नयी दिल्ली. केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने श्रीलंका संकट पर सर्वदलीय बैठक में राज्यों की वित्तीय स्थिति के बारे में जानकारी दी. वाईएसआर कांग्रेस, टीआरएस और द्रमुक जैसे क्षेत्रीय दलों ने बैठक के दौरान इसको लेकर आपत्ति जतायी. बैठक के दौरान वित्त मंत्रालय के अधिकारियों ने कुछ राज्यों के बजटीय और बजट से इतर कर्ज के बारे में जानकारी दी और उन पर पड़ रहे वित्तीय दबाव के बारे में बताया. इसपर क्षेत्रीय दलों ने कहा कि यह बैठक श्रीलंका संकट पर चर्चा के लिये थी न के राज्यों के वित्तीय स्थिति के बारे में जानकारी देने के लिये. कुछ नेताओं ने दावा किया कि केंद्र का जीडीपी-कर्ज अनुपात किसी भी राज्य के मुकाबले अधिक है.
सरकारी सूत्रों ने कहा कि जानकारी दिये जाने का मकसद राजकोषीय सूझबूझ की कमी तथा मुफ्त में दी जाने वाली चाजों के दुष्परिणाम को रेखांकित करना था. बैठक के बाद विदेश मंत्री एस जयशंकर ने संवाददाताओं से कहा कि श्रीलंका से मिली सीख काफी महत्वपूर्ण है. ‘‘राजकोषीय समझदारी के साथ जवाबदेह राजकाज होना चाहिए. मुफ्त में चीजें देने की प्रवृत्ति नहीं होनी चाहिए.’’ वित्त मंत्रालय ने कहा कि कुछ राज्यों ने बकाया कर्ज को लेकर बड़ी गारंटी दी हुई है. इसे अगर भुनाया गया तो जोखिम पैदा हो सकते हैं. आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा गया है कि सभी राज्यों की राजस्व प्राप्ति के अनुपात में औसत प्रतिबद्ध व्यय 56 प्रतिशत है, जबकि पंजाब, केरल और उत्तराखंड में यह 75 प्रतिशत से अधिक है.
इस व्यय में कर्ज अदायगी, वेतन भुगतान, पेंशन और अन्य पारिश्रमिक शामिल हैं. कुछ राज्यों के पास नया करने की कोई गुंजाइश नहीं है. बैठक में महाराष्ट्र, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में बिजली मद में बड़ी राशि बकाया के मामले को भी रखा गया.