सांप के काटने का खतरा हमारी सोच से कहीं बड़ा, नए अध्ययन में सामने आईं छिपी चुनौतियां

Author: Nandkishoryadav
UPDATED: Wed, 14 Oct 2026 04:26 PM
सांप के काटने का खतरा हमारी सोच से कहीं बड़ा, नए अध्ययन में सामने आईं छिपी चुनौतियां
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सांप के काटने पर हर बार शरीर में जहर नहीं पहुंचता। लेकिन जब सांप का जहर शरीर में प्रवेश कर जाता है, तो यह स्थिति ‘सर्प विषाक्तता’ कहलाती है। यह जानलेवा स्थिति हो सकती है। इसका सबसे अधिक असर उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में रहने वाले गरीब ग्रामीण समुदायों पर पड़ता है, जहां लोगों के लिए चिकित्सा सुविधाओं तक पहुंचना आसान नहीं है।

सांप के काटने और उष्णकटिबंधीय बीमारियों के महामारी विज्ञान के क्षेत्र में दशकों का संयुक्त अनुभव रखने वाले शोधकर्ताओं के रूप में हमने महसूस किया कि ‘सर्प विषाक्तता’ से निपटने के प्रयासों में आंकड़े उपलब्ध न होना गंभीर संकट है। जिन आधे से अधिक देशों में विषैले सांप लोगों के लिए खतरा बने हुए हैं, वहां यह रिकॉर्ड ही नहीं रखा जाता कि कितने लोगों को सांप ने काटा या कितने लोग ‘सर्प विषाक्तता’ के शिकार हुए।

सहारा के दक्षिण में स्थित अफ्रीकी देशों और दक्षिण एशिया के ग्रामीण इलाकों में सांप के काटने के कई पीड़ित ऐसे होते हैं, जिन्हें निकटतम स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचने में कई घंटे लग जाते हैं। उनके पास वहां तक पहुंचने के लिए परिवहन साधन नहीं होते या वे इलाज के लिए पारंपरिक चिकित्सकों के पास जाते हैं। नतीजतन, उनके मामलों का उल्लेख कभी भी राष्ट्रीय स्वास्थ्य आंकड़ों में नहीं मिल पाता।

इस बड़ी कमी को दूर करने के लिए हमने एक अध्ययन किया, जिसमें दुनिया भर में ‘सर्प विषाक्तता’ और इससे होने वाली मौतों का आकलन किया गया। हमने 31 मार्च 2025 तक प्रकाशित शोधों की समीक्षा करते हुए 79 देशों के आंकड़ों का अध्ययन किया। इससे हमें 2008 में वैश्विक स्तर पर इस समस्या का आकलन करने वाले अपने महत्वपूर्ण अध्ययन के निष्कर्षों को अद्यतन करने का अवसर मिला। आंकड़ों की जो कमियां इसके बाद भी रह गईं, उन्हें दूर करने के लिए हमने एक भू-सांख्यिकीय मॉडल तैयार किया। इसमें वास्तविक दुनिया से मिले आंकड़ों को स्थानीय पर्यावरणीय और सामाजिक-आर्थिक कारकों के साथ जोड़ा गया। इस मॉडल की मदद से हमने ‘सर्प विषाक्तता’ के मामलों और इससे होने वाली मौतों की दर का अनुमान लगाया।

हमारे निष्कर्ष बताते हैं कि ‘सर्प विषाक्तता’ जन स्वास्थ्य का ऐसा संकट है, जिसका पैमाना आधिकारिक आंकड़ों में सामने आई तस्वीर से कहीं बड़ा है। हमारे अध्ययन के अनुसार, सहारा के दक्षिण में स्थित अफ्रीकी देश इस संकट का सबसे भारी बोझ झेल रहा है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2030 तक सांप के काटने से होने वाली मौतों और इसके कारण उत्पन्न होने वाली दिव्यांगता के मामलों को कम करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। हर देश में इस समस्या के वास्तविक पैमाने और उसके भौगोलिक फैलाव का पता लगाना-इस दिशा में पहला महत्वपूर्ण कदम है।

छिपे संकट का पता लगाना
विश्वसनीय आंकड़ों की कमी को दूर करने के लिए हमने मॉडल आधारित भू-सांख्यिकीय पद्धति का सहारा लिया।
यह समझने के लिए कि यह मॉडल कैसे काम करता है, इसे इस तरह देख सकते हैं कि ज्ञात आंकड़ों और पर्यावरण से मिलने वाले संकेतों को जोड़कर उन रुझानों का अनुमान लगाया जाता है, जो सीधे दिखाई नहीं देते। इस पद्धति में यह मानकर नहीं चला जाता कि हर क्षेत्र के आंकड़े उपलब्ध हैं। इसके बजाय, पर्यावरणीय संकेतों के आधार पर सांख्यिकीय संभावनाओं की मदद से संभावित नतीजों की एक सीमा का आकलन किया जाता है।

हमने अपने मॉडल में जलवायु, सांपों की प्रजातियों की विविधता और सामाजिक-आर्थिक संकेतकों से जुड़े आंकड़े शामिल किए। इसके बाद मॉडल ने उन विशिष्ट स्थानों पर सांप के काटने की घटनाएं होने की आशंका का आकलन किया, जहां सरकारी स्वास्थ्य अभिलेखों में कोई जानकारी दर्ज नहीं थी।

हमने अस्पतालों से मिले आंकड़ों और क्षेत्रीय आंकड़ों सहित विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी की तुलना जमीनी स्तर पर समुदायों के बीच किए गए सर्वेक्षणों के आंकड़ों से की। इससे हमारी पद्धति को ‘सर्प विषाक्तता’ के उन मामलों का भी आकलन करने में मदद मिली, जिनकी सूचना संबंधित अधिकारियों तक नहीं पहुंची थी। इस प्रक्रिया से हमें ‘सर्प विषाक्तता’ और इससे होने वाली मौतों की न्यूनतम अनुमानित संख्या के साथ-साथ संभावित अधिकतम संख्या का भी पता चला।

इस आधार पर हमारा अनुमान है कि दुनिया भर में हर साल कम से कम 21 लाख लोग ‘सर्प विषाक्तता’ के शिकार होते हैं। यह संख्या 70 लाख तक हो सकती है। आंकड़ों में बड़े पैमाने पर दर्ज न हो पाने वाले मामलों को ध्यान में रखकर तैयार किए गए हमारे मॉडल के अनुसार, हर साल सर्प विषाक्तता से होने वाली मौतों की संख्या 2.74 लाख से 5.13 लाख के बीच हो सकती है।

इस संकट का भौगोलिक फैलाव समान नहीं है। हमारे शोध के अनुसार, दुनिया भर में ‘सर्प विषाक्तता’ के कुल मामलों और इससे होने वाली मौतों में अकेले सहारा के दक्षिण में स्थित अफ्रीकी देशों की हिस्सेदारी 45 प्रतिशत है। संभवत? दशकों से इस क्षेत्र में संकट के वास्तविक पैमाने को कम करके आंका जाता रहा है। सहारा के दक्षिण में स्थित अफ्रीकी देशों में लोगों के ‘सर्प विषाक्तता’ का शिकार होने और इससे मृत्यु की दर दक्षिण एशिया की तुलना में लगभग तीन गुना है।

नाइजीरिया, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य और इथियोपिया जैसे देशों में यह समस्या बहुत अधिक है। इसकी प्रमुख वजह इन देशों में ग्रामीण आबादी का अधिक होना और कृषि भूमि में लोगों का सांपों के संपर्क में आने का अधिक जोखिम है।

सहारा के दक्षिण में स्थित अफ्रीकी देशों में संकट का असर सबसे अधिक क्यों? सहारा के दक्षिण में स्थित अफ्रीकी देशों में ‘सर्प विषाक्तता’ से होने वाला नुकसान असमान रूप से अधिक है। इसके पीछे संयोग नहीं, बल्कि व्यवस्था से जुड़ी समस्याएं हैं।

पहला कारण यह है कि इस महाद्वीप में विषैले सांपों की कई प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें सॉ-स्केल्ड वाइपर (इकिस प्रजाति), पफ एडर (बिटिस एरिएटन्स), अफ्रीकी कोबरा (नाजा प्रजाति) और मांबा (डेंड्रोएस्पिस प्रजाति) शामिल हैं। ये सांप पूरे महाद्वीप में बड़ी संख्या में लोगों के बीमार पड़ने और उनकी मौतों के लिए जिम्मेदार हैं।

दूसरा कारण यह है कि लाखों ग्रामीण खेतों में काम करते हैं, लेकिन उनके पास सुरक्षा प्रदान करने वाले जूते नहीं होते। रात में वे बिना रोशनी वाले रास्तों से गुजरते हैं। ऐसे में जब किसी को सांप काट लेता है तो अपर्याप्त स्वास्थ्य व्यवस्था, नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचने में लगने वाला लंबा समय और सर्पदंश के इलाज में इस्तेमाल होने वाली विषरोधी दवा की ऊंची कीमत या उसकी अनुपलब्धता मरीज की जान के लिए खतरा बढ़ा देती है। एशिया के कुछ हिस्सों में भी ऐसी ही परिस्थितियां पेश आती हैं।

हमारा अनुमान है कि हर साल आठ लाख से अधिक लोग सांप के काटने से बच तो जाते हैं, लेकिन उन्हें लंबे समय तक शारीरिक दिव्यांगता के साथ जीवन बिताना पड़ता है। इसमें अंग काटने की नौबत आना और दूसरी स्थायी शारीरिक अक्षमताएं शामिल हैं।

आगे के कदम
विश्व स्वास्थ्य संगठन के लक्ष्य को हासिल करने के लिए अटकलों पर निर्भर रहने के बजाय भौगोलिक जोखिम से जुड़े आंकड़ों का इस्तेमाल करना होगा, ताकि जमीनी स्तर पर प्रभावी नीतियां बनाई जा सकें। जिन क्षेत्रों में ‘सर्प विषाक्तता’ का जोखिम सबसे अधिक है, उनकी पहचान करके सरकारें और वैश्विक स्वास्थ्य संगठन कई महत्वपूर्ण कदम उठा सकते हैं। इनमें सबसे अधिक जरूरत वाले स्थानों पर सर्प विषरोधी औषधि का पर्याप्त भंडार रखना, अधिक प्रभावित ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं देने वाले र्किमयों को प्रशिक्षित करना और मरीजों को तेजी से अस्पताल पहुंचाने के लिए परिवहन व्यवस्था में सुधार करना शामिल हैं।

‘सर्प विषाक्तता’ लंबे समय से नजरअंदाज किया गया सकंट है। बेहतर आंकड़े अपने आप इस समस्या को खत्म नहीं कर सकते, लेकिन वे यह सुनिश्चित करने में मदद कर सकते हैं कि विषरोधी औषधियां, स्वास्थ्य सेवाएं और बचाव के प्रयास उन समुदायों तक पहुंचें, जिन्हें उनकी सबसे अधिक जरूरत है।

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