इंदौर: मध्यप्रदेश के इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पेयजल से हुई मौतों की जांच करने वाले एक सदस्यीय न्यायिक आयोग की 600 से अधिक पन्नों की अंतिम रिपोर्ट में नगर निगम की निविदा प्रक्रियाओं में लालफीताशाही और प्रशासनिक ढिलाई के कारण गंभीर देरी का खुलासा हुआ है।
उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायमूर्ति सुशील कुमार गुप्ता की अगुवाई वाले आयोग ने मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में पेश रिपोर्ट में कहा कि पुरानी और क्षतिग्रस्त पेयजल एवं सीवर पाइपलाइनों को बदलने तथा नयी पाइपलाइन बिछाने की प्रमुख निविदाओं में गंभीर देरी हुई।
रिपोर्ट के अनुसार, समय पर निविदाएं अंतिम रूप देकर काम पूरा कर लिया जाता तो क्षतिग्रस्त पाइपलाइन बदलकर दूषित पेयजल त्रासदी रोकी जा सकती थी। एक पाइपलाइन परियोजना में निविदा बुलाने से काम पूरा होने तक 859 दिन की असामान्य देरी हुई।
आयोग ने कहा कि पाइपलाइन बदलने में हुई देरी केवल प्रक्रिया की चूक नहीं, बल्कि घटना की अहम वजह थी। एक निविदा प्रक्रिया में तत्कालीन अपर आयुक्त रोहित सिसोनिया ने 15 अक्टूबर 2025 को फाइल पर ‘डिस्कस’ (चर्चा करें) लिखा, लेकिन कार्यपालन यंत्री संजीव कुमार श्रीवास्तव ने 15 अक्टूबर से 18 दिसंबर तक 64 दिनों में चर्चा नहीं कराई।
रिपोर्ट में कहा गया है कि 18 दिसंबर को चर्चा के बाद वित्तीय बोली खोलने की स्वीकृति के लिए फाइल 26 दिसंबर को दोबारा भेजी गई। इस तरह ‘चर्चा करें’ टिप्पणी के निपटारे में 72 दिन लगे। आयोग ने इसे गंभीर प्रशासनिक ढिलाई और घोर लापरवाही बताया। रिपोर्ट में निविदा और काम में देरी के लिए श्रीवास्तव तथा ठेकेदारों को मुख्य रूप से जिम्मेदार ठहराते हुए संबंधित अधिकारियों की विभागीय जांच और कानूनी कार्रवाई की सिफारिश की गई है।
पानी के नमूनों में ‘ई. कोलाई’ और ‘टोटल कोलीफॉर्म’ पाए गए, जिससे दूषित होने की पुष्टि हुई। इससे गैस्ट्रोएंटेराइटिस, उल्टी-दस्त और डिहाइड्रेशन जैसी बीमारियां फैलीं। मामला दिसंबर 2025 में सामने आया और स्थानीय लोगों तथा कांग्रेस ने 36 मौतों का दावा किया।
रिकॉर्ड के अनुसार दूषित पानी की आपूर्ति छह फरवरी तक जारी रही। स्वास्थ्य विभाग को 12 फरवरी तक 35 मौतों की जानकारी मिली, जिनमें 22 को दूषित पानी की घटना से संभवत? संबंधित माना गया।