The Vvaan Movie Review: सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया की फिल्म ‘द वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट’ 25 सितंबर 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। फिल्म की कहानी बिहार की लोककथाओं, वन देवी, रहस्यमयी जंगल, पारिवारिक विरासत और छठ पूजा की पृष्ठभूमि में बुनी गई है। फिल्म में कई बड़े विचार और अलग-अलग जॉनर को एक साथ जोड़ने की कोशिश की गई है, लेकिन मजबूत स्क्रीनप्ले के अभाव में कहानी बिखरी हुई महसूस होती है।
रेटिंग: 2/5
क्या है फिल्म की कहानी?
फिल्म में सिद्धार्थ मल्होत्रा ने ऋषि का किरदार निभाया है। ऋषि मुंबई में रहता है और लंबे समय से अपने गांव देवांचल नहीं गया है। पत्नी ममता यानी तमन्ना भाटिया के साथ उसकी जिंदगी में बच्चे की कमी और पुराने मिसकैरेज का दर्द मौजूद है।
छठ पूजा के दौरान दोनों गांव लौटते हैं। ऋषि का उद्देश्य पुश्तैनी जमीन बेचना भी है। इसी इलाके में मौजूद देव वन को लेकर गांव में कई मान्यताएं हैं। कहा जाता है कि यहां वन देवी का वास है और सूर्यास्त के बाद जंगल में जाना मना है।
ऋषि इन मान्यताओं को अंधविश्वास मानता है। लेकिन एक घटना के बाद उसे देव वन में जाना पड़ता है और यहीं से कहानी रहस्य, लोककथा और फैंटेसी की दुनिया में प्रवेश करती है।
कहानी में कई आइडिया, लेकिन मजबूत कनेक्शन नहीं
फिल्म में वन देवी, राजा का वंश, रहस्यमयी कवच, बुरी शक्तियां, गांव की राजनीति और छठ पूजा जैसे कई तत्व मौजूद हैं। समस्या यह है कि इन सभी को जोड़ने वाली कहानी उतनी मजबूत नहीं बन पाती।
शुरुआत में फिल्म रहस्य पैदा करती है और उम्मीद जगाती है कि आगे चलकर कहानी दिलचस्प मोड़ लेगी। लेकिन जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, नए-नए ट्विस्ट जुड़ते जाते हैं और मूल कहानी का फोकस कमजोर होता जाता है।
सिद्धार्थ मल्होत्रा की एक्टिंग
सिद्धार्थ मल्होत्रा फिल्म में एक ऐसे किरदार की भूमिका निभाते हैं जो शुरुआत में लोक मान्यताओं और देवी-देवताओं में विश्वास नहीं करता। घटनाओं के साथ उसके नजरिए में बदलाव आना कहानी का अहम हिस्सा है।
हालांकि, इस बदलाव में डर, असमंजस और विश्वास की भावनाएं उतनी प्रभावी तरीके से स्क्रीन पर नहीं उभरतीं। कई दृश्यों में उनका अभिनय और डायलॉग डिलीवरी सपाट महसूस होती है। किरदार के गांव से जुड़े होने का प्रभाव भी उनकी बॉडी लैंग्वेज में बहुत ज्यादा दिखाई नहीं देता।
तमन्ना भाटिया और बाकी कलाकार
तमन्ना भाटिया फिल्म में ममता के किरदार में हैं। उनका लुक और खासकर छठ पूजा वाले दृश्य आकर्षक हैं, लेकिन उनके किरदार को कहानी में पर्याप्त गहराई नहीं मिलती।
सुनील ग्रोवर ने नकारात्मक भूमिका निभाई है। उन्होंने किरदार को निभाने की कोशिश की है, लेकिन उनकी कॉमिक छवि के कारण गंभीर और हिंसक दृश्यों का प्रभाव कुछ जगह कम हो जाता है।
मनीष पॉल और सुलभा आर्या के हिस्से में कॉमेडी है, लेकिन फिल्म की गंभीर और रहस्यमयी कहानी के बीच यह कॉमेडी कई जगह जबरदस्ती जोड़ी गई लगती है।
निर्देशन में क्या कमी रह गई?
निर्देशक दीपक कुमार मिश्रा के पास गांव और कस्बाई माहौल को पर्दे पर उतारने का अनुभव है, लेकिन इस फिल्म में कहानी का टोन लगातार बदलता रहता है। कभी फिल्म लोककथा नजर आती है, कभी हॉरर, कभी फैंटेसी और कभी सुपरहीरो फिल्म।
इस वजह से फिल्म अपनी एक स्पष्ट पहचान बनाने में संघर्ष करती है। जिस देव वन को फिल्म का सबसे डरावना और रहस्यमयी हिस्सा बनाया जा सकता था, वह कई दृश्यों में सिर्फ एक खूबसूरत लोकेशन बनकर रह जाता है।
कमजोर VFX ने भी किया निराश
फिल्म की कहानी फैंटेसी और सुपरहीरो तत्वों पर काफी निर्भर करती है। ऐसे में VFX की भूमिका महत्वपूर्ण थी। लेकिन कुछ दृश्यों में विजुअल इफेक्ट्स अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ पाते।
खासकर क्लाइमैक्स के एक्शन और हवा में उड़ने वाले दृश्यों में VFX और स्लो-मोशन का इस्तेमाल भव्यता पैदा करने के बजाय कृत्रिम महसूस होता है।
बिहार और छठ पूजा की झलक
फिल्म की कहानी बिहार और वहां की लोक मान्यताओं से जुड़ी है। छठ पूजा भी फिल्म का महत्वपूर्ण हिस्सा है। छठ पूजा के दृश्य देखने में अच्छे लगते हैं और फिल्म को सांस्कृतिक पृष्ठभूमि देते हैं।
हालांकि, कई जगह बिहार की संस्कृति कहानी का स्वाभाविक हिस्सा बनने के बजाय बैकड्रॉप जैसी महसूस होती है। सजावट और लोकेशन तो नजर आती है, लेकिन स्थानीय जीवन और लोकविश्वास की गहराई उतनी प्रभावी नहीं बन पाती।
स्क्रीनप्ले सबसे बड़ी कमजोरी
फिल्म की सबसे बड़ी समस्या इसकी लेखन और पटकथा है। कहानी में विचारों की कमी नहीं है, लेकिन उनका आपसी तालमेल कमजोर है।
ऋषि का तर्कवादी व्यक्ति से आस्था की ओर बढ़ना भी अचानक महसूस होता है। इसी तरह कई रहस्यों के समाधान कहानी को मजबूत करने के बजाय कुछ जगह सस्पेंस को कमजोर कर देते हैं।
देखें या छोड़ दें?
‘द वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट’ में एक अनोखी लोककथा को बड़े पर्दे पर पेश करने की महत्वाकांक्षा दिखाई देती है। फिल्म में माइथोलॉजी, फैंटेसी, हॉरर, सुपरहीरो तत्व और छठ पूजा का मिश्रण है, लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले, असंगत टोन और कुछ कमजोर VFX के कारण इसका असर सीमित रह जाता है।
फिल्म की कहानी और प्रस्तुति दर्शकों को लगातार जोड़े रखने में संघर्ष करती है। तमन्ना भाटिया की स्क्रीन प्रेजेंस और छठ पूजा के दृश्य कुछ आकर्षण जरूर जोड़ते हैं, लेकिन कुल मिलाकर फिल्म का प्रभाव उसकी महत्वाकांक्षा के अनुरूप नहीं बन पाता।