
नयी दिल्ली. वर्ष 2006 के सनसनीखेज निठारी हत्याकांड का एकमात्र दोषी सुरेंद्र कोली अब आजाद है, क्योंकि मंगलवार को उच्चतम न्यायालय ने उसे इस तरह के आखिरी मामले में आरोपों से बरी कर दिया और आदेश दिया कि अगर किसी अन्य मामले में उसकी आवश्यकता न हो, तो उसे तुरंत रिहा किया जाए. निठारी हत्याकांड का यह 13वां मामला था, जिसमें कोली को बरी किया गया. उसे पहले ही 12 अन्य संबंधित मामलों में बरी किया जा चुका है.
निठारी हत्याकांड का खुलासा 29 दिसंबर, 2006 को नोएडा के निठारी में व्यवसायी मोनिंदर सिंह पंढेर के घर के पीछे एक नाले से आठ बच्चों के कंकाल मिलने के साथ हुआ था. उस समय कोली पंढेर के घर में घरेलू सहायक था. निठारी में 15 वर्षीय लड़की के कथित बलात्कार और हत्या से संबंधित मामले में कोली की दोषसिद्धि को चुनौती देने वाली सुधारात्मक याचिका को स्वीकार करते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा कि आपराधिक कानून अनुमान या पूर्वधारणा के आधार पर दोषसिद्धि की अनुमति नहीं देता है.
पुर्निवचार याचिका सहित अन्य सभी विकल्पों का उपयोग करने के बाद किसी पक्ष के लिए उपलब्ध अंतिम कानूनी सहारा सुधारात्मक याचिका होती है. प्रधान न्यायाधीश बी.आर. गवई, न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की पीठ ने कहा कि निठारी में हुए अपराध जघन्य थे और परिवारों की पीड़ा अथाह थी.
पीठ ने कहा, ”यह अत्यंत खेद की बात है कि लंबे समय तक की गई जांच के बावजूद, वास्तविक अपराधी की पहचान इस तरह से स्थापित नहीं हो सकी है, जो कानूनी मानकों को पूरा करे.” न्यायालय ने कहा कि संदेह, चाहे कितना भी गंभीर क्यों न हो, उचित संदेह से परे सबूत का स्थान नहीं ले सकता, तथा न्यायालय वैधता के स्थान पर आसान समाधान को प्राथमिकता नहीं दे सकते.
पीठ ने कहा, ”निर्दोष होने की धारणा उस समय तक बनी रहती है जब तक अपराध साबित न हो जाए, और यह साबित होना चाहिए स्वीकृत और विश्वसनीय साक्ष्य के माध्यम से; और जब साक्ष्य विफल हो जाते हैं, तो केवल वैध परिणाम यह है कि सजा को रद्द कर दिया जाए, भले ही मामला भयानक अपराध से संबंधित ही क्यों न हो.” पीठ ने कहा, ”जब जांच समय पर, पेशेवर तरीके से और संवैधानिक मानकों के अनुसार की जाती है, तो सबसे कठिन रहस्यों को भी सुलझाया जा सकता है और कई अपराधों को शुरुआत में ही हस्तक्षेप से रोका जा सकता है.” पीठ ने कहा कि इस मामले में असली अपराधी की पहचान करने की प्रक्रियाओं में लापरवाही और देरी ने तथ्यों की खोज की प्रक्रिया को कमजोर किया और उन रास्तों को बंद कर दिया, जो असली अपराधी की पहचान कर सकते थे.
पीठ ने कहा, ”खुदाई शुरू होने से पहले स्थल को सुरक्षित नहीं किया गया, कथित खुलासे को उसी समय दर्ज नहीं किया गया, रिमांड कागजात में विरोधाभासी विवरण थे, और याचिकाकर्ता (कोली) को समय पर अदालत निर्देशित चिकित्सीय परीक्षण के बिना लंबी अवधि तक पुलिस हिरासत में रखा गया.” पीठ ने गौर किया कि महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अवसर गंवा दिए गए, जब पोस्टमार्टम सामग्री और अन्य फॉरेंसिक निष्कर्ष समय पर और सही तरीके से रिकॉर्ड में नहीं लाए गए और जब घर की तलाशी में कोई ऐसा सबूत नहीं मिला, जिसे फॉरेंसिक तरीके से कथित घटनाओं से जोड़ा जा सके.
न्यायालय ने कहा कि जांच ने परिवार और पड़ोस के स्पष्ट गवाहों से पर्याप्त पूछताछ नहीं की और सामग्रीगत सुरागों का पालन नहीं किया, जिसमें सरकारी समिति द्वारा उठाया गया अंग व्यापार का पहलू भी शामिल था. पीठ ने कहा, ”प्रत्येक चूक ने साक्ष्य की विश्वसनीयता और उत्पत्ति को कमजोर किया और सच तक पहुँचने के रास्ते को संकीर्ण कर दिया.” याचिका को स्वीकार करते हुए, पीठ ने 15 फरवरी 2011 के अपने फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें कोली की अपील को खारिज किया गया था. उच्चतम न्यायालय ने 28 अक्टूबर 2014 के अपने आदेश को भी रद्द कर दिया, जिसमें उसकी पुर्निवचार याचिका को खारिज किया गया था. न्यायालय ने कोली को सभी आरोपों से बरी किया और उस पर लगाए गए सजा और जुर्माने को रद्द कर दिया.
पीठ ने कहा, ”यदि याचिकाकर्ता (कोली) की किसी अन्य मामले या प्रक्रिया में आवश्यकता नहीं हैं, तो उसे तुरंत रिहा किया जाए. रजिस्ट्री को इस फैसले को तुरंत संबंधित जेल के अधीक्षक और निचली अदालत को तत्काल पालन के लिए भेजना चाहिए.” कोली को बरी करने का आदेश भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) बी आर गवई और न्यायमूर्ति सूर्यकांत तथा न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की पीठ ने दिया, जिन्होंने कोली की याचिका पर खुली अदालत में सुनवाई की थी.
कोली को नोएडा के निठारी गांव में 15 वर्षीय लड़की के बलात्कार और हत्या के लिए दोषी ठहराया गया था और फरवरी 2011 में उच्चतम न्यायालय ने उसकी सजा को बरकरार रखा था. उसकी पुर्निवचार याचिका 2014 में खारिज कर दी गयी थी. हालांकि, जनवरी 2015 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उसकी दया याचिका पर निर्णय में अत्यधिक देरी के कारण मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदल दिया था.
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अक्टूबर 2023 में कोली और सह-अभियुक्त पंढेर को निठारी से जुड़े कई अन्य मामलों में बरी कर दिया था और 2017 में निचली अदालत द्वारा सुनाई गई मौत की सजा को पलट दिया था. अदालत ने कोली को 12 मामलों और पंढेर को दो मामलों में बरी कर दिया था. केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) और पीड़ित परिवारों ने बरी किए जाने के इन फैसलों को बाद में उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी लेकिन शीर्ष अदालत ने इस साल 30 जुलाई को सभी 14 अपीलों को खारिज कर दिया.
उच्चतम न्यायालय ने सात अक्टूबर को कोली की सुधारात्मक याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था और कहा था कि उसकी याचिका ”स्वीकार किये जाने योग्य है.” पीठ ने कहा था कि मामले में दोषसिद्धि मुख्यत? एक बयान और रसोई के चाकू की बरामदगी पर आधारित थी, जिससे साक्ष्य की पर्याप्तता पर सवाल उठते हैं. सीबीआई ने मामले को अपने हाथ में ले लिया था और उसकी तलाशी के परिणामस्वरूप और अधिक मानव अवशेष बरामद हुए थे.



