा) के कृष्णा प्रसाद तेन्नेटी ने कहा कि भारत में विश्व का 25 प्रतिशत थोरियम भंडार है और ”हम 50 साल तक इसके दोहन पर आगे नहीं बढ़ सकें.” उन्होंने कहा कि यह विधेयक व्यापक निवेश को बढ़ावा देता है और सरकारी नियंत्रण को मजबूत करता है.

शिवसेना (उबाठा) के अरविंद सावंत ने सवाल किया कि सरकार कैसे सुनिश्चित करेगी कि निजी कंपनी सार्वजनिक क्षेत्र के समान ही सुरक्षा प्रदान करेगी? उन्होंने विधेयक को व्यापक विचार-विमर्श के लिए जेपीसी के पास भेजने और उसके बाद आम सहमति से विधेयक लाने का आग्रह किया.

वहीं, जद(यू) के आलोक कुमार सुमन ने कहा कि परमाणु ऊर्जा संयंत्र के संचालन के लिए लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया उच्च कोटि की होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि रेडियोधर्मी अपशिष्ट के निपटारे के लिए विशेष प्रावधान करने की जरूरत है. शिवसेना के धैर्यशील संभाजीराव माने ने कहा कि रेडियोधर्मी पदार्थों की सुरक्षा के लिए सरकार ने विशेष शक्तियां अपने पास रखी है, ”यानी नवाचार निजी क्षेत्र कर सकता है, लेकिन नियंत्रण सरकार के पास रहेगा.”

सपा ने शांति विधेयक को परमाणु क्षेत्र ‘मित्र’ को सौंपने का रास्ता बताया

समाजवादी पार्टी (सपा) ने परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी भागीदारी सुनिश्चित करने के सरकार के कदम की आलोचना करते हुए संबंधित विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) में भेजने की बुधवार की मांग की, साथ ही यह भी आरोप लगाया कि सरकार परमाणु ऊर्जा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र को भी अपने ”मित्र” को सौंपना चाहती है.

सपा सांसद वीरेंद्र सिंह ने ‘भारत के रुपांतरण के लिए नाभिकीय ऊर्जा का संधारणीय दोहन और अभिवर्द्धन (शांति) विधेयक, 2025’ पर चर्चा में हिस्सा लेते हुए सरकार पर आरोप लगाया कि वह परमाणु ऊर्जा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र को भी अपने मित्रों को सौंप देना चाहती है.
उन्होंने सवालिया लहजे में कहा कि क्या देश की सुरक्षा निजी कंपनियों या लोगों के लाभ के लिए गिरवी रख दी जाएगी? सिंह ने परमाणु हादसों की स्थिति में ऑपरेटर की जिम्मेदारी सीमित करने संबंधी प्रावधान को बहुत बड़ी भूल करार देते हुए कहा कि यह प्रावधान परमाणु हादसों के लिए जिम्मेदार ऑपरेटर को सख्ती से बचाने वाला है, जो कतई उचित नहीं है. उन्होंने कहा कि सरकार को इस विधेयक को जेपीसी के पास भेजना चाहिए, ताकि इसकी व्यापक समीक्षा हो सके.

चर्चा में हिस्सा लेते हुए राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के सुधाकर सिंह ने परमाणु क्षेत्र को निजी हाथों में सौंपने के औचित्य पर सवाल उठाये. उन्होंने कहा कि जर्मनी जैसे देश परमाणु ऊर्जा की पुरानी नीति से हट रहे हैं और हरित ऊर्जा की ओर बढ़ रहे हैं.
उन्होंने सवाल किया कि जब सरकार विभिन्न स्रोतों, कोयला और पनबिजली परियोजनाओं से ऊर्जा उत्पादन के लिए पैसे खर्च कर रही है तो इसने परमाणु ऊर्जा के लिए खुद से खर्च क्यों नहीं किया.

उन्होंने यह भी पूछा कि क्या सरकार यह प्रावधान करेगी कि परमाणु संयंत्र से उत्पन्न बिजली सभी किसानों को चौबीस घंटे उपलब्ध कराएगी? भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवाद लेनिनवादी) लिबरेशन के सुदामा प्रसाद ने भी विधेयक का विरोध किया. उन्होंने कहा कि परमाणु क्षेत्र निजी कंपनियों के लिए खोलना खतरनाक हो सकता है.

भाजपा ने 2008 में अविश्चास प्रस्ताव लाकर परमाणु कार्यक्रम को पटरी से उतारने का प्रयास किया: कांग्रेस

कांग्रेस ने बुधवार को लोकसभा में आरोप लगाया कि वर्ष 2008 में जब ”परमाणु रंगभेद की नीति” को खत्म करने का प्रयास जा रहा था तो भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के विरूद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाकर भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को पटरी से उतारने का प्रयास किया था. कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने परमाणु ऊर्जा संबंधी विधेयक का विरोध करते हुए यह भी कहा कि इसे विस्तृत विचार-विमर्श के लिए संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेजा जाना चाहिए.

तिवारी ने दावा किया कि ‘भारत के रुपांतरण के लिए नाभिकीय ऊर्जा का संधारणीय दोहन और अभिवर्द्धन (शांति) विधेयक, 2025’ में आपूर्तिकर्ता के उत्तरदायित्व का कोई प्रावधान नहीं है. उन्होंने विधेयक पर चर्चा की शुरुआत करते हुए भारत के परमाणु उर्जा के इतिहास का उल्लेख किया तथा पंडित जवाहरलाल नेहरू और होमी जहांगीर भाभा का स्मरण किया. उन्होंने कहा कि 1970 के दशक में परमाणु परीक्षण, बांग्लादेश की मुक्ति और सिक्किम का भारत के साथ एकीकरण के माध्यम से इंदिरा गांधी ने दक्षिण एशिया के भूरानीतिक परिदृश्य को बदल दिया.

तिवारी ने कहा कि जुलाई 2005 में भारत अमेरिका परमाणु ऊर्जा करार की शुरुआत हुई और 10 अक्टूबर 2008 को दोनों देशों के बीच समझौते पर हस्ताक्षर हुआ. कांग्रेस सांसद ने कहा, ”2008 में जब भारत के खिलाफ परमाणु रंगभेद की नीति को तोड़ने का प्रयास किया जा रहा था, तो (तत्कालीन संप्रग) सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया. यह अलग मामला है कि यह अविश्वास प्रस्ताव पारित नहीं हुआ.

तिवारी ने आरोप लगाया, ”आप लोग भारत के परमाणु उर्जा कार्यक्रम को पटरी से उतारना चाहते थे और यह सब राजनीतिक कारणों से किया गया.” उन्होंने कहा कि जब एक कॉरपोरेट समूह ने परमाणु उर्जा के क्षेत्र में उतरने का फैसला किया तो उसके कुछ समय बाद यह विधेयक लाया गया. उन्होंने कहा, ”क्या यह इत्तेफाक है?” इस पर, परमाणु ऊर्जा राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने इसे खारिज करते हुए कहा कि यह पूरी तरह से राजनीतिक आरोप है.

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