मैदान के अंदर और बाहर जंग जीती हैं वंदना कटारिया ने

Author: Yogesh Kumar Sahu
UPDATED: Tue, 31 Oct 2023 07:35 PM
मैदान के अंदर और बाहर जंग जीती हैं वंदना कटारिया ने
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नयी दिल्ली. दलित माता-पिता के यहां जन्मी वंदना कटारिया को बचपन से ही अपनी जाति के बारे में भद्दी टिप्पणियां सहनी पड़ीं लेकिन तब भी यह कल्पना करना मुश्किल था कि ओलंपिक सेमीफाइनल में अर्जेन्टीना के खिलाफ भारत की हार के बाद उत्तराखंड के हरिद्वार के रोशनाबाद इलाके में लोग उनके घर के सामने पटाखे जलाएंगे. वंदना उस समय तोक्यो में ही थी लेकिन विजय पाल नाम का एक व्यक्ति और उसके दोस्त उनके घर के सामने नाच रहे थे और उनके परिवार के सदस्यों को जातिसूचक अपशब्द कह रहे थे.

उस व्यक्ति को गिरफ्तार कर लिया गया लेकिन उसने सभी को दिखा दिया कि बाधाओं को पार करके ऊपर उठना और राष्ट्रीय टीम के लिए खेलना कितना कठिन है विशेषकर तब जब विरोधी टीम को पछाड़ने के लिए शानदार हॉकी खेलना ही काफी नहीं है. किसी को भी नस्लवाद, जातिवाद, गरीबी और सामाजिक वर्जनाओं से पार पाना सीखना होगा जो कभी आपका पीछा करना बंद नहीं करते. मंगलवार को वंदना सभी बाधाओं को पार करते हुए महिला एशियाई चैंपियन्स ट्रॉफी के दौरान जापान के खिलाफ 300वीं बार भारत के लिए खेलने उतरीं.

वंदना बचपन से ही हॉकी खिलाड़ी बनने का सपना देखती थीं लेकिन उन्हें दादी की घर का काम सीखने और घर बसाने की इच्छा जैसी सामाजिक रूढि.वादिता को हराना पड़ा. हर उभरते सितारे को एक हीरो की जरूरत होती है और वंदना के लिए वह उनके पिता नाहर सिंह कटारिया थे- उनकी ताकत के स्तंभ. स्वयं पहलवान रहे नाहर ने अपनी बेटी का पूरा समर्थन किया और वंदना को खेल में अपना करियर बनाने में मदद करने के लिए समाज और अपने परिवार के खिलाफ गए.

वंदना ने पीटीआई से कहा था, ”मेरे पिता पैसों की व्यवस्था करने के लिए इधर-उधर भागते थे ताकि मैं हॉकी खेलना जारी रख सकूं. मुझे नहीं पता कि खेल छात्रावास में मेरे रहने के लिए उन्हें पैसे कहां से मिले. मेरे पिता ने मुझ पर विश्वास करना कभी नहीं छोड़ा.” वंदना के पिता का तोक्यो ओलंपिक से ठीक पहले निधन हो गया और उस समय उनके टीम के साथी ही उनके समर्थन में आए थे.
विपरीत परिस्थितियों से निपटते हुए वंदना ने अपनी जिम्मेदारी निभाई जिससे भारत को तोक्यो में ऐतिहासिक चौथा स्थान हासिल करने में मदद मिली. उन्होंने ग्रुप चरण के दौरान दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ हैट्रिक सहित चार गोल किए.

शुरुआती दिनों में वंदना के पास ट्रेनिंग के लिए उचित सामान भी नहीं था लेकिन जीवन तब बदल गया जब वह अपने पहले कोच प्रदीप चिन्योति के मार्गदर्शन में पहुंची जिन्होंने उन्हें एक स्कूल टूर्नामेंट में देखा. प्रदीप ने उन्हें 2004 में मेरठ आने को कहा और आखिरकार कड़ी मेहनत सफल हुई जब उन्हें दो साल बाद 2006 में जूनियर महिला टीम में चुना गया.

उन्होंने भारत को जर्मनी के मोनशेंग्लाबाक मे 2013 जूनियर विश्व कप में कांस्य पदक दिलाने में मदद की. वह पांच गोल के साथ टूर्नामेंट में देश की शीर्ष स्कोरर रहीं. वंदना में गति, कौशल और विपक्षी रक्षापंक्ति में सेंध लगाने की क्षमता है जो उन्हें दूसरों से अलग बनाता है. उन्हें 2016 एशियाई चैंपियंस ट्रॉफी में भारतीय महिला टीम का नेतृत्व करते हुए देखा गया जहां उनके नेतृत्व में देश ने फाइनल में चीन को 2-1 से हराकर खिताब जीता.

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