अदालत ने मृत्युदंड को उम्रकैद में बदला; कहा: न्यायाधीश को खून का प्यासा नहीं होना चाहिए

Author: Yogesh Kumar Sahu
UPDATED: Thu, 07 Aug 2025 11:01 PM
अदालत ने मृत्युदंड को उम्रकैद में बदला; कहा: न्यायाधीश को खून का प्यासा नहीं होना चाहिए
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कोलकाता. कलकत्ता उच्च न्यायालय की जलपाईगुड़ी र्सिकट पीठ ने अपने मामा की हत्या के दोषी व्यक्ति की मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदलने का आदेश देते हुए टिप्पणी की कि न्यायाधीशों को कभी भी ”खून का प्यासा” नहीं होना चाहिए.
न्यायमूर्ति सब्यसाची भट्टाचार्य ने फैसला सुनाते हुए कहा कि समाज का विकास सजा देने के बदले सुधारात्मक दृष्टिकोण की ओर रहा है, न कि दंडात्मक दृष्टिकोण की ओर.

उन्होंने कहा, ”दंड के तीन प्रमुख स्तंभ हैं – दंड, निवारण और सुधार. जहां निवारण अब भी एक उचित कदम के रूप में मान्य है, वहीं भारत और अन्य जगहों पर आधुनिक आपराधिक न्यायशास्त्र में, सजा का स्थान धीरे-धीरे दंड का सुधारात्मक पहलू लेने लगा है.” न्यायमूर्ति भट्टाचार्य ने भारतीय दंड संहिता की धारा 396 (हत्या के साथ डकैती) के तहत दर्ज मामले में जलपाईगुड़ी सत्र न्यायालय द्वारा आफताब आलम को सुनाई गई मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया, जिसमें 20 साल तक समयपूर्व रिहाई का तब तक कोई विकल्प नहीं होगा, जब तक कि ऐसी असाधारण परिस्थितियां न बनें जिनसे संबंधित न्यायालय संतुष्ट हो.

न्यायमूर्ति भट्टाचार्य ने कहा, ”हत्यारों को फांसी देना उनके लिए कभी अच्छा नहीं रहा.” न्यायमूर्ति भट्टाचार्य ने कहा, ”न्यायाधीशों को कभी भी खून का प्यासा नहीं होना चाहिए. हत्यारों को फांसी देना उनके लिए कभी भी अच्छा नहीं रहा.” न्यायमूर्ति भट्टाचार्य ने इस सप्ताह की शुरुआत में फैसला सुनाते हुए निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा. जलपाईगुड़ी जिले के धूपगुड़ी में 28 जुलाई, 2023 को अपने मामा की हत्या के लिए आलम को दोषी ठहराया गया था. आलम ने अपने पांच अन्य साथियों के साथ मिलकर अपने मामा के घर डकैती डालते समय उसकी हत्या की थी. न्यायमूर्ति भट्टाचार्य ने कहा कि यह अपराध ”दुर्लभतम” श्रेणी में नहीं आता है.

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