( लड़का से लड़की बनी अनाया बांगड़ की तस्वीर)
ट्रांसजेंडर पर्सन्स एक्ट के खिलाफ महिलाओं के समूह ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। विमेंस डिक्लेरेशन इंटरनेशनल इंडिया नामक संगठन ने याचिका में ट्रांसजेंडर पर्सन्स कानून 2019 की धारा 7 को चुनौती दी है।
याचिकाकर्ता ने ट्रांसजेंडर पर्सन्स नियम 2020 के नियम 7 और इससे जुड़े अन्य नियमों को भी चुनौती दी है। ये नियम व्यक्तियों को ऐसे आधिकारिक दस्तावेज प्राप्त करने की अनुमति देते हैं जिनमें उनका लिंग उनके जैविक लिंग से अलग दर्ज होता है
याचिका में उस कानूनी व्यवस्था को चुनौती दी गई है जो जैविक रूप से पुरुष व्यक्तियों को ‘सेक्स रीअसाइनमेंट सर्जरी’ कराने के बाद आधिकारिक दस्तावेजों में ‘महिला’ के रूप में दर्ज होने की अनुमति देती है।
जानते चलें कि 28 अक्टूबर को हुई सुनवाई के दौरान बेंच ने बताया था कि जन्म से पुरुष लेकिन महिला के रूप में पहचान रखने वाले ट्रांस व्यक्ति को बायोलॉजिकल महिला के समान दर्जा नहीं मिलना चाहिए।
क्या बायोलॉजिकल तौर पर पुरुष जन्मा व्यक्ति, सर्जरी करवाने के बाद महिला के लिए आरक्षित अधिकारों का दावा कर सकता है… इस सवाल को लेकर एक महिला संगठन ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
विमेंस डिक्लेरेशन इंटरनेशनल इंडिया ने बायोलॉजिक मेल को सर्जरी के बाद सरकारी दस्तावेजों में महिला दर्ज करने की व्यवस्था को चुनौती दी है। याचिकाकर्ता संगठन ‘विमेंस डिक्लेरेशन इंटरनेशनल इंडिया’ ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 की धारा 7और नियम 7 को चुनौती दी है।
याचिका के मुताबिक, यह प्रावधान बायोलॉजिकल पुरुषों को सर्जरी के बाद सरकारी दस्तावेजों में खुद को ‘महिला’ के तौर पर दर्ज कराने की अनुमति देता है। याचिका में 2014 के NALSA जजमेंट पर भी पुनर्विचार की मांग की गई है, जिसमें ट्रांसजेंडर लोगों को अपनी जेंडर पहचान की कानूनी मान्यता का अधिकार दिया गया था।
लड़की होने का सबूत कपड़े उतार कर देना पड़ा।
हाल में लड़का से लड़की बनी अनाया बांगड़ ने एक वीडियो में अपना यह दर्द बयां किया।
उन्होंने बताया कि ट्रांसजेंडर प्रोक्टेक्शन एक्ट के तहत कानूनी रुप से महिला पहचान पाने की प्रक्रिया में उन्हें अस्पताल के मेडिकल बोर्ड के सामने कपड़े उतारकर जांच करानी पड़ी।
उन्होंने बताया “अपनी पहचान साबित करने के लिए शरीर का सबूत देना बेहद अपमानजनक… मानसिक रूप से दर्दनाक अनुभव रहा।”