नवरात्रि में सात्विक भोजन और फलाहार क्यों करते हैं? जानें धार्मिक मान्यता, फायदे और व्रत में क्या खाएं

Navratri 2026: शारदीय नवरात्रि में मां दुर्गा की पूजा के साथ सात्विक भोजन और फलाहार करने की परंपरा है। जानिए नवरात्रि में प्याज-लहसुन से परहेज क्यों किया जाता है, सात्विक आहार का धार्मिक महत्व क्या है और व्रत के दौरान शरीर को स्वस्थ रखने के लिए किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।
Author: www.navabharat.news
UPDATED: Mon, 12 Oct 2026 09:32 AM
नवरात्रि में सात्विक भोजन और फलाहार क्यों करते हैं? जानें धार्मिक मान्यता, फायदे और व्रत में क्या खाएं
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नवरात्रि 2026: शारदीय नवरात्रि का पर्व मां दुर्गा की आराधना, उपवास और आत्मसंयम के लिए विशेष माना जाता है। इन नौ दिनों में कई श्रद्धालु सात्विक भोजन करते हैं, जबकि व्रत रखने वाले लोग फलाहार और व्रत में स्वीकार्य खाद्य पदार्थों का सेवन करते हैं। इस दौरान अनेक परिवारों में प्याज, लहसुन, मांसाहार और शराब से परहेज करने की परंपरा है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि में खानपान पर संयम रखने से पूजा-पाठ, ध्यान और साधना पर मन केंद्रित करने में मदद मिलती है। व्रत का उद्देश्य केवल भोजन छोड़ना नहीं, बल्कि अनुशासन, सकारात्मकता और आत्मसंयम को जीवन में अपनाना भी माना जाता है।

लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि नवरात्रि में सात्विक भोजन पर इतना जोर क्यों दिया जाता है? प्याज और लहसुन से परहेज करने के पीछे कौन-सी धार्मिक मान्यताएं हैं और व्रत के दौरान खानपान कैसा होना चाहिए? आइए जानते हैं।

नवरात्रि में प्याज और लहसुन क्यों नहीं खाते?

हिंदू धार्मिक परंपराओं में भोजन को शरीर के साथ-साथ मन और व्यवहार से भी जोड़कर देखा जाता है। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, सात्विक भोजन मन को शांत रखने और आध्यात्मिक साधना के अनुकूल वातावरण बनाने में सहायक माना जाता है। इसी कारण कई परिवार नवरात्रि के दौरान प्याज और लहसुन का सेवन नहीं करते।

एक पौराणिक कथा के अनुसार, समुद्र मंथन के बाद जब भगवान विष्णु मोहिनी रूप में देवताओं को अमृत वितरित कर रहे थे, तब स्वर्भानु नामक असुर देवता का वेश धारण करके देवताओं की पंक्ति में बैठ गया। उसने अमृत पी लिया, लेकिन सूर्य और चंद्रमा ने उसकी पहचान उजागर कर दी। इसके बाद भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया।

कुछ धार्मिक मान्यताओं में कहा जाता है कि अमृत की बूंदें धरती पर गिरने से प्याज और लहसुन की उत्पत्ति हुई। इस कथा की अलग-अलग व्याख्याएं प्रचलित हैं। यह एक पौराणिक मान्यता है, न कि प्याज और लहसुन की उत्पत्ति के बारे में वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य।

सात्विक भोजन को लेकर क्या कहती हैं पारंपरिक मान्यताएं?

भारतीय धार्मिक और दार्शनिक परंपराओं में भोजन को सात्विक, राजसिक और तामसिक श्रेणियों में समझाने की अवधारणा मिलती है।

  • सात्विक भोजन: ताजा, स्वच्छ और संतुलित भोजन, जिसे पारंपरिक मान्यताओं में शांति और सरलता से जोड़ा जाता है।
  • राजसिक भोजन: कुछ पारंपरिक व्याख्याओं में अधिक तीखे, उत्तेजक या स्वाद-केंद्रित भोजन को इस श्रेणी से जोड़ा जाता है।
  • तामसिक भोजन: कुछ धार्मिक मान्यताओं में ऐसे खाद्य पदार्थों को इस श्रेणी में रखा जाता है, जिन्हें आलस्य या जड़ता से जोड़ा जाता है।

कुछ परंपराओं में प्याज और लहसुन को राजसिक या तामसिक भोजन माना जाता है। इसी आधार पर नवरात्रि में इनसे परहेज किया जाता है। हालांकि, सभी समुदायों और परिवारों में खानपान के नियम एक जैसे नहीं होते।

प्याज और लहसुन सामान्य खाद्य पदार्थ हैं, जिनमें उपयोगी पोषक तत्व भी पाए जाते हैं। इन्हें हर परिस्थिति में नुकसानदेह मानना सही नहीं है। नवरात्रि में इनका सेवन करना या न करना मुख्य रूप से धार्मिक परंपरा और व्यक्तिगत पसंद से जुड़ा है।

नवरात्रि में सात्विक भोजन करने का क्या महत्व है?

नवरात्रि के दौरान सात्विक भोजन का संबंध धार्मिक साधना, अनुशासन और संयम से माना जाता है। इस अवधि में कई श्रद्धालु हल्का, ताजा और कम मसाले वाला भोजन पसंद करते हैं।

फल, दूध, दही, मेवे और व्रत में स्वीकार्य खाद्य पदार्थ भोजन का हिस्सा हो सकते हैं। संतुलित भोजन से शरीर को ऊर्जा और जरूरी पोषक तत्व मिल सकते हैं। हालांकि, सात्विक भोजन का अर्थ केवल सादा खाना नहीं है। भोजन की गुणवत्ता, मात्रा, ताजगी और शरीर की जरूरतों का ध्यान रखना भी महत्वपूर्ण है।

कुछ लोग पूरे नौ दिन व्रत रखते हैं, जबकि कुछ श्रद्धालु पहले दिन, अष्टमी, नवमी या अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार उपवास करते हैं। इसलिए हर व्यक्ति के लिए एक जैसी व्रत-डाइट जरूरी नहीं है। खानपान का चुनाव अपनी दिनचर्या, स्वास्थ्य और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार करना चाहिए।

नवरात्रि में फलाहार क्यों करते हैं?

फलाहार नवरात्रि के व्रत का एक प्रमुख हिस्सा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, उपवास के दौरान फल और व्रत में स्वीकार्य खाद्य पदार्थों का सेवन करने से श्रद्धालु अपने धार्मिक नियमों का पालन कर सकते हैं।

फलाहार का मतलब केवल फल खाना नहीं है। अलग-अलग परंपराओं में इसमें दूध, दही, मेवे, साबूदाना, कुट्टू का आटा, सिंघाड़े का आटा और राजगीरा जैसे खाद्य पदार्थ भी शामिल किए जाते हैं।

फल और अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थ शरीर को ऊर्जा, विटामिन, खनिज और दूसरे जरूरी पोषक तत्व दे सकते हैं। हालांकि, केवल चाय, आलू या तली हुई चीजों पर निर्भर रहने से भोजन असंतुलित हो सकता है। इसलिए व्रत के दौरान भी भोजन में विविधता और पर्याप्त मात्रा का ध्यान रखना जरूरी है।

नवरात्रि के व्रत में क्या खा सकते हैं?

व्रत के दौरान खाने-पीने की सामग्री क्षेत्र और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। सामान्य तौर पर, अपनी परंपरा में स्वीकार्य होने पर इन विकल्पों को फलाहार में शामिल किया जा सकता है।

  • फल: सेब, केला, पपीता, अनार, संतरा और मौसमी फल।
  • दूध और दही: दूध, दही और कम चीनी वाली लस्सी।
  • मेवे और बीज: बादाम, अखरोट, मूंगफली और स्वीकार्य बीज।
  • व्रत में इस्तेमाल होने वाले खाद्य पदार्थ: साबूदाना, कुट्टू का आटा, सिंघाड़े का आटा और राजगीरा।
  • कंद और सब्जियां: आलू, शकरकंद और अन्य व्रत-अनुकूल सब्जियां।
  • पेय पदार्थ: पर्याप्त पानी, नारियल पानी और कम चीनी वाले पेय।

फलाहार तैयार करते समय अधिक तेल, नमक और चीनी के इस्तेमाल से बचना उपयोगी हो सकता है। भोजन की मात्रा ऐसी रखें कि शरीर को पर्याप्त ऊर्जा मिल सके।

क्या प्याज और लहसुन छोड़ने के पीछे वैज्ञानिक कारण भी है?

नवरात्रि में प्याज और लहसुन से परहेज करने की परंपरा को कई बार मौसम में बदलाव और पाचन से जोड़कर समझाया जाता है। चैत्र नवरात्रि सामान्यतः वसंत से गर्मी की ओर बढ़ते मौसम में आती है, जबकि शारदीय नवरात्रि वर्षा ऋतु के बाद शरद ऋतु के समय पड़ती है।

मौसम और दिनचर्या में बदलाव के दौरान पर्याप्त पानी पीना, स्वच्छ भोजन करना और संतुलित आहार लेना उपयोगी है। बहुत अधिक तला हुआ, मसालेदार या भारी भोजन कुछ लोगों में अपच और पेट की परेशानी बढ़ा सकता है। ऐसे में हल्का और संतुलित भोजन बेहतर विकल्प हो सकता है।

हालांकि, ऐसा कोई स्थापित वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है कि नवरात्रि के दौरान प्याज और लहसुन खाना अपने आप में नुकसानदेह होता है या सभी लोगों के लिए इनसे परहेज करना जरूरी है। इनका सेवन धार्मिक परंपरा, व्यक्तिगत पसंद और शरीर की सहनशीलता पर निर्भर कर सकता है।

व्रत रखते समय सेहत का ध्यान कैसे रखें?

नवरात्रि में धार्मिक आस्था के साथ अपनी सेहत का ध्यान रखना भी जरूरी है। उपवास के दौरान लंबे समय तक भूखे रहने या पर्याप्त भोजन और पानी नहीं लेने से कुछ लोगों को कमजोरी, सिरदर्द या चक्कर आने जैसी परेशानी हो सकती है।

व्रत के दौरान इन बातों का ध्यान रखें:

  1. दिनभर पर्याप्त पानी पिएं।
  2. फलाहार में फल, दूध-दही, मेवे और अन्य स्वीकार्य पौष्टिक खाद्य पदार्थ शामिल करें।
  3. केवल तली हुई या अधिक मीठी चीजों पर निर्भर न रहें।
  4. अपनी ऊर्जा और भूख के अनुसार भोजन की मात्रा तय करें।
  5. यदि आप नियमित दवाएं लेते हैं या मधुमेह, उच्च रक्तचाप अथवा कोई अन्य स्वास्थ्य समस्या है, तो उपवास रखने से पहले डॉक्टर से सलाह लें।

गर्भवती महिलाओं और पहले से किसी बीमारी का इलाज करा रहे लोगों को भी उपवास के बारे में चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए। स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों को नजरअंदाज करके कठोर व्रत रखना उचित नहीं है।

नवरात्रि में सात्विक भोजन और फलाहार करने की परंपरा धार्मिक आस्था, आत्मसंयम और साधना से जुड़ी है। कई परिवारों में प्याज और लहसुन से परहेज किया जाता है, जबकि व्रत रखने वाले श्रद्धालु फल, दूध, मेवे और अन्य स्वीकार्य खाद्य पदार्थों का सेवन करते हैं।

व्रत का मूल उद्देश्य मां दुर्गा की आराधना के साथ अनुशासन और सकारात्मकता को अपनाना माना जाता है। इसलिए धार्मिक परंपराओं का पालन करते समय अपनी सेहत, पोषण और शरीर की जरूरतों का ध्यान रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य धार्मिक मान्यताओं और पारंपरिक आहार संबंधी विचारों पर आधारित है। धार्मिक रीति-रिवाज अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में भिन्न हो सकते हैं। यह लेख चिकित्सकीय सलाह का विकल्प नहीं है।

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