नयी दिल्ली/नागपुर. कांग्रेस और कई अन्य विपक्षी दलों ने मंगलवार को दावा किया कि विपक्ष के विरोध के कारण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ‘लेटरल एंट्री’ के मामले पर पीछे हटी और उसने संबंधित विज्ञापन वापस लेने का फैसला किया. उन्होंने यह भी दावा किया कि भारतीय जनता पार्टी आरक्षण खत्म करने की फिराक में है.
केंद्रीय कार्मिक राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की अध्यक्ष प्रीति सूदन को पत्र लिखकर विज्ञापन रद्द करने को कहा “ताकि कमजोर वर्गों को सरकारी सेवाओं में उनका उचित प्रतिनिधित्व मिल सके.” कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, ”संविधान जयते. हमारे दलित, आदिवासी, पिछड़े और कमज.ोर वर्गों के सामाजिक न्याय के लिए कांग्रेस पार्टी की लड़ाई ने आरक्षण छीनने के भाजपा के मंसूबों पर पानी फेरा है. लेटरल एंट्री पर मोदी सरकार की चिट्ठी ये दर्शाती है कि तानाशाही सत्ता के अहंकार को संविधान की ताकत ही हरा सकती है.”
उन्होंने दावा किया, ”राहुल गांधी, कांग्रेस और ‘इंडिया’ गठबंधन के घटक दलों की मुहिम से सरकार एक कदम पीछे हटी है, पर जब तक भाजपा-आरएसएस सत्ता में है, वो आरक्षण छीनने के नए-नए हथकंडे अपनाती रहेगी. हम सबको सावधान रहना होगा.” लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कहा कि वह संविधान और आरक्षण व्यवस्था की हर कीमत पर रक्षा करेंगे तथा भाजपा की ‘लेटरल एंट्री’ जैसी ”साजिशों” को हर हाल में नाकाम करके दिखाएंगे.
राहुल गांधी ने ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, ”संविधान और आरक्षण व्यवस्था की हम हर कीमत पर रक्षा करेंगे. भाजपा की ‘लेटरल एंट्री’ जैसी साजिशों को हम हर हाल में नाकाम कर के दिखाएंगे.” उन्होंने कहा, ”मैं एक बार फिर कह रहा हूं – 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा को तोड़ कर हम जातिगत गिनती के आधार पर सामाजिक न्याय सुनिश्चित करेंगे. जय हिन्द.” कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, ”नौकरशाही में बड़े पैमाने पर लेटरल एंट्री योजना के लिए कल शाम तक केंद्रीय मंत्रियों द्वारा मनमोहन सिंह को दोषी ठहराया जा रहा था. कुछ मेहरबान टिप्पणीकारों ने तो नेहरू को भी दोषी ठहरा दिया था. अब वही मंत्री अचानक पटरी से उतर गए हैं और नॉन-बायोलॉजिकल प्रधानमंत्री को सामाजिक न्याय का हिमायती बताने के लिए मजबूर हो रहे हैं, जो कि अब और अधिक बेनकाब हो चुके हैं. पाखंड की कोई सीमा नहीं है.”
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ”यूपीएससी में लेटरल एंट्री के पिछले दरवाज.े से आरक्षण को नकारते हुए नियुक्तियों की साजिश आखिरकार पीडीए की एकता के आगे झुक गयी है. सरकार को अब अपना यह फैसला भी वापस लेना पड़ा है.” उन्होंने कहा कि भाजपा के षड्यंत्र अब कामयाब नहीं हो पा रहे हैं, ये पीडीए में आए जागरण और चेतना की बहुत बड़ी जीत है. राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार में बैठे लोग दलित विरोधी, संविधान विरोधी और आरक्षण विरोधी है.
उन्होंने कहा, ”आरक्षण खत्म हो रहा है, लेकिन चिराग पासवान, जीतन राम माझी और नीतीश कुमार ने चुप्पी साधे हुए हैं. यह बड़े दुख की बात है. रामविलास पासवान जी होते आज ऐसा नहीं होने देते. लेकिन ये लोग सिर्फ सत्ता भोगना चाहते हैं.” राजद सांसद मनोज झा ने सवाल किया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आदेश पर लेटरल एंट्री का विज्ञापन निरस्त हुआ तो किसके आदेश पर इसे जारी किया गया था? उन्होंने कहा, ”उन्हें 240 सीटों के जनादेश को समझना चाहिए. संविधान से ऊपर कोई नहीं है. आप अपने आप कितना भी मजबूत समझिए, संविधान आपको मजबूर करेगा.” आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने आरोप लगाया कि भाजपा आरक्षण को खत्म करना चाहती है.
उन्होंने कहा, ”240 सीट पर रोके जाने के बावजूद भाजपा अपनी हरकत से बाज नहीं आ रही है. वह आरक्षण खत्म करना चाहती है.” ‘लेटरल एंट्री’ सीधी भर्ती की प्रक्रिया है जिसके माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों की केंद्र सरकार के मंत्रालयों एवं विभागों में कुछ निश्चित समय के लिए नियुक्ति की जाती है. ये र्भितयां सामान्यत: संयुक्त सचिव, निदेशक और उप सचिव के पदों पर की जाती हैं.
केंद्र सरकार ने ‘लेटरल एंट्री’ के माध्यम से 45 विशेषज्ञों की विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों में संयुक्त सचिव, निदेशक और उपसचिव जैसे प्रमुख पदों पर नियुक्ति करने की घोषणा की थी. आमतौर पर ऐसे पदों पर अखिल भारतीय सेवाओं-भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस), भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) और भारतीय वन सेवा (आईएफओएस) और अन्य ‘ग्रुप ए’ सेवाओं के अधिकारी तैनात किए जाते हैं.
भाजपा नीत केंद्र को ‘लेटरल एंट्री’ विज्ञापन वापस लेना पड़ा, उसके पास अब विकल्प नहीं है: आंबेडकर
वंचित बहुजन आघाडी (वीबीए) के प्रमुख प्रकाश आंबेडकर ने मंगलवार को कहा कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) जब पहले केंद्र में पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में थी तो मनमाने तरीके से काम करती थी, लेकिन अब उसके पास कोई विकल्प नहीं बचा है तथा चुनौती मिलने के बाद उसे नवीनतम ‘लेटरल एंट्री’ भर्ती को रद्द करना पड़ा.
संघ लोकसेवा आयोग (यूपीएससी) ने विभिन्न सरकारी विभागों में विशेषज्ञों को नियुक्त करने के लिए ‘लेटरल एंट्री’ के माध्यम से 45 संयुक्त सचिवों, निदेशकों एवं उपनिदेशकों की भर्ती के लिए शनिवार को अधिसूचना जारी की जिसके बाद विवाद पैदा हो गया.
इस फैसले की विपक्षी दलों ने आलोचना की और दावा किया कि इससे अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), अनुसूचित जाति (एससी) एवं अनुसूचित जनजाति (एसटी) के आरक्षण अधिकार कमजोर होंगे.
उसके बाद केंद्र ने आयोग से इस विज्ञापन को रद्द करने को कहा ”ताकि हाशिये पर रहने वाले समुदायों को सरकारी सेवाओं में उचित प्रतिनिधित्व मिले.” यूपीएससी ‘लेटरल एंट्री’ के जरिए सीधे उन पदों पर उम्मीदवारों की नियुक्ति करता है, जिन पदों पर भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के अधिकारियों की तैनाती होती है. इसमें निजी क्षेत्रों से अलग-अलग क्षेत्र के विशेषज्ञों को विभिन्न मंत्रालयों एवं विभागों में सीधे संयुक्त सचिव और निदेशक एवं व उपसचिव पदों पर नियुक्ति किया जाता है.