“पिप्पा” फिल्म के गीत को लेकर छिड़े विवाद पर निर्माताओं ने दी सफाई

Author: Yogesh Kumar Sahu
UPDATED: Mon, 13 Nov 2023 10:11 PM
“पिप्पा” फिल्म के गीत को लेकर छिड़े विवाद पर निर्माताओं ने दी सफाई
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नयी दिल्ली. “पिप्पा” फिल्म की टीम ने सोमवार को कहा कि काजी नजरुल इस्लाम के गीत “करार ओय लोहो कोपट” को नए तरीके से पेश करने से पहले आवश्यक संशोधन अधिकार हासिल किए गए थे. संगीतकार ए. आर. रहमान ने फिल्म में इस्लाम के प्रसिद्ध गीत को नए रूप में पेश किया है, हालांकि कुछ दिन पहले इसे कथित तौर पर गलत तरीके से पेश करने के कारण विवाद खड़ा हो गया था.

इस्लाम के पोते और चित्रकार काजी अनिर्बान ने दावा किया कि परिवार ने निर्माताओं को गीत का उपयोग करने की अनुमति दी थी, लेकिन धुन और लय बदलने की नहीं. ‘आरएसवीपी’ और ‘रॉय कपूर फिल्म्स’ द्वारा निर्मित “पिप्पा” की टीम ने एक बयान में कहा वह मूल रचना, इस्लाम और “भारतीय उपमहाद्वीप के संगीत, राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य” में उनके अथाह योगदान का बहुत सम्मान करती है.

टीम ने कहा कि यह गीत बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम में शामिल लोगों को श्रद्धांजलि देने के लिए बनाया गया था. बयान में कहा गया है, “करार ओय लोहो कोपट गाने को लेकर मौजूदा बहस के आलोक में फिल्म पिप्पा के निर्माता, निर्देशक और संगीतकार यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि गीत की हमारी प्रस्तुति एक ईमानदार कलात्मक व्याख्या है. स्वर्गीय श्री काजी नजरुल इस्लाम के संबंधितों से आवश्यक अधिकार हासिल करने के बाद ही इसे तैयार किया गया था.” ईशान खट्टर और मृणाल ठाकुर अभिनीत फिल्म “पिप्पा” 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध पर आधारित है. फिल्म का निर्देश राजा कृष्ण मेनन ने किया है.

‘विद्रोही कवि’ के नाम से मशहूर इस्लाम का जन्म 1899 में वर्तमान पश्चिम बंगाल के पश्चिम बर्धमान जिले में हुआ था. उनके गीतों को ‘नजरुल गीति’ के नाम से जाना जाता है, जो संभवत? लोकप्रियता के मामले में बंगाल में रवीन्द्रनाथ टैगोर के बाद दूसरे स्थान पर हैं. बाद में इस्लाम बांग्लादेश के राष्ट्रीय कवि बने. 1976 में उनका निधन हो गया था.

इस्लाम के पोते काजी अनिर्बान, पोती अनिंदिता काजी, लोकप्रिय बांग्ला गायक हैमंती शुक्ला और बांग्लादेश में रहने वाले इस्लाम की एक और पोती खिलखिल काजी ने कृति को “विकृत” करने के लिए फिल्म निर्माताओं की आलोचना की है. यह गीत पहली बार 1922 में ‘बांग्लार कथा’ (बंगाल की कहानियां) पत्रिका में प्रकाशित हुआ था और इस्लाम की कृतियों की पुस्तक ‘भांगर गान’ (मुक्त होने के गीत) में शामिल किया गया था. इसे पहली बार 1949 में एक प्रसिद्ध संगीत कंपनी ने और फिर 1952 में एक अन्य कंपनी ने रिकॉर्ड किया था.
इस मामले पर रहमान की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है.

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