नीतीश कुमार राजग में लौटे, रिकॉर्ड नौवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली

Author: Yogesh Kumar Sahu
UPDATED: Sun, 28 Jan 2024 09:59 PM
नीतीश कुमार राजग में लौटे, रिकॉर्ड नौवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली
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पटना. जनता दल-यूनाइटेड (जद-यू) के अध्यक्ष नीतीश कुमार ने एकबार फिर से पाला बदलने के बाद रविवार को रिकॉर्ड नौवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली.
कुमार ने ‘महागठबंधन’ और विपक्षी दलों के ‘इंडिया’ गठबंधन से संबंध विच्छेद करने के बाद भाजपा के साथ मिलकर राज्य में नयी सरकार बनाई, जिससे लगभग डेढ़ साल पहले उन्होंने नाता तोड़ लिया था.
बिहार के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने राज भवन में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा की उपस्थिति में कुमार को पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलायी. कुमार ने दिन में यह कहते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था कि बिहार में सत्तारूढ़ महागठबंधन और विपक्षी ‘इंडिया’ गठबंधन में उनके लिए ”चीजें ठीक नहीं चल रही थीं”.
भाजपा नेता सम्राट चौधरी और विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष विजय कुमार सिन्हा ने भी मंत्री पद की शपथ ली. दोनों उप मुख्यमंत्री बनाए गए हैं. इससे पहले, चौधरी और सिन्हा को भाजपा विधायक दल का क्रमश: नेता और उपनेता चुना गया. उन्होंने इस अवसर के लिए पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का आभार व्यक्त किया और ”लालू प्रसाद की पार्टी राजद के जंगलराज से बिहार की रक्षा करने का संकल्प लिया.”
जद(यू) नेता विजय कुमार चौधरी, विजेंद्र यादव और श्रवण कुमार के साथ ही पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की अगुवाई वाले हिंदुस्तान अवाम मोर्चा के संतोष कुमार सुमन और निर्दलीय विधायक सुमित सिंह ने भी मंत्री पद की शपथ ली.
कुमार और दोनों उपमुख्यमंत्री को बधाई देते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि बिहार में नव गठित राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की सरकार राज्य के लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी. उन्होंने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा कि उन्हें विश्वास है कि बिहार में नयी सरकार पूरे समर्पण भाव से लोगों की सेवा करेगी.
बिहार में 243 सदस्यीय विधानसभा में सबसे बड़े दल राष्ट्रीय जनता दल (राजद) का कोई नेता शपथ ग्रहण समारोह में उपस्थित नहीं था. लालू प्रसाद के बेटे तेजस्वी यादव ने कहा, ”आगामी विधानसभा चुनावों में जद(यू) का सफाया हो जाएगा. हमारे लिए खेल अभी खत्म नहीं हुआ है. खेल अभी शुरू हुआ है.” कुमार के ‘महागठबंधन’ छोड़ने तक तेजस्वी यादव राज्य के उपमुख्यमंत्री थे.
तेजस्वी के बड़े भाई तेज प्रताप यादव और सिंगापुर में रहने वाली उनकी बहन रोहिणी आचार्य ने ‘एक्स’ पर कई पोस्ट कर जद(यू) अध्यक्ष की तुलना एक ‘गिरगिट’ से की. भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) (भाकपा-माले) ने कुमार पर ”विश्वासघात” का आरोप लगाते हुए तीखा हमला किया. भाकपा-माले ने महागठबंधन सरकार को बाहर से समर्थन दिया था.
पार्टी के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने फेसबुक पर तीखी टिप्पणी करते हुए आरोप लगाया कि कुमार ”जिनका मुख्यमंत्री के रूप में सबसे लंबा कार्यकाल रहा है”, उन्हें आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ)-भाजपा अपने ”मोहरे के रूप में” इस्तेमाल करेंगे.
राजनीतिक रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर ने भी कुमार पर निशाना साधते हुए कहा, ”पाला बदलना उनकी राजनीति का हिस्सा बन गया है” और भाजपा को जदयू प्रमुख का समर्थन करने के लिए ”भारी कीमत” चुकानी पड़ सकती है, जिन्होंने अगस्त 2020 में भी उसे धोखा दिया था.
इससे पहले, कुमार ने अपना इस्तीफा सौंपने के बाद पत्रकारों से कहा था, ”अभी तक जो सरकार थी, वह अब समाप्त हो गयी है. मैंने इस्तीफा दे दिया है.”   कुमार (72) ने संकेत दिया कि वह राज्य में महागठबंधन और ‘इंडिया’ में हो रही चीजों से खुश नहीं थे. उन्होंने कहा कि उन्होंने ‘इंडिया’ को आकार देने में मदद की, लेकिन उनके प्रयासों को उचित रूप से नहीं सराहा गया.
कुमार ने कहा, ”आप सभी जानते हैं कि मैं इस गठबंधन में कैसे आया और मैंने इतने सारे दलों को एक साथ लाने के लिए कैसे काम किया, लेकिन हाल में चीजें ठीक नहीं चल रही थीं. मेरी पार्टी के नेताओं को भी यह अच्छा नहीं लग रहा था.” उन्होंने पिछले कुछ दिनों से राज्य में राजनीतिक उथल-पुथल पर अपनी गहरी चुप्पी का भी अप्रत्यक्ष जिक्र दिया. कुमार ने जद(यू) विधायक दल की एक बैठक के बाद इस्तीफा दे दिया था.
कुमार अगस्त 2022 में महागठबंधन में शामिल हुए थे. उन्होंने भाजपा पर जद (यू) को ”विभाजित” करने की कोशिश का आरोप लगाते हुए उससे नाता तोड़ लिया था. उन्होंने बहुदलीय गठबंधन के साथ नयी सरकार बनाई थी, जिसमें राजद, कांग्रेस और तीन वामपंथी दल शामिल थे.
जद (यू) सुप्रीमो ने 2000 में राज्य के मुख्यमंत्री पद की पहली बार शपथ ली थी, लेकिन उनकी सरकार एक सप्ताह के भीतर ही गिर गयी थी. वह 2005 में फिर मुख्यमंत्री बने और पांच साल बाद 2010 में पुन: सत्ता में लौटे.
भाजपा से 2013 में नाता तोड़ने के बाद भी कुमार सत्ता में बने रहे, क्योंकि जद(यू) को राजद के एक अंसतुष्ट वर्ग के अलावा कांग्रेस और भाकपा जैसे दलों से बाहर से समर्थन मिल गया था. उस समय जद (यू) के पास बहुमत के आंकड़े से कुछ ही सदस्य कम थे.
हालांकि, एक साल से भी कम समय बाद उन्होंने लोकसभा चुनाव में जद(यू) की हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया था. एक साल से भी कम समय बाद, जीतन राम मांझी को हटाकर उन्होंने नवंबर 2015 में मुख्यमंत्री के रूप में वापसी की. उस समय जद(यू), राजद और कांग्रेस गठबंधन ने विधानसभा चुनावों में जीत हासिल की थी.
जद (यू), कांग्रेस और राजद को लेकर बनाए गए महागठबंधन ने 2015 के विधानसभा चुनाव में जबर्दस्त जीत हासिल की, लेकिन यह सरकार महज दो साल में गिर गई. उन्होंने 2017 में तत्कालीन उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव पर भ्रष्टाचार के आरोप के खिलाफ कदम उठाते हुए भाजपा के साथ नयी सरकार बनाने के लिए इस्तीफा दे दिया था. वह 2020 के विधानसभा चुनाव में फिर मुख्यमंत्री बने. इस चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) ने जीत हासिल की थी, जबकि जद(यू) ने खराब प्रदर्शन किया था.
मौजूदा 243 सदस्यीय बिहार विधानसभा में जद(यू) के 45 और भाजपा के 78 विधायक हैं. कुमार को एक निर्दलीय सदस्य का भी समर्थन हासिल है. जीतन राम मांझी के नेतृत्व वाला हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा पहले से ही राजग का हिस्सा है. उसके चार विधायक हैं. राजद (79 विधायक), कांग्रेस(19 विधायक) और वाम दलों (16 विधायकों) के विधायकों को मिलाकर महागठबंधन के 114 विधायक हैं, जो बहुमत से आठ कम है.

 

नीतीश कुमार: बिहार में सबसे लंबे समय से मुख्यमंत्री, जिनकी पार्टी को अपने बूते कभी बहुमत नहीं मिला
जनता दल (यूनाइटेड) के अध्यक्ष नीतीश कुमार ने खुद को एक ऐसे नेता के रूप में स्थापित किया है, जिन्होंने सबसे लंबे समय तक बिहार में शासन किया, जबकि उनकी पार्टी कभी भी अपने दम पर बहुमत हासिल नहीं कर पाई. इस उपलब्धि के पीछे छिपा हुआ तथ्य और उनका राजनीतिक कौशल यह है कि नीतीश (72) कभी भी अपने सहयोगियों के साथ सहज नहीं रह सके, जिसके कारण उन्हें कई बार साझेदार बदलने पड़े.

भागलपुर से कांग्रेस विधायक अजीत शर्मा ने चुटकी लेते हुए कहा, ”जितनी बार नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ गठबंधन किया, साथ छोड़ा और फिर से गठबंधन किया, उसके लिए उनका नाम ‘गिनीज बुक ऑफ रिकॉर्ड्स’ में दर्ज होने लायक है.” शर्मा ने वर्ष 2013 में नीतीश के भाजपा से नाता तोड़ने के बाद की गई उनकी उस टिप्पणी का भी जिक्र किया, जिसमें उन्होंने (नीतीश ने) कहा था, ”मिट्टी में मिल जाएंगे मगर भाजपा के साथ नहीं जाएंगे.”

इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि अपने चार दशकों के राजनीतिक करियर में ”अवसरवादिता” का आरोप और ”पलटू राम” जैसे नामों के साथ नीतीश पर तंज कसा जाता रहा. हालांकि, उनके ऐसे प्रशंसकों की भी कमी नहीं है जो उन्हें भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद से दूर रहने और धार्मिक बहुसंख्यकवाद के आगे कभी नहीं झुकने वाला नेता करार देते रहे. एक मार्च, 1951 को पटना के बाहरी इलाके बख्तियारपुर में एक आयुर्वेदिक चिकित्सक-सह-स्वतंत्रता सेनानी के घर जन्मे नीतीश ने इले्ट्रिरकल इंजीनियरिंग की पढ.ाई की है.

पटना के बिहार इंजीनियरिंग कॉलेज (अब राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान) से पढ.ाई करने के समय नीतीश छात्र राजनीति में आए और ‘जेपी आंदोलन’ से जुड़े. इस आंदोलन में शामिल लालू प्रसाद और सुशील कुमार मोदी सहित अपने कई सहयोगियों से उनकी नजदीकी बढ.ी. फिर वह पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष और महासचिव बने. नीतीश को पहली चुनावी सफलता 1985 के विधानसभा चुनाव में मिली, जिसमें कांग्रेस ने शानदार जीत हासिल की, हालांकि वह लोकदल के लिए हरनौत सीट जीतने में कामयाब रहे.

पांच साल बाद, वह बाढ. सीट (अब समाप्त कर दी गई) से सांसद चुने गए. इसके बाद, जब मंडल लहर अपने चरम पर थी और प्रसाद इसका लाभ उठा रहे थे, नीतीश ने जॉर्ज फर्नांडीस के साथ मिलकर समता पार्टी बनाई, जो बाद में जनता दल (यूनाइटेड) में तब्दील हो गई. जद(यू) ने भाजपा के साथ केंद्र में सत्ता साझा की और, फिर 2005 से राज्य में सत्ता संभाली.

मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश के पहले पांच वर्षों को उनके आलोचकों द्वारा भी प्रशंसा के साथ याद किया जाता है क्योंकि नीतीश ने बिहार में कानून और व्यवस्था को मजबूत किया, जो आपराधिक घटनाओं और फिरौती के वास्ते अपहरण के लिए अक्सर चर्चा रहता था.

मंडल आयोग की लहर में उभरे कुर्मी नेता को यह भी एहसास हुआ कि वह बहुत अधिक आबादी वाले जाति से ताल्लुक नहीं रखते, जिसके बाद उन्होंने ओबीसी और दलितों के बीच उप-कोटा बनाया, जिन्हें ”अति पिछड़ा” (ईबीसी) और महादलित कहा गया. उनका यह निर्णय प्रमुख जाति समूहों -यादव और पासवान के समर्थकों को नागवार गुजरा. नीतीश सरकार ने हाल ही में सभी वंचित वर्गों के लिए कोटा बढ.ा दिया है, जिससे उन्हें उम्मीद है कि इस कदम से उनकी पार्टी को चुनावी बढ.त मिलेगी.

उन्होंने ”पसमांदा” मुसलमानों को भी संरक्षण दिया, जिसके चलते उनकी भाजपा के साथ संबंधों के बावजूद अल्पसंख्यक समुदाय में भी पैठ बनी. वर्ष 2013 में भाजपा से अलग होने के बाद भी नीतीश सत्ता में बने रहे क्योंकि उस समय बहुमत के आंकड़े से कुछ ही सदस्य कम रही जद(यू) को राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के असंतुष्ट गुट के अलावा कांग्रेस और भाकपा जैसी पार्टियों से बाहर से समर्थन मिला. हालांकि, एक साल बाद, उन्होंने लोकसभा चुनाव में जद(यू) की हार के लिए नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद छोड़ दिया.
एक साल से भी कम समय में उन्होंने जीतन राम मांझी को हटाकर मुख्यमंत्री के रूप में वापसी की और इस बार उन्हें राजद और कांग्रेस का भरपूर समर्थन मिला.

जद(यू), कांग्रेस और राजद के एक साथ आने से अस्तित्व में आए ‘महागठबंधन’ ने 2015 के विधानसभा चुनाव में शानदार जीत हासिल की, लेकिन केवल दो वर्षों में इसमें दरार पड़ गई. कुमार 2017 में भाजपा नीत राजग में लौट आए. पांच साल बाद, उनका फिर से भाजपा से मोहभंग हो गया और उन्होंने 2020 के विधानसभा चुनाव में जद(यू) की हार के लिए भाजपा को जिम्मेदार ठहराया क्योंकि चिराग पासवान ने अपनी लोक जनशक्ति पार्टी के टिकट पर भाजपा के कई बागियों को मैदान में उतारा था. अगस्त 2022 में वह महागठबंधन में वापस आए, जिसमें तीन वामपंथी दल भी शामिल हैं.

विजय कुमार सिन्हा सवर्ण जाति के भाजपा के कद्दावर नेता

बिहार में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अनुभवी और सवर्ण जाति से ताल्लुक रखने वाले नेता विजय कुमार सिन्हा राज्य विधानसभा में अध्यक्ष, राज्य सरकार में मंत्री और नेता प्रतिपक्ष जैसे विभिन्न पदों की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं. सिन्हा (64) को रविवार को भाजपा विधायक दल का उपनेता चुना गया और इसके साथ ही राज्य में नीतीश कुमार के नेतृत्व में बनने वाली नयी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार के दो उपमुख्यमंत्रियों में उनका भी नाम शामिल किए जाने की संभावना है.

लखीसराय जिले में एक स्कूल शिक्षक के घर में पैदा हुए सिन्हा लखीसराय विधानसभा क्षेत्र से लगातार तीसरी बार विधायक के रूप में निर्वाचित हुए हैं. प्रभावशाली भूमिहार समुदाय से ताल्लुक रखने वाले सिन्हा बरौनी पॉलिटेक्निक में सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा करने के दौरान ही राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (आरएसएस) की छात्र शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के सक्रिय सदस्य बन गए थे.

भाजपा में रहते हुए जमीनी स्तर के कार्यकर्ता के रूप में शुरुआत करने वाले सिन्हा वर्ष 2010 में पहली बार विधायक बने और सात साल बाद उन्हें श्रम संसाधन मंत्री बनाया गया. एक अनुभवी नेता के रूप में देखे जाने वाले सिन्हा को भाजपा द्वारा 2020 में बिहार विधानसभा के अध्यक्ष पद के लिए चुना गया. वर्ष 2020 विधानसभा चुनाव में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाईटेड (जद-यू) से बेहतर प्रदर्शन किया था. भाजपा ने विधानसभा चुनाव में अपने प्रदर्शन के चलते अध्यक्ष पद पर अपने नेता को प्राथमिकता देने पर जोर दिया था.

सिन्हा एक ऐसे नेता हैं, जिन्हें बिरले ही आपा खोते हुए या बिगड़ते हुए देखा गया है, फिर चाहे सदन के भीतर कुमार का आक्रोश हो या फिर राजद के सदस्यों द्वारा उन्हें उनके कक्ष के अंदर बंधक बनाए जाने जैसी घटनाएं हों, जो राज्य की सुर्खियों में रही थीं. सिन्हा ने वर्ष 2022 में नीतीश के राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेतृत्व वाले महागठबंधन से हाथ मिलाने और उन्हें विधानसभा अध्यक्ष पद से हटाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव लाने की धमकी के बाद राज्य विधानसभा के शीर्ष पद से इस्तीफा दे दिया था.

बाद में उन्होंने नेता प्रतिपक्ष का पद संभाला और तमिलनाडु में बिहार के लोगों के साथ कथित दुर्व्यवहार जैसे मुद्दों पर सरकार के खिलाफ मुखरता से आवाज उठाई. सरकार ने आरोपों की जांच के लिए अधिकारियों की एक टीम दक्षिणी राज्य में भेजी और आरोप सही नहीं पाए जाने पर भाजपा नेता से माफी की मांग की थी.

अब राजग छोड़कर कहीं और जाने का सवाल ही नहीं: नीतीश
बिहार में नाटकीय उलटफेर के बाद रविवार को रिकॉर्ड नौवीं बार प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले जदयू अध्यक्ष नीतीश कुमार ने दावा किया कि राजग छोड़कर अब उनके कहीं और जाने का कोई सवाल ही नहीं है. बिहार की महागठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री के तौर पर इस्तीफा देने के बाद महागठबंधन के साथ-साथ विपक्षी ‘इंडिया’ गठबंधन में स्थिति ठीक नहीं होने का दावा करने वाले कुमार को कुछ ही घंटों बाद राजग की नई सरकार के मुख्यमंत्री के रूप में यहां राजभवन में राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर ने शपथ दिलायी.
जदयू नेता कुमार (72) ने शपथ ग्रहण के बाद पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा, ”मैं पहले भी उनके (राजग) साथ था. हम अलग-अलग रास्तों पर चले गए लेकिन अब हम साथ हैं और रहेंगे….मैं जहां (राजग) था, वहां वापस आ गया और अब कहीं जाने का सवाल ही नहीं उठता.”  उन्होंने कहा कि रविवार को कुल आठ लोगों ने मंत्रिपद की शपथ ली और बाकी लोगों के नाम जल्द ही तय कर लिये जायेंगे. कुमार ने कहा कि भाजपा नेता सम्राट चौधरी और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष विजय कुमार सिन्हा उपमुख्यमंत्री होंगे. कुमार ने यह भी दोहराया कि वह बिहार के विकास के लिए प्रतिबद्ध हैं.

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