हैदराबाद/नयी दिल्ली. एआईएमआईएम अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने बुधवार को कहा कि अलीगढ. मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) शुरू से ही अल्पसंख्यक संस्थान रहा है जिसने भारत के विकास में योगदान दिया है. एक दिन पहले ही केंद्र सरकार ने संस्थान के अल्पसंख्यक दर्जे पर विवाद के मामले की सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय में कहा था कि एएमयू अपने “राष्ट्रीय चरित्र” को देखते हुए अल्पसंख्यक संस्थान नहीं हो सकता है.
केंद्र ने कहा कि एएमयू किसी विशेष धर्म या धार्मिक संप्रदाय का विश्वविद्यालय नहीं है और न ही हो सकता है क्योंकि कोई भी विश्वविद्यालय जिसे राष्ट्रीय महत्व का संस्थान घोषित किया गया है वह अल्पसंख्यक संस्थान नहीं हो सकता है. शीर्ष अदालत के समक्ष दायर अपनी लिखित दलील में, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि 1875 में स्थापित विश्वविद्यालय, स्वतंत्रता-पूर्व युग में भी, हमेशा राष्ट्रीय महत्व का संस्थान रहा है.
इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए हैदराबाद से लोकसभा सदस्य ओवैसी ने ‘एक्स’ पर पोस्ट में कहा, “मोदी सरकार एएमयू के अल्पसंख्यक दर्जे का यह कहते हुए विरोध कर रही है कि यह एक “राष्ट्रीय संस्थान” है. संविधान का अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यकों द्वारा स्थापित और प्रशासित किसी भी संस्थान को संरक्षण प्रदान करता है. शुरू से ही एएमयू एक अल्पसंख्यक संस्थान रहा है जिसने भारत के विकास में योगदान दिया है.” ओवैसी ने कहा, “मुसलमानों के प्रति मोदी सरकार की नफरत सबके सामने है. वह मुसलमानों का उच्च शिक्षा प्राप्त करना और मुख्यधारा में शामिल होना बर्दाश्त नहीं कर सकती.”
कुछ कामकाज गैर-अल्पसंख्यकों के हाथ में होने से एएमयू का अल्पसंख्यक चरित्र कमजोर नहीं होता: न्यायालय
उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को अलीगढ. मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के विवादित अल्पसंख्यक दर्जे पर सुनवाई करते हुए कहा कि केवल यह तथ्य कि किसी शैक्षणिक संस्थान के प्रशासन का कुछ हिस्सा गैर-अल्पसंख्यक अधिकारियों द्वारा भी देखा जाता है, इसके अल्पसंख्यक चरित्र को ‘कमजोर’ नहीं करता है.
प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली शीर्ष अदालत की सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने रेखांकित किया कि संविधान का अनुच्छेद 30 कहता है कि प्रत्येक अल्पसंख्यक, चाहे वह धार्मिक हो या भाषाई, को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना का और उनका प्रशासन देखने का अधिकार होगा.
इस जटिल मुद्दे पर सुनवाई के दूसरे दिन पीठ ने कहा, ”केवल यह तथ्य कि किसी शैक्षणिक संस्थान के प्रशासन का कुछ हिस्सा गैर-अल्पसंख्यक अधिकारियों द्वारा भी देखा जाता है, जो संस्थान में अपनी सेवा या उसके साथ अपने जुड़ाव के चलते पक्ष रखने का प्रतिनिधित्व रखते हैं, इसके अल्पसंख्यक चरित्र को ‘कमजोर’ नहीं करता है.” पीठ ने कहा, ”लेकिन यह इस बिंदु तक नहीं हो सकता कि पूरा प्रशासन गैर-अल्पसंख्यक हाथों में है.” एएमयू के अल्पसंख्यक दर्जे का मुद्दा पिछले कई दशक से कानूनी प्रक्रिया में उलझा है.