नयी दिल्ली. रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह ‘स्पष्ट’ संदेश कि ‘आज का युग युद्ध का नहीं है’, यूरोप में बड़े पैमाने पर सकारात्मक रूप में लिया गया. भारत में जर्मनी के राजदूत फिलिस एकरमैन ने रविवार को यह बात कही.
उन्होंने भारत के इस रुख को भी सराहा कि देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान किया जाना चाहिए.
एकरमैन ने ‘पीटीआई-भाषा’ को दिए एक विशेष साक्षात्कार में यूक्रेन के चार क्षेत्रों पर रूस के कब्जे के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र में लाये गए प्रस्ताव पर भारत के बयान का जिक्र करते हुए कहा कि यूक्रेन में युद्ध को लेकर भारत के रुख में एक ‘निश्चित बदलाव’ आया है.
उन्होंने कहा कि रूस से कच्चा तेल खरीदने के लिए जर्मनी भारतीय पक्ष को ‘कसूरवार’ नहीं ठहराएगा, लेकिन वह उम्मीद करता है कि अंतरराष्ट्रीय कानूनों के पालन के संबंध में स्पष्ट रुख रखा जाए.
युद्ध से उपजे वैश्विक ऊर्जा संकट का उल्लेख करते हुए एकरमैन में कहा कि इससे निपटने के लिए समान विचारधारा वाले देशों के एक अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क की जरूरत है और जर्मनी, भारत की गिनती भी इस समूह में करता है. पुतिन के लिए युद्ध समाप्त करने के प्रधानमंत्री मोदी के संदेश के बारे में पूछे जाने पर जर्मन राजदूत ने कहा, ‘‘यह एक ऐसा संदेश है, जिसे यूरोप में बड़े पैमाने पर बहुत सकारात्मक रूप में लिया गया है. यह एक बहुत प्यारा संदेश है. पूरी दुनिया इसे सुन रही थी.’’
उन्होंने कहा, ‘‘मुझे लगता है कि यह एक बहुत ही स्पष्ट और जोरदार संदेश था. मैं बता नहीं सकता कि मैं प्रधानमंत्री मोदी से किस कदर सहमत हूं. इसलिए हम इस संदेश को सुनकर बहुत खुश हुए.’’ उज्बेकिस्तान में 16 सितंबर को पुतिन के साथ हुई द्विपक्षीय बैठक में मोदी ने कहा था कि ‘आज का युग युद्ध का युग नहीं है.’ उन्होंने रूसी राष्ट्रपति से संघर्ष को समाप्त करने का आग्रह किया था. यूक्रेन संकट से निपटने में यूरोप की रणनीति तैयार करने में जर्मनी अहम भूमिका निभा रहा है. उसने यूक्रेन में बड़े पैमाने पर मानवीय सहायता भेजने के साथ ही 10 लाख से अधिक यूक्रेनी शरणार्थियों को शरण दी है.
एकरमैन ने यूक्रेन के चार क्षेत्रों पर रूस के कब्जे के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र में पेश प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान भारत की ओर से दिए गए बयान का भी जिक्र किया. हालांकि, भारत इस प्रस्ताव पर मतदान से दूर रहा था. उन्होंने कहा, ‘‘निश्चित रूप से कुछ मुद्दों पर असहमति है. मैं कहूंगा कि अगर पिछले कुछ महीनों में आप इस संबंध में भारत की ओर से दिए गए बयानों को ध्यान से पढ़ेंगे तो आपको भारतीय रुख में एक स्पष्ट बदलाव दिखेगा.’’
जर्मन राजदूत ने कहा, ‘‘संयुक्त राष्ट्र में भारत के प्रतिनिधि ने रूसी कब्जे से जुड़े प्रस्ताव पर मतदान के दौरान क्या कहा, उसे हमने ध्यान से पढ़ा. दुर्भाग्य से, भारत ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया, लेकिन भारतीय प्रतिनिधि ने जो कहा, उससे स्पष्ट हो गया कि भारत का देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान पर बहुत जोर है.’’ एकरमैन ने कहा कि संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के लिए सम्मान अहम है तथा उन्हें संकट पर जर्मनी और भारत के रुख में समानताएं बढ़ती नजर आ रही हैं.
उन्होंने कहा, ‘‘मैं रूसियों से कच्चा तेल खरीदने के लिए भारत को कसूरवार नहीं ठहराऊंगा. हम बस यह स्पष्ट रुख रखने की उम्मीद करते हैं कि हमें अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन करना चाहिए.’’ एकरमैन की ये टिप्पणियां यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के खिलाफ पेश प्रस्तावों पर मतदान से भारत के लगातार नदारद रहने और नयी दिल्ली के मॉस्को से कच्चा तेल खरीदने को लेकर पश्चिमी देशों में बढ़ती नाराजगी के बीच आई हैं. भारत-जर्मनी संबंधों के बारे में बात करते हुए एकरमैन ने कहा कि संबंध ‘बहुत वृहद और अत्यंत व्यापक हैं.’ उन्होंने कहा, ‘‘कई मायनों में भारत-जर्मनी संबंधों की कोई सीमा नहीं है. मुझे उनका शानदार भविष्य नजर आता है.
एकरमैन ने बढ़ते वैश्विक ऊर्जा संकट से निपटने के लिए समान विचारधारा वाले देशों का एक नेटवर्क बनाने की वकालत की.
उन्होंने कहा, ‘‘मुझे लगता है कि हमें किसी भी तरह समान विचारधारा वाले देशों और राज्यों का एक अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क चाहिए और मैं भारत को भी इस समूह में गिनता हूं.’’ जर्मन राजदूत ने कहा, ‘‘मुझे लगता है कि हमें साथ बैठना चाहिए और हमारे दौर के ज्वलंत एवं तात्कालिक मुद्दों पर चर्चा करनी चाहिए. ऊर्जा सुरक्षा इनमें से एक है. हम रूस के जिस भयानक और आक्रामक युद्ध को देख रहे हैं, उसने हमें यह समझने के लिए प्रेरित किया है कि ऊर्जा संकट को जल्द से जल्द हल किया जाना चाहिए.’’ एकरमैन ने कहा कि जी-20 देशों को इंडोनेशिया में अगले माह होने वाले अपने अगले शिखर सम्मेलन में ऊर्जा संकट के मुद्दे पर चर्चा करनी चाहिए. हालांकि, उन्होंने संकेत दिया कि चूंकि, रूस इस समूह का हिस्सा है, इसलिए इस संबंध में एकजुट राय सामने नहीं आ सकती है.
जर्मन राजदूत ने कहा, ‘‘मैं समझता हूं कि जी-20 देशों को ऊर्जा समस्या से स्पष्ट रूप से निपटना चाहिए. मैं महसूस करता हूं कि जब आप इसमें से रूसी कारक को बाहर निकाल देते हैं तो मुझे इस मुद्दे पर जी-20 में जबरदस्त एकजुटता दिखाई देती है.’’ एकरमैन ने कहा कि अब समय आ गया है कि जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटाने के उपाय तलाशे जाएं और स्वच्छ ईंधन की उपलब्धता को विस्तार देने के लिए सहयोग बढ़ाया जाए.
उन्होंने कहा, ‘‘इस संबंध में भारत हमारे लिए एक महान शक्ति है. हमें लगता है कि हरित और सतत विकास के लिए हमने भारत के साथ मई में जो साझेदारी की थी, उसमें यह सब निहित है. हम जीवाश्म ईंधन की जगह अक्षय ऊर्जा स्रोतों को अपनाने के लिए भारतीय पक्ष के साथ मिलकर काम करेंगे.’’ भारत और जर्मनी के बीच गहराते द्विपक्षीय संबंधों पर अपनी टिप्पणियों का विस्तार करते हुए एकरमैन ने कहा कि आने वाले वर्षों में रक्षा और सामरिक संबंधों में और इजाफा होने वाला है.
उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन मैं कहूंगा कि रणनीतिक संबंधों में ऐसे प्रारूप भी शामिल हैं, जो बहुत महत्वपूर्ण हैं. जैसे कि हमने एक वरिष्ठ आधिकारिक स्तर की बैठक के दौरान अपने भारतीय समकक्षों के साथ चीन पर बातचीत शुरू की. हम आने वाले वर्षों में हमारे समाज के सामने आने वाले ज्वलंत और तात्कालिक प्रश्नों पर बात कर रहे हैं.’’ एकरमैन ने कहा, ‘‘हमारी जो रणनीतिक साझेदारी है, उसमें रक्षा से कहीं अधिक मुद्दे शामिल हैं.’’
जर्मनी ने कश्मीर पर अपना रुख नहीं बदला है: जर्मन राजदूत एकरमैन
जर्मनी ने रविवार को कहा कि उसने कश्मीर पर अपना रुख नहीं बदला है और इस जटिल विषय के समाधान के लिए ‘द्विपक्षीय तरीका’ ही उपयुक्त हो सकता है. भारत ने कुछ दिन पहले ही इस मुद्दे के समाधान के लिए संयुक्त राष्ट्र को शामिल करने की जर्मनी और पाकिस्तान के विदेश मंत्रियों की राय को खारिज कर दिया था.
भारत में जर्मनी के राजदूत फिलिप एकरमैन ने ‘पीटीआई-भाषा’ को दिये साक्षात्कार में कहा कि कश्मीर के मुद्दे पर कोई नयी जर्मन नीति नहीं है और र्बिलन इस मामले में अपने पुराने रुख पर कायम है. जर्मन विदेश मंत्री एनालेना बाएरबोक और पाकिस्तान के विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो जरदारी ने सात अक्टूबर को र्बिलन में संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में कश्मीर मुद्दे के समाधान के लिए संयुक्त राष्ट्र की संभावित भूमिका की बात की थी, जिसके बाद भारत ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी.
एकरमैन ने कहा, ‘‘स्पष्ट रूप से कहें तो हम मीडिया के रूखेपन से थोड़े हैरान हैं. आप जानते हैं कि मीडिया तथा सोशल मीडिया थोड़े रूखे हैं. हम इसका संज्ञान लेते हैं. स्पष्ट रूप से जिन शब्दों का उन्होंने (जर्मन विदेश मंत्री ने) इस्तेमाल किया, उससे थोड़ी गलतफहमी पैदा हुई.’’ उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि जर्मनी ने कश्मीर पर अपना रुख नहीं बदला है. हम अपने इस सतत रुख पर कायम हैं कि द्विपक्षीय वार्ता, द्विपक्षीय रास्ते से ही आगे बढ़ा जा सकता है और उन्होंने (जर्मन विदेश मंत्री ने) भी यह बात अपने बयान में कही थी.’’ जर्मन राजदूत ने कहा कि उनका देश इस मुद्दे पर अपने पूर्ववर्ती रुख पर कायम है.
उन्होंन कहा, ‘‘मैं इस मुद्दे पर ज्यादा विस्तार से बयान नहीं देना चाहता, लेकिन बयान में यह स्पष्ट है.’’ भारत हमेशा से कहता रहा है कि कश्मीर का मुद्दा पाकिस्तान और उसके बीच द्विपक्षीय विषय है और तीसरे पक्ष की इसमें कोई भूमिका नहीं है.
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अंिरदम बागची ने पाकिस्तान तथा जर्मनी के विदेश मंत्रियों की टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा था, ‘‘वैश्विक समुदाय के सभी गंभीर और न्यायप्रिय सदस्यों की अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद, विशेष रूप से सीमापार प्रकृति के आतंकवाद को धता बताने की जिम्मेदारी और भूमिका अपेक्षित है.’’ उन्होंने कहा, ‘‘भारत के केंद्रशासित प्रदेश जम्मू कश्मीर ने दशकों तक आतंकवादी गतिविधियों का दंश झेला है. जो अब तक जारी है.’’ विदेश मंत्री एस जयशंकर ने शनिवार को बाएरबोक से टेलीफोन पर विभिन्न विषयों पर बातचीत की थी.