नयी दिल्ली. केंद्रीय मंत्रिमंडल ने प्रधानमंत्री जनजाति आदिवासी न्याय महा अभियान (पीएम-जनमन) को मंजूरी दे दी है. केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने बुधवार को यह जानकारी दी. झारखंड के खूंटी में ‘जनजातीय गौरव दिवस’ पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा घोषित इस योजना का कुल परिव्यय 24,104 करोड़ रुपये होगा. इसमें केंद्र का हिस्सा 15,336 करोड़ रुपये होगा और राज्य 8,768 करोड़ रुपये का योगदान देंगे. इस योजना का उद्देश्य पक्के घर, नल से पानी की आपूर्ति और सड़कें प्रदान करना है.
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मंगलवार रात इस योजना को मंजूरी दे दी. ठाकुर ने कहा, ”इस योजना से 18 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के 220 जिलों के 28,16,000 (28.16 लाख) से अधिक आदिवासी लोग लाभान्वित होंगे. इस योजना के तहत वे आदिवासी लाभार्थी होंगे जिन्हें अब तक भारत सरकार की योजनाओं का लाभ नहीं मिला है.” लाभार्थियों की पहचान कमजोर माने जाने वाले 75 आदिवासी समुदायों में से की गई है.
ठाकुर ने कहा, ”योजना के तहत 11 प्रमुख बिंदुओं की पहचान की गई है जिसके आधार पर उन्हें लाभ दिया जायेगा. इनमें आवास, सभी मौसम के लिए उपयुक्त सड़कें, स्वच्छ पेयजल, बिजली, मोबाइल डिस्पेंसरी और मोबाइल टावर शामिल हैं.” उन्होंने कहा कि आजीविका के अवसर भी प्रदान किए जाएंगे.
इस योजना का लक्ष्य 2.39 लाख रुपये प्रति मकान की लागत से 4.90 लाख पक्के घर उपलब्ध कराना, एक करोड़ रुपये प्रति किलोमीटर की लागत से 8,000 किलोमीटर सड़कों का निर्माण, विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (पीवीटीजी) बस्तियों, समुदाय के लिए नल से पानी की आपूर्ति करना हैं.
इसके अलावा इस योजना के तहत 20 से कम मकानों की आबादी वाले 2,500 गांवों/बस्तियों में पानी की आपूर्ति, 10 जिलों के लिए दवा लागत 33.88 लाख रुपये प्रति मोबाइल चिकित्सा यूनिट के साथ एक हजार मोबाइल चिकित्सा यूनिट, प्रत्येक के लिए 2.75 करोड़ रुपये की लागत से 500 छात्रावास बनाना आदि शामिल हैं.
योजना के तहत 2,500 आंगनवाड़ी केंद्रों (प्रत्येक पर 12 लाख रुपये), बहुउद्देश्यीय केंद्रों (प्रत्येक पर 60 लाख रुपये), 57,000 मकानों के लिए बिजली कनेक्शन, 0.3 किलोवाट सौर ऑफ-ग्रिड प्रणाली, सड़कों पर सौर प्रकाश व्यवस्था और 3,000 गांवों में सड़कें और मोबाइल टावरों की स्थापना भी की जायेगी.
वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में अनुसूचित जनजाति की आबादी 10.45 करोड़ है. कुल मिलाकर, 18 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के 75 समुदायों को पीवीटीजी के रूप में वर्गीकृत किया गया है. ये पीवीटीजी सामाजिक, आर्थिक और शिक्षा क्षेत्रों में कमजोर समझे जाते हैं.
आयुष मंत्रालय मौजूदा मानदंडों के अनुसार आयुष कल्याण केंद्र स्थापित करेगा और चल चिकित्सा इकाइयों के जरिये आयुष सुविधाओं का दायरा पीवीटीजी बस्तियों तक बढ़ाया जायेगा. कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय इन समुदायों के उपयुक्त कौशल के अनुसार पीवीटीजी बस्तियों, बहुउद्देश्यीय केंद्रों और छात्रावासों में कौशल तथा व्यावसायिक प्रशिक्षण की सुविधा प्रदान करेगा.
मंत्रिमंडल ने ‘फास्ट ट्रैक’ विशेष अदालतों को अगले तीन वर्षों तक जारी रखने की मंजूरी दी
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने यौन अपराधों से जुड़े मामलों में त्वरित न्याय देने के लिए ‘फास्ट ट्रैक’ विशेष अदालतों को अगले तीन साल तक जारी रखने की मंजूरी दे दी है. दिल्ली में निर्भया सामूहिक बलात्कार मामले के बाद 2018 में आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम पारित होने के बाद, केंद्र ने 31 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पोक्सो) अधिनियम के तहत मामलों से निपटने के लिए 389 अदालतों समेत कुल 1,023 ‘फास्ट ट्रैक’ विशेष अदालतें स्थापित करने का निर्णय लिया था.
इसकी शुरुआत 2019 में गांधी जयंती पर एक साल के लिए की गई थी और बाद में इसे इस साल 31 मार्च तक अतिरिक्त दो साल के लिए बढ़ा दिया गया था. एक अधिकारी ने पूर्व में कहा था कि केंद्र के प्रयासों के बावजूद 1,023 अदालतों में से केवल 754 ही चालू थीं. कई राज्यों ने केंद्र को आश्वासन दिया था कि वे ऐसी अदालतें स्थापित करेंगे, लेकिन कई अंतत? शुरू नहीं हुईं.
मंत्रिमंडल ने मंगलवार को 1952.23 करोड़ रुपये के कोष के साथ इस योजना को तीन और वर्षों तक बढ़ाने की मंजूरी दे दी. केंद्र का हिस्सा जहां 1207.24 करोड़ रुपये होगा, वहीं राज्य 744.99 करोड़ रुपये का योगदान देंगे. केंद्र की हिस्सेदारी निर्भया कोष से दी जाएगी.
बयान में कहा गया, ”30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने इस योजना में भाग लिया है और 414 विशिष्ट पोक्सो अदालतों सहित 761 फास्ट ट्रैक विशेष अदालतों की शुरुआत की है, जिन्होंने 1,95,000 से अधिक मामलों का निपटारा किया है.”
अधिकारियों ने कहा कि प्रत्येक ‘फास्ट ट्रैक’ विशेष अदालत की कल्पना प्रति वर्ष 65 से 165 मामलों की सुनवाई के लिए की गई थी. अधिकारियों ने बताया कि ऐसी एक अदालत को संचालित करने का वार्षिक खर्च एक न्यायिक अधिकारी और सात सहायक कर्मचारियों के साथ 75 लाख रुपये आंका गया था.
मंत्रिमंडल ने 15,000 महिला एसएचजी को ड्रोन उपलब्ध कराने की योजना को मंजूरी दी
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 15,000 महिला स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) को दो वर्षों के लिए ड्रोन उपलब्ध कराने की एक केंद्रीय योजना को मंजूरी दी है. इस योजना के लिए 1,261 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं. सूचना एवं प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने बुधवार को पत्रकारों को बताया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में मंगलवार शाम को हुई मंत्रिमंडल की बैठक में इस संबंध में निर्णय लिया गया.
ठाकुर ने कहा, ”इस योजना का मकसद वर्ष 2024-25 से 2025-2026 के दौरान किसानों को कृषि उद्देश्य के लिए 15,000 चयनित महिला एसएचजी को ड्रोन मुहैया कराना है.” उन्होंने कहा, ”दीनदयाल अंत्योदय योजना के तहत गठित कुल 89 लाख एसएचजी में से लाभार्थी महिला एसएचजी का चयन किया जाएगा.” विज्ञप्ति के मुताबिक, सरकार ने कहा कि विभिन्न राज्यों में ऐसे स्थानों की पहचान की जाएगी जहां ड्रोन का उपयोग आर्थिक रूप से संभव है और ड्रोन उपलब्ध कराने के लिए प्रगतिशील 15,000 महिला एसएचजी का चयन किया जाएगा.
ड्रोन की खरीद के लिए महिला एसएचजी को ड्रोन की लागत का 80 प्रतिशत और सहायक उपकरण/सहायक शुल्क के लिए 8,00,000 रुपये तक की केंद्रीय वित्त सहायता प्रदान की जाएगी. एसएचजी के क्लस्टर लेवल फेडरेशन (सीएलएफ) राष्ट्रीय कृषि इन्फ्रा फाइनेंसिंग सुविधा (एआईएफ) के तहत ऋण के रूप में शेष राशि (खरीद की कुल लागत घटाकर सब्सिडी) बढ़ा सकते हैं.
ठाकुर ने कहा, ”उर्वरक कंपनियों द्वारा करीब 500 ड्रोन उपलब्ध कराए जाएंगे. शेष 14,500 ड्रोन अगले दो वर्षों में केंद्रीय सहायता के जरिए उपलब्ध कराए जाएंगे.” उन्होंने बताया कि एक ड्रोन और उसके सामान की कुल लागत लगभग 10 लाख रुपये है. लागत का करीब 80 प्रतिशत या आठ लाख रुपये तक केंद्र द्वारा प्रदान किया जाएगा.
मंत्री ने कहा कि ड्रोन पायलट को 15,000 रुपये और सह-पायलट को करीब 10,000 रुपये का मानदेय मिलेगा. उन्होंने कहा कि ड्रोन के इस्तेमाल के लिए 10-15 गांवों का एक समूह बनाया जाएगा. करीब 1,000 हेक्टेयर भूमि ड्रोन संचालन के लिए उपलब्ध होगी. इसमें वाणिज्यिक फसलों को महत्व दिया जाएगा.
बयान के अनुसार, महिला एसएचजी के एक सदस्य को 15-दिवसीय प्रशिक्षण के लिए चुना जाएगा. इसमें पांच दिवसीय अनिवार्य ड्रोन पायलट प्रशिक्षण और कृषि उद्देश्य के लिए अतिरिक्त 10-दिवसीय प्रशिक्षण शामिल है. प्रधानमंत्री मोदी ने 15 अगस्त को अपने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में स्वयं-सहायता समूहों को ड्रोन प्रौद्योगिकी से सशक्त बनाने की घोषणा की थी.