निजी स्थानों पर ‘प्राण प्रतिष्ठा’ कार्यक्रमों के लिए मंजूरी जरूरी नहीं : मद्रास उच्च न्यायालय

Author: Yogesh Kumar Sahu
UPDATED: Mon, 22 Jan 2024 09:37 PM
निजी स्थानों पर ‘प्राण प्रतिष्ठा’ कार्यक्रमों के लिए मंजूरी जरूरी नहीं : मद्रास उच्च न्यायालय
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चेन्नई/नयी दिल्ली. मद्रास उच्च न्यायालय ने सोमवार को तमिलनाडु में श्री राम मंदिर में ‘श्री राम लला’ की प्राण प्रतिष्ठा से संबंधित कार्यक्रमों के आयोजन पर राज्य सरकार के रुख का हवाला देते हुए कहा कि निजी परिसरों में कार्यक्रमों के लिए किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं है. साथ ही अदालत ने कहा कि भगवान के प्रति भक्ति केवल शांति और खुशहाली के लिए है, न कि इसका उद्देश्य सामाजिक संतुलन को बिगाड़ना है.

उत्तर प्रदेश के अयोध्या में भव्य मंदिर में ‘श्री राम लला’ की ‘प्राण प्रतिष्ठा’ को लेकर उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि समारोह के सीधे प्रसारण की व्यवस्था करने का अधिकार आयोजकों पर छोड़ा जाएगा. न्यायमूर्ति एन. आनंद वेंकटेश ने एक रिट याचिका पर आदेश पारित किया, जिसमें सहायक पुलिस आयुक्त, अवाडी डिवीजन, पट्टाभिराम डिवीजन प्रभारी (प्रथम प्रतिवादी) द्वारा शहर के पट्टाभिराम में एक विवाह हॉल में सोमवार को भजन और अन्नदानम आयोजित करने की अनुमति देने से इनकार किए जाने के आदेश को चुनौती दी गई थी. याचिका एल गणपति ने दायर की थी.

राज्य की ओर से पेश हुए अतिरिक्त लोक अभियोजक ए. दामोदरन ने कहा कि मंडप, निजी मंदिरों और किसी अन्य निजी स्थान जैसे निजी परिसरों में आयोजित किए जाने वाले कार्यक्रमों, भजन और अन्नदानम के लिए पुलिस से किसी भी अनुमति की आवश्यकता नहीं होती है. उनके अनुसार, अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा समारोह के सीधे प्रसारण की व्यवस्था का जिम्मा आयोजकों का होगा.

न्यायाधीश ने कहा, ”राज्य सरकार और पुलिस द्वारा उठाए गए उपरोक्त रुख से यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है कि इस अवसर को ध्यान में रखते हुए समारोह आयोजित करना, भजन गाना/राम नाम का उच्चारण करना, (अन्नदानम का आयोजन) करना अपने आप में निषिद्ध या प्रतिबंधित नहीं है. इनका आयोजन इस बात को ध्यान में रखते हुए किया जाए कि यह सब आज कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा किए बिना जिम्मेदारीपूर्ण तरीके से होगा.” अदालत ने याचिका का निपटार करते हुए कहा, ”किसी भी गलत सूचना की या गलत सूचना के प्रसार की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए. सभी संबंधित पक्षों को यह ध्यान में रखना चाहिए कि भगवान के प्रति भक्ति केवल शांति और खुशी के लिए है, न कि समाज में संतुलन को बिगाड़ने के लिए.”

अयोध्या से सीधे प्रसारण पर ‘रोक’ : सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, कानून के अनुरूप काम करे तमिलनाडु सरकार

उच्चतम न्यायालय ने तमिलनाडु के प्राधिकारियों से सोमवार को राज्य के सभी मंदिरों में अयोध्या में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह के सीधे प्रसारण पर ”रोक” लगाने के किसी भी मौखिक दिशा निर्देश के आधार पर नहीं बल्कि कानून के अनुसार काम करने को कहा.

न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की पीठ ने अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा समारोह के तमिलनाडु के मंदिरों में सीधे प्रसारण पर रोक लगाने के 20 जनवरी के एक ”मौखिक आदेश” को रद्द करने का अनुरोध करने वाली याचिका पर सुनवाई की और कहा कि कोई भी मौखिक आदेश का पालन करने के लिए बाध्य नहीं है.

पीठ ने तमिलनाडु की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अमित आनंद तिवारी का यह बयान दर्ज किया कि मंदिरों में ‘पूजा-अर्चना’ या अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा समारोह पर कोई पाबंदी नहीं है. उन्होंने कहा कि यह याचिका ”राजनीति से प्रेरित” है. पीठ ने प्राधिकारियों से उन वजहों को रिकॉर्ड में रखने और उन आवेदनों का डेटा बनाए रखने को कहा है जिन्हें मंदिरों में ‘पूजा अर्चना’ और प्राण प्रतिष्ठा समारोह के सीधे प्रसारण के लिए स्वीकृति दी गयी है. साथ ही जिन्हें अनुमति नहीं दी गयी है, उन्हें भी रिकॉर्ड में रखने को कहा है.

पीठ ने याचिका पर तमिलनाडु सरकार से भी 29 जनवरी तक जवाब देने को कहा है. यह याचिका विनोज नामक व्यक्ति ने दायर की है जिसमें उन्होंने कहा है कि तमिलनाडु में द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) सरकार ने राज्य के सभी मंदिरों में अयोध्या में ‘प्राण प्रतिष्ठा’ समारोह के सीधे प्रसारण पर रोक लगा दी है.

यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि सरकार ने इस अवसर पर सभी प्रकार की पूजा और ‘अन्नदानम’ तथा ‘भजनों’ पर रोक लगा दी है.
बहरहाल, तमिलनाडु के हिंदू धर्म और धर्मार्थ धर्मादा मंत्री पी के शेखर बाबू ने रविवार को कहा था कि श्रीराम की पूजा करने पर ऐसा  कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया है. उन्होंने साथ ही कहा कि अन्नदानम और प्रसादम वितरित करने पर भी कोई प्रतिबंध नहीं है. उन्होंने इन दावों को फर्जी बताया.

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