हिंदी न जानने की वजह से अलग-थलग नहीं पड़ना चाहते दक्षिण भारतीय: न्यायमूर्ति नागरत्ना

Author: Yogesh Kumar Sahu
UPDATED: Wed, 03 Dec 2025 11:01 PM
हिंदी न जानने की वजह से अलग-थलग नहीं पड़ना चाहते दक्षिण भारतीय: न्यायमूर्ति नागरत्ना
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नयी दिल्ली. उच्चतम न्यायालय की न्यायाधीश बी.वी. नागरत्ना ने बुधवार को कहा कि दक्षिण भारतीय लोग हिंदी नहीं जानने की वजह से अलग-थलग नहीं पड़ना चाहते हैं. न्यायमूर्ति नागरत्ना ने न्यायपालिका में हिंदी के इस्तेमाल से जुड़े एक सवाल के जवाब में यह टिप्पणी की. इसके साथ ही उन्होंने कहा कि उनकी टिप्पणी को राजनीतिक संदर्भ में नहीं लिया जाना चाहिए.

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि भारत एक उपमहाद्वीप है और कोई भी अपनी भाषा के मामले में बहुत विशिष्ट नहीं हो सकता है.
उन्होंने कहा कि संविधान की आठवीं अनुसूची में बहुत सारी भाषाएं शामिल हैं और दक्षिण भारत में कम-से-कम छह भाषाएं हैं.
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि कोई भी अपनी भाषा में बहुत विशिष्ट नहीं हो सकता है और अंग्रेजी भाषा विभिन्न दक्षिण भारतीय राज्यों को जोड़ने का काम करती है.

उन्होंने कहा कि अगर कोई तमिलनाडु जाता है तो वहां कोई भी अंग्रेजी या हिंदी नहीं बोलता है और ऐसे में संवाद एक मुद्दा बन जाता है.
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, “मैं किस तरह संवाद करूं? आपको भारत को एक उपमहाद्वीप समझना चाहिए. मेरी बात का राजनीतिक संदर्भ नहीं निकाला जाना चाहिए. जिला अदालतों में कन्नड़, तमिल जैसी हमारी अपनी व्यक्तिगत भाषाएं हैं. वहीं संवैधानिक अदालतों में अंग्रेजी आधिकारिक भाषा है.” उन्होंने कहा, “अन्यथा, हम न्यायाधीशों को विभिन्न उच्च न्यायालयों में कैसे स्थानांतरित कर सकते हैं? कृपया, इसमें किसी तरह का संतुलन रखें. संतुलन रखने की जरूरत इसलिए है, क्योंकि हम (दक्षिण भारतीय) हिंदी न जानने की वजह से अलग-थलग नहीं पड़ना चाहते. मैं दक्षिण से आती हूं और इस पर मेरा यही कहना है.” न्यायमूर्ति नागरत्ना ने यह टिप्पणी तब की, जब प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने अंग्रेजी में दक्षता न रखने वाले वकीलों के लिए उठाए जा रहे कदमों के बारे में एक महिला वकील की ओर से पूछे गए सवाल का जवाब दिया.

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, “किसी भी भाषा के प्रयोग के लिए हमें संवेदनशील होना होगा. मैं कई बार अदालत में वादियों और वकीलों से हिंदी में बोल देता हूं. हमें इस हिचक को खत्म करना है. यह ठीक है कि हमारी प्रक्रिया और कानून अंग्रेजी में बने हैं.” उन्होंने कहा, “मैं केवल हिंदी, गुजराती, तमिल की बात नहीं कर रहा हूं, बल्कि मैं मुख्य स्थानीय बोली की बात कर रहा हूं. हमें न्यायिक प्रणाली में वही भाषा बोलनी चाहिए, जो वादी सुनना चाहता है.” प्रधान न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) की ओर से ‘डब्ल्यूई-(कानून में महिला सशक्तीकरण): शक्ति, संघर्ष और सफलता’ विषय पर आयोजित एक परिचर्चा को संबोधित कर रहे थे.

उन्होंने कहा कि वह सभी भाषाओं को प्रोत्साहित करने का प्रयास करते हैं और हिंदी के राष्ट्रीय भाषा होने से उन्हें इसे बढ.ावा देने में गर्व महसूस होता है. न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि कानूनी पेशे में महिला वकीलों को बनाए रखने के लिए संस्थागत समर्थन जरूरी है.

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, “वरिष्ठों को प्रतिभाशाली महिला वकीलों को न केवल घरेलू हिंसा या पारिवारिक अदालत के मामले, बल्कि चुनौतीपूर्ण, जटिल दीवानी एवं आपराधिक मामले भी देने चाहिए ताकि वे अपनी प्रतिभा दिखा सकें. अदालत को (प्रतिभाशाली महिला वकीलों को) मौका देकर और उन्हें न्याय मित्र के रूप में नियुक्त करके समर्थन देना चाहिए.” उन्होंने कहा, “केंद्र सरकार के कानून अधिकारियों में तीस प्रतिशत महिलाएं होनी चाहिए. अगर महिलाओं को मौका दिया जाए, तो वे निश्चित रूप से अदालतों के सामने पैरवी करेंगी.”

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