आपका आचरण विश्वसनीय नहीं, आप पेश ही क्यों हुए : न्यायालय ने न्यायमूर्ति वर्मा से कहा

Author: Yogesh Kumar Sahu
UPDATED: Wed, 30 Jul 2025 11:12 PM
आपका आचरण विश्वसनीय नहीं, आप पेश ही क्यों हुए : न्यायालय ने न्यायमूर्ति वर्मा से कहा
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नयी दिल्ली. उच्चतम न्यायालय ने नकदी बरामदगी मामले में आंतरिक जांच समिति की रिपोर्ट को अमान्य करार देने का अनुरोध करने वाले न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के आचरण को विश्वसनीय न बताते हुए बुधवार को उनसे तीखे सवाल पूछे. साथ ही शीर्ष अदालत ने किसी भी न्यायिक कदाचार पर कार्रवाई करने के प्रधान न्यायाधीश के अधिकार का समर्थन करते हुए कहा कि वह महज एक ”डाकघर” नहीं हो सकते, बल्कि राष्ट्र के प्रति उनके कुछ कर्तव्य हैं. आंतरिक समिति की रिपोर्ट में न्यायमूर्ति वर्मा को कदाचार का दोषी पाया गया था.

शीर्ष अदालत ने न्यायमूर्ति वर्मा से पूछा कि वह आंतरिक जांच समिति के समक्ष क्यों पेश हुए और उसे वहीं चुनौती क्यों नहीं दी.
अदालत ने न्यायमूर्ति वर्मा से कहा कि उन्हें समिति की रिपोर्ट के खिलाफ उच्चतम न्यायालय पहले आना चाहिए था. न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति एजी मसीह की पीठ ने कहा कि आंतरिक जांच प्रक्रिया 1999 में लागू की गई थी और भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) को महज ”डाकघर” नहीं माना जा सकता.

पीठ ने कहा, ”भारत के प्रधान न्यायाधीश से केवल ”डाकघर” होने की अपेक्षा नहीं की जाती. न्यायपालिका के प्रमुख के रूप में राष्ट्र के प्रति उनके कुछ कर्तव्य हैं.” उसने कहा कि अगर भारत के प्रधान न्यायाधीश के सामने यह मानने के लिए कोई दस्तावेज है कि किसी न्यायाधीश ने कदाचार किया है, तो वह राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को सूचित कर सकते हैं.

पीठ ने कहा, ”आगे बढ़ना या नहीं बढ़ना, राजनीतिक निर्णय से तय होगा. लेकिन न्यायपालिका को समाज को यह संदेश देना है कि प्रक्रिया का पालन किया गया है.” न्यायमूर्ति वर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि उन्हें हटाने की आंतरिक जांच समिति की सिफारिश असंवैधानिक है.

सिब्बल ने अदालत से कहा कि इस तरह की कार्यवाही की सिफारिश करने से खतरनाक मिसाल कायम होगी. उन्होंने कहा कि न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने पहले उच्चतम न्यायालय का रुख इसलिए नहीं किया, क्योंकि टेप जारी हो चुका था और उनकी छवि खराब हो चुकी थी. शीर्ष अदालत ने न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का अनुरोध करने वाले वकील मैथ्यूज जे नेदुम्परा से भी सवाल पूछे. सुनवाई के दौरान, न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता ने नेदुम्परा से सवाल किया कि क्या उन्होंने प्राथमिकी दर्ज करने के अनुरोध से पहले पुलिस से औपचारिक शिकायत की.

शीर्ष अदालत ने न्यायमूर्ति वर्मा की याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया. न्यायामूर्ति वर्मा ने याचिका में आंतरिक जांच प्रक्रिया और उन्हें हटाने से संबंधित भारत के प्रधान न्यायाधीश की सिफारिश को चुनौती दी है. न्यायालय ने प्राथमिकी दर्ज करने से संबंधित नेदुम्परा की याचिका पर भी आदेश सुरक्षित रख लिया. न्यायमूर्ति वर्मा ने भारत के तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना की आठ मई की सिफारिश को भी रद्द करने का अनुरोध किया है, जिसमें खन्ना ने संसद से वर्मा के खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही शुरू करने का आग्रह किया था.

न्यायमूर्ति वर्मा ने आरोप लगाया कि समिति की रिपोर्ट पहले से तय विमर्श पर आधारित है और ऐसा लगता है कि प्रक्रियात्मक निष्पक्षता की परवाह किए बिना मामले को निपटाने की जल्दबाजी के साथ जांच की गई. याचिका में कहा गया है कि जांच समिति ने उन्हें पूर्ण एवं निष्पक्ष तरीके से अपना पक्ष रखने का अवसर दिए बिना प्रतिकूल निष्कर्ष निकाला.

मामले की जांच कर रही समिति की रिपोर्ट में कहा गया था कि न्यायमूर्ति वर्मा और उनके परिवार के सदस्यों का उस ‘स्टोर रूम’ पर किसी न किसी तरह से नियंत्रण था, जहां आग लगने के बाद बड़ी मात्रा में नोटों की अधजली गड्डियां मिली थीं. समिति ने कहा कि इससे न्यायमूर्ति वर्मा का कदाचार साबित होता है और यह इतना गंभीर है कि उन्हें पद से हटाया जाना चाहिए.

पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश शील नागू की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की समिति ने 10 दिन तक जांच की, 55 गवाहों से पूछताछ की और न्यायमूर्ति वर्मा के आधिकारिक आवास पर उस स्थान का दौरा किया, जहां 14 मार्च को रात करीब 11:35 बजे आग लगी थी. घटना के समय न्यायमूर्ति वर्मा दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश थे और फिलहाल वह इलाहाबाद उच्च न्यायालय में न्यायाधीश हैं. तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश खन्ना ने रिपोर्ट पर गौर करने के बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखकर न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ महाभियोग चलाने की सिफारिश की थी.

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