शिक्षा, नौकरियों में मराठों को 10% आरक्षण से संबंधित विधेयक महाराष्ट्र विधानमंडल में पारित

Author: Yogesh Kumar Sahu
UPDATED: Tue, 20 Feb 2024 07:21 PM
शिक्षा, नौकरियों में मराठों को 10% आरक्षण से संबंधित विधेयक महाराष्ट्र विधानमंडल में पारित
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मुंबई. महाराष्ट्र विधानमंडल ने शिक्षा एवं सरकारी नौकरियों में मराठा समुदाय को 10 प्रतिशत आरक्षण प्रदान करने वाला विधेयक मंगलवार को सर्वसम्मति से पारित कर दिया. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने मराठा आरक्षण पर विधानमंडल के एक दिवसीय विशेष सत्र के दौरान सदन में महाराष्ट्र राज्य सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़ा विधेयक 2024 पेश किया. विधेयक को सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया. इसमें कहा गया कि महाराष्ट्र की कुल आबादी में मराठों की हिस्सेदारी 28 प्रतिशत है.

इसमें कहा गया है कि बड़ी संख्या में जातियां और समूह पहले से ही आरक्षित श्रेणी में हैं, जिन्हें कुल मिलाकर लगभग 52 प्रतिशत आरक्षण मिल रहा है. इसमें कहा गया है कि मराठा समुदाय को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) श्रेणी में रखना पूरी तरह से अनुचित होगा.
विधेयक में कहा गया है कि मराठा वर्ग का पिछड़ापन पिछड़े वर्गों और विशेष रूप से ओबीसी से इस अर्थ में भिन्न और अलग है कि यह अपने प्रसार के मामले में अधिक व्यापक है, यह अपनी पैठ में भिन्न है और चरित्र में और अधिक प्रतिगामी है.

विधेयक में यह भी प्रस्ताव किया गया है कि एक बार आरक्षण लागू हो जाने पर 10 साल बाद इसकी समीक्षा की जा सकती है.
राज्य में वर्तमान में मौजूद 52 प्रतिशत आरक्षण में से, अनुसूचित जाति 13 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति 7 प्रतिशत, ओबीसी 19 प्रतिशत, विशेष पिछड़ा वर्ग 2 प्रतिशत, विमुक्त जाति 3 प्रतिशत, घुमंतू जनजाति (बी) 2.5 प्रतिशत, घुमंतू जनजाति (सी) धनगर 3.5 प्रतिशत और घुमंतू जनजाति (डी) वंजारी 2 प्रतिशत के लिए पात्र हैं.

सदन में विधेयक पेश करने के बाद मुख्यमंत्री शिंदे ने कहा कि देश के 22 राज्य 50 प्रतिशत आरक्षण का आंकड़ा पार कर चुके हैं.
उन्होंने कहा, ”उदाहरण के लिए, तमिलनाडु राज्य में 69 प्रतिशत, हरियाणा में 67 प्रतिशत, राजस्थान में 64 प्रतिशत, बिहार में 69 प्रतिशत, गुजरात में 59 प्रतिशत और पश्चिम बंगाल में 55 प्रतिशत आरक्षण है. मैं अन्य राज्यों का भी उल्लेख कर सकता हूं. इस सत्र का उद्देश्य (मराठा) समुदाय की मदद करना है.”

उन्होंने कहा, ”हम राज्य में ओबीसी के मौजूदा कोटा को छुए बिना मराठा समुदाय को आरक्षण देना चाहते हैं. मराठा आरक्षण लाभ पाने के लिए पिछले 40 वर्षों से संघर्ष कर रहे हैं.” बाद में यह विधेयक राज्य विधान परिषद में भी सर्वसम्मति से पारित हो गया. अब इसे राज्यपाल रमेश बैस के पास उनकी मंजूरी के लिए भेजा जाएगा.

मराठा आरक्षण कार्यकर्ता मनोज जरांगे 10 फरवरी से भूख हड़ताल पर बैठे हैं और उन्होंने मांग की थी कि इस मुद्दे पर एक विशेष सत्र बुलाया जाए. सरकार ने हाल ही में एक मसौदा अधिसूचना जारी की थी जिसमें कहा गया है कि यदि किसी मराठा व्यक्ति के पास यह दिखाने के लिए दस्तावेजी सबूत है कि वह कृषक कुनबी समुदाय से है, तो उस व्यक्ति के रक्त संबंधियों को भी कुनबी जाति प्रमाण पत्र मिलेगा.

कुनबी समुदाय अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) श्रेणी में आता है और जरांगे मांग कर रहे थे कि सभी मराठों को कुनबी प्रमाणपत्र जारी किए जाएं. महाराष्ट्र के कैबिनेट मंत्री छगन भुजबल अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) कोटे में मराठों के “पिछले दरवाजे से प्रवेश” का विरोध कर रहे हैं, लेकिन समुदाय के लिए अलग आरक्षण के पक्ष में हैं.

वहीं, महाराष्ट्र राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग ने शुक्रवार को मराठा समुदाय के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक पिछड़ेपन पर अपने सर्वेक्षण पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत की. मुख्यमंत्री शिंदे द्वारा पेश किए गए विधेयक के प्रमुख निष्कर्षों में से एक यह रेखांकित करता है कि राज्य में मराठा समुदाय की आबादी 28 प्रतिशत है. गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले कुल मराठा परिवारों में से 21.22 प्रतिशत के पास पीले राशन कार्ड हैं. यह राज्य के औसत 17.4 प्रतिशत से अधिक है.

विधेयक के अनुसार, इस साल जनवरी और फरवरी के बीच किए गए राज्य सरकार के सर्वेक्षण में यह भी पाया गया कि मराठा समुदाय के 84 प्रतिशत परिवार प्रगतिशील श्रेणी में नहीं आते हैं, इसलिए वे इंद्रा साहनी मामले के अनुसार आरक्षण के लिए पात्र हैं. विधेयक में कहा गया है कि महाराष्ट्र में आत्महत्या करने वाले किसानों में से 94 प्रतिशत मराठा परिवारों से थे.

विधेयक में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि 1902 में, रार्जिष शाहू महाराज ने तत्कालीन कोल्हापुर रियासत में मराठा समुदाय को आरक्षण का लाभ दिया था, जबकि तत्कालीन मुंबई स्टेट ने भी अपनी रिपोर्ट में मराठा समुदाय को पिछड़े वर्गों में से एक के तौर पर मान्यता दी थी. मुंबई स्टेट के 23 अप्रैल, 1942 के एक प्रस्ताव में मराठा समुदाय को मध्यम और पिछड़े वर्गों में से एक के रूप में उल्लेखित किया गया था.

वर्ष 2017 में, राज्य सरकार ने सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति एम जी गायकवाड़ की अध्यक्षता वाले महाराष्ट्र राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग को आंकड़े संग्रह करने के लिए कहा और बाद में मराठों को आरक्षण प्रदान करने के लिए एक कानून बनाया. हालांकि इसे बम्बई उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई, लेकिन कानून उच्च न्यायालय की पड़ताल से पास हो गया, लेकिन उच्चतम न्यायालय ने इसे रद्द कर दिया.

न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) सुनील शुक्रे के तहत एक नया आयोग हाल ही में गठित किया गया था, जिसने राज्य में 1,58,20,264 परिवारों का सर्वेक्षण किया और 1,96,259 गणनाकारों की मदद से डेटा एकत्र किया. विधेयक के अनुसार, रिपोर्ट में पाया गया कि शैक्षिक संकेतक माध्यमिक शिक्षा पूरी करने और स्नातक और स्नातकोत्तर डिग्री और व्यावसायिक पाठ्यक्रम प्राप्त करने के मामले में मराठा समुदाय की निम्न शिक्षा को दर्शाते हैं. विधेयक के अनुसार, इसे शिक्षा में सबसे बड़ी बाधा के रूप में उल्लेखित किया गया है. विधेयक के अनुसार, अपर्याप्त शिक्षा अक्सर गरीबी लाती है.

इसमें कहा गया है कि विद्यालयों तथा सरकारी और अर्ध-सरकारी विभागों जैसे रोजगार की सारांश तालिकाओं से यह भी पता चला है कि मराठा वर्ग का सभी क्षेत्रों में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व है और इसलिए, वह इन सेवाओं में आरक्षण के माध्यम से विशेष सुरक्षा का हकदार है.

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