India GDP Calculation New Method: देश की अर्थव्यवस्था की वृद्धि को मापने के तरीके में बड़ा बदलाव करने की तैयारी है। अब जीडीपी के आकलन में लोगों के रोजमर्रा के खर्च से लेकर वाहन, परिवहन, शिक्षा, इलाज, बीमा और वित्तीय सेवाओं तक के आंकड़ों को ज्यादा विस्तार से शामिल किया जाएगा। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने नई जीडीपी श्रृंखला के तहत निजी अंतिम उपभोग व्यय (PFCE) के आकलन का दायरा बढ़ाने का मसौदा जारी किया है।
नई व्यवस्था में पहले के 46 मदों की तुलना में करीब 128 मदों के आधार पर उपभोग व्यय का अनुमान तैयार करने का प्रस्ताव है। इसके अलावा यूपीआई लेन-देन और वेतन संबंधी आंकड़ों का इस्तेमाल सेवा क्षेत्र की गतिविधियों को बेहतर ढंग से समझने के लिए किया जा सकता है। इन बदलावों का उद्देश्य देश में खपत, आर्थिक वृद्धि और महंगाई के प्रभाव का अधिक व्यापक आकलन करना है।
46 से बढ़कर 128 मदों में मापा जाएगा निजी खर्च
जीडीपी के आकलन में निजी अंतिम उपभोग व्यय की अहम भूमिका होती है। इससे पता चलता है कि देश के परिवार वस्तुओं और सेवाओं पर कितना खर्च कर रहे हैं। अब तक इस खर्च का अनुमान सीमित श्रेणियों के आधार पर तैयार किया जाता था।
नई प्रस्तावित व्यवस्था में उपभोग की करीब 128 श्रेणियों को शामिल किया जाएगा। इससे यह समझने में मदद मिल सकती है कि लोगों की मांग किन वस्तुओं और सेवाओं की ओर बढ़ रही है और समय के साथ खर्च करने की आदतों में क्या बदलाव आ रहे हैं।
खाने-पीने की चीजों, कपड़ों और मकान से लेकर शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन और मनोरंजन तक के खर्च का विस्तृत आकलन अर्थव्यवस्था की तस्वीर को अधिक व्यापक बना सकता है।
दूध-घी से लेकर हवाई यात्रा तक के खर्च पर नजर
नई व्यवस्था में वाहनों की खरीद, उनके रखरखाव और ईंधन पर होने वाले खर्च के साथ सड़क, रेल और हवाई यात्रा पर होने वाले व्यय को भी बेहतर तरीके से मापने की योजना है।
इसके लिए उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र समेत छह राज्यों और दिल्ली-एनसीआर में अध्ययन कराया गया। इस दौरान वाहनों से होने वाली कमाई, ईंधन, मरम्मत और रखरखाव से जुड़े आंकड़े जुटाए गए, ताकि परिवहन क्षेत्र में लोगों के वास्तविक खर्च का अधिक सटीक अनुमान लगाया जा सके।
उपभोग की श्रेणियों में भी कुछ बदलाव प्रस्तावित हैं। मक्खन और घी को डेयरी उत्पादों के बजाय तेल एवं वसा समूह में रखने का प्रस्ताव है। आइसक्रीम को चीनी, कन्फेक्शनरी और डेजर्ट समूह में शामिल किया जाएगा। वहीं, सिलाई के खर्च को कपड़ों की सफाई और मरम्मत से संबंधित श्रेणी के साथ जोड़ा जाएगा।
संचार श्रेणी का नाम बदलकर सूचना एवं संचार करने और बीमा तथा वित्तीय सेवाओं के लिए अलग समूह बनाने का भी प्रस्ताव है।
महंगाई और वास्तविक खपत के बीच अंतर समझना होगा आसान
जीडीपी की गणना में मौजूदा कीमतों पर होने वाले खर्च और वास्तविक खपत में अंतर समझना जरूरी है। यदि किसी वस्तु की कीमत बढ़ जाती है, तो उस पर कुल खर्च बढ़ सकता है, भले ही उसकी खपत में कोई खास बढ़ोतरी न हुई हो।
बेहतर मूल्य सूचकांकों और विस्तृत उपभोग आंकड़ों की मदद से महंगाई के प्रभाव को अलग करके वास्तविक खपत में हुए बदलाव का आकलन करना आसान हो सकता है। इससे नीति-निर्माताओं को यह समझने में मदद मिलेगी कि अर्थव्यवस्था में बढ़ोतरी वास्तविक मांग के कारण हो रही है या कीमतों में वृद्धि के कारण।
राज्यवार निजी उपभोग व्यय का अनुमान तैयार करने के लिए पारिवारिक उपभोग सर्वेक्षण और जनसंख्या अनुमानों का उपयोग किया जा सकता है। बैंकिंग और बीमा सेवाओं के लिए भारतीय रिजर्व बैंक तथा बीमा नियामक के राज्यवार आंकड़े भी उपयोगी हो सकते हैं।
जीडीपी के आकलन में यूपीआई की भी होगी अहम भूमिका
डिजिटल भुगतान के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल के बीच यूपीआई के आंकड़े भी आर्थिक गतिविधियों को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन सकते हैं। मंत्रालय की योजना सेवा क्षेत्र के प्रदर्शन का आकलन बेहतर बनाने के लिए डिजिटल लेन-देन के आंकड़ों और सरकारी वेतन रिकॉर्ड का इस्तेमाल करने की है।
इसमें निजी स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, अस्पतालों, स्वास्थ्य सेवाओं और सरकारी विभागों से जुड़ी गतिविधियों के संकेतक शामिल किए जा सकते हैं। हालांकि, यूपीआई लेन-देन की कुल राशि को सीधे जीडीपी नहीं माना जा सकता। इसका उपयोग अन्य आर्थिक आंकड़ों के साथ मिलाकर गतिविधियों के रुझान समझने के लिए किया जा सकता है।
सेवा क्षेत्र की तस्वीर भी होगी ज्यादा स्पष्ट
भारत में औद्योगिक गतिविधियों को मापने के लिए मासिक औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) उपलब्ध है, लेकिन सेवा क्षेत्र की गतिविधियों का व्यापक मासिक आकलन लंबे समय से चुनौती रहा है।
रिपोर्ट के मुताबिक, प्रस्तावित सेवा उत्पादन सूचकांक (ISP) में यूपीआई और वेतन संबंधी आंकड़ों को शामिल करने से इसके दायरे को मौजूदा लगभग 60 प्रतिशत से बढ़ाकर करीब 78 प्रतिशत सेवा क्षेत्र के सकल मूल्य वर्धन (GVA) तक पहुंचाने की योजना है।
यदि प्रस्तावित बदलाव लागू होते हैं, तो सेवा क्षेत्र में गतिविधियों के रुझान को ज्यादा नियमित और व्यापक तरीके से समझने में मदद मिल सकती है। इससे आर्थिक नीतियां बनाने और विभिन्न क्षेत्रों के प्रदर्शन का आकलन करने में भी सहायता मिलने की उम्मीद है।
आम लोगों और अर्थव्यवस्था के लिए क्या होगा फायदा?
जीडीपी आकलन की नई व्यवस्था का संभावित फायदा यह है कि सरकार को लोगों के खर्च और आर्थिक गतिविधियों की ज्यादा विस्तृत जानकारी मिल सकेगी। इससे खपत के बदलते रुझानों, महंगाई के असर और सेवा क्षेत्र की वृद्धि का विश्लेषण बेहतर हो सकता है।
हालांकि, आंकड़ों का दायरा बढ़ना अपने आप में अधिक सटीकता की गारंटी नहीं है। इसके लिए आंकड़ों की गुणवत्ता, अलग-अलग स्रोतों के बीच तालमेल और गणना की पारदर्शिता भी जरूरी होगी।
निष्कर्ष: जीडीपी की नई श्रृंखला में उपभोग की अधिक श्रेणियों, डिजिटल भुगतान और सेवा क्षेत्र से जुड़े आंकड़ों को शामिल करने का प्रस्ताव भारतीय अर्थव्यवस्था को मापने के तरीके में महत्वपूर्ण बदलाव ला सकता है। अंतिम प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि इन आंकड़ों को किस तरह संकलित, सत्यापित और गणना में इस्तेमाल किया जाता है।