गुवाहाटी/जालना. असम के मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा द्वारा देश के संविधान से ‘समाजवादी’ और ‘पंथनिरपेक्ष’ को हटाने की वकालत करने के एक दिन बाद, प्रदेश कांग्रेस ने रविवार को पलटवार करते हुए कहा कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अपने संविधान में भी यही शब्द हैं जिनका वह विरोध कर रहे हैं.
विपक्षी दल ने शर्मा की टिप्पणी पर सवाल उठाते हुए इसे भाजपा के कामकाज को निर्देशित करने वाले दस्तावेज के विपरीत बताया.
असम विधानसभा में विपक्ष के नेता देबब्रत सैकिया ने कहा, ”एक व्यक्ति, जिसने (भारत के) संविधान की शपथ ली है और वह इतने उच्च पद पर है, उसका इस तरह की टिप्पणी करना उसके पद के अनुरूप नहीं है. मैं इसकी कड़ी निंदा करता हूं.” शर्मा ने शनिवार को दावा किया था कि ‘समाजवादी’ और ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्द ‘पश्चिमी अवधारणाएं’ हैं और इन शब्दों को संविधान से हटा दिया जाना चाहिए.
उन्होंने कहा कि इन शब्दों को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने संविधान की प्रस्तावना में शामिल किया था, जब देश में आपातकालीन शासन था और इनका भारतीय सभ्यता में कोई स्थान नहीं है. सैकिया ने शर्मा पर पलटवार करते हुए कहा कि भाजपा के अपने संविधान में ‘समाजवादी’ और ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्द हैं.
उन्होंने रेखांकित किया कि भाजपा की आधिकारिक वेबसाइट पर मौजूद पार्टी के 24 पृष्ठों वाले ‘संविधान और नियम’ के पहले ही पन्ने में लिखा है कि यह ”भारत के संविधान के प्रति सच्ची आस्था और निष्ठा तथा समाजवाद, पंथनिरपेक्षता के सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्ध रहेगी….” कांग्रेस नेता ने कहा, ”भाजपा के संविधान के पहले पन्ने पर लिखा है कि वह देश के संविधान तथा समाजवाद और पंथनिरपेक्षता के सिद्धांतों का पालन करेगी. इन शब्दों को अपने संविधान में शामिल करने के बाद, मुझे नहीं पता कि इसका विरोध करने का क्या कारण हो सकता है.” उन्होंने सवाल किया कि क्या मुख्यमंत्री भाजपा से ‘नाराज’ हैं और किसी अन्य पार्टी में जाने की सोच रहे हैं. शर्मा करीब एक दशक पहले भाजपा में शामिल होने से पहले कांग्रेस के एक प्रभावशाली नेता थे.
एआईएमपीएलबी प्रमुख ने प्रस्तावना से ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द हटाने की मांग का विरोध किया
‘ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड’ (एआईएमपीएलबी) के अध्यक्ष मौलाना खालिद सैफुल्ला रहमानी ने संविधान की प्रस्तावना से ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्दों को हटाने के लिए की जा रही मांगों का रविवार को विरोध किया. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने बृहस्पतिवार को एक सभा को संबोधित करते हुए इन शब्दों की समीक्षा करने की मांग की थी और दावा किया था कि इन्हें आपातकाल के दौरान जोड़ा गया था और ये कभी भी भीमराव आंबेडकर द्वारा तैयार किए गए संविधान का हिस्सा नहीं थे.
रहमानी ने यहां ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ”ये दो शब्द संविधान का सार हैं, जो जाति और धर्म से परे सभी नागरिकों को समान अधिकार देते हैं. इन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के शासन काल में सर्वसम्मति से शामिल किया गया था. वे संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा हैं.” उन्होंने उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने के लिए भाजपा सरकार की आलोचना की और कहा कि यह मुसलमानों की अलग पहचान को मिटाने का प्रयास है.
उन्होंने कहा, ”भारत में हर धर्म के अपने निजी कानून हैं. यूसीसी सिर्फ मुसलमानों को प्रभावित नहीं करता, यह सभी समुदायों की धार्मिक स्वायत्तता को खतरे में डालता है. एआईएमपीएलबी यूसीसी के खिलाफ कानूनी और सार्वजनिक रूप से लड़ रहा है और अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना जारी रखेगा.” यहां शनिवार को एक कार्यक्रम में उन्होंने यह भी कहा कि वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 संविधान के खिलाफ है और मुसलमानों के अधिकारों का उल्लंघन करता है.