सिंडिकेट, अवैध वसूली और केस के मुख्य पहलू
1. ऑनलाइन परमिट बंद कर शुरू की गई अवैध उगाही: जांच में सामने आया कि 15 जुलाई 2020 को खनिज विभाग के तत्कालीन संचालक समीर विश्नोई के आदेश से ऑनलाइन कोयला परिवहन परमिट को बंद कर ऑफलाइन कर दिया गया था। इसके बाद प्रति टन 100 रुपये और वाशरी से निकलने पर 25 रुपये अतिरिक्त की अवैध लेवी वसूली जाने लगी। कोरबा और रायगढ़ में विशेष कार्यालय खोलकर निखिल चंद्राकर के माध्यम से पैसों का नेटवर्क संचालित किया गया।
2. बेनामी संपत्तियां और आभूषण खरीद: घोटाले की रकम से आरोपियों ने बड़े पैमाने पर संपत्तियां और आभूषण खरीदे। तत्कालीन मुख्यमंत्री की उप सचिव सौम्या चौरसिया ने ₹31 करोड़ प्राप्त कर 22 संपत्तियां खरीदीं, वहीं निलंबित आईएएस रानू साहू ने ₹5.52 करोड़ लेकर 13 संपत्तियां बनाईं। पूर्व विधायक चंद्रदेव राय ने वसूली के पैसों से 60 ग्राम सोने का हार खरीदा और मुख्य आरोपी सूर्यकांत तिवारी से इसकी सहमति भी ली।
3. चुनावों और मीडिया प्रबंधन में फंड का इस्तेमाल: विधायक देवेंद्र यादव को मिली ₹3 करोड़ की रकम खैरागढ़ उपचुनाव और उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में खर्च की गई। कांग्रेस प्रवक्ता आरपी सिंह ने ₹2.01 करोड़ और विनोद तिवारी ने ₹1.87 करोड़ लेकर चुनाव प्रबंधन और संपत्तियों में लगाए जाने की बात कबूली है।
4. वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की संलिप्तता व जासूसी: मामले की जांच में IPS अधिकारी पारुल माथुर, प्रशांत अग्रवाल और भोजराम पटेल के भी सिंडिकेट के संपर्क में रहने और विभागीय जानकारियां लीक करने के आरोप हैं। एक आरक्षक पर जांच एजेंसियों के अधिकारियों की जासूसी का भी आरोप है।