958 आइएएस-आइपीएस की नियुक्ति का रास्ता साफ, सुप्रीम कोर्ट का नया फैसला : माता-पिता के वेतन से तय नहीं होगी क्रीमीलेयर

Author: Navabharat News Group
UPDATED: Fri, 06 Nov 2026 03:07 PM
958 आइएएस-आइपीएस की नियुक्ति का रास्ता साफ, सुप्रीम कोर्ट का नया फैसला : माता-पिता के वेतन से तय नहीं होगी क्रीमीलेयर
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भारतीय प्रशासनिक सेवा और पुलिस सेवा आदि के लिए क्वालिफाई कर चुके 100 युवा पिछले कई साल से अपनी ट्रेनिंग और नियुक्ति का इंतजार कर रहे थे. ये सभी पिछड़ा वर्ग से थे. सरकार के सम्बद्ध प्रशासनिक विभाग ने क्रीमीलेयर के नाम पर इन्हें रोक रखा था.

सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने आज उनके पक्ष में फैसला सुनाया और सरकार की याचिका निरस्त हो गई. केंद्र ने 11 मार्च को दिए गए सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर स्पष्टीकरण मांगा था। उस फैसले में कोर्ट ने कहा था कि अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के किसी अभ्यर्थी का क्रीमीलेयर दर्जा केवल उसके माता-पिता की वेतन से होने वाली आय के आधार पर तय नहीं किया जा सकता। इसके लिए माता-पिता के पदों की श्रेणी पर भी विचार करना जरूरी है।

शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि उसका फैसला इस मामले में शामिल पक्षों पर ही लागू होगा। पहले से तय वरिष्ठता और पदोन्नति के मामलों को दोबारा नहीं खोला जाएगा। लंबित मामलों पर संबंधित अदालतें अपने-अपने तथ्यों और पात्रता के आधार पर फैसला करेंगी। साथ ही, कोर्ट ने अपने फैसले का पालन करने के लिए आठ सप्ताह का और समय दिया है।

पुरानी नियुक्तियों और दाखिलों पर क्या होगा असर?
न्यायमूर्ति पामिदिघंतम श्री नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने केंद्र सरकार के विविध आवेदन पर यह फैसला सुनाया। केंद्र ने आग्रह किया था कि 11 मार्च के फैसले को भविष्य में लागू किया जाए। फैसले की प्रति अभी उपलब्ध नहीं हुई है।

केंद्र सरकार ने फैसले को पुराने मामलों पर लागू करने के संभावित नतीजों को लेकर चिंता जताई थी। उसने कहा था कि इसकी ऐसी व्याख्या से केंद्र सरकार, 18 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पहले ही पूरी हो चुकी भर्तियों और दाखिलों पर असर पड़ सकता है।

केंद्र की याचिका में कहा गया था, पात्रता के बदले हुए मानदंड को पिछली तारीख से या देरी से लागू करने से उन नियुक्तियों और दाखिलों में अनिश्चितता पैदा हो सकती है, जो उस समय लागू नियमों और प्रमाणपत्रों के आधार पर किए गए थे। इससे ओबीसी-एनसीएल दर्जे, वरिष्ठता, सेवा शर्तों और करियर में आगे बढ़ने को लेकर अनिश्चितता पैदा हो सकती है।

सरकार ने आगे कहा था कि इसका असर केंद्रीय और राज्य के शैक्षणिक संस्थानों, विश्वविद्यालयों और व्यावसायिक संस्थानों में दाखिलों पर भी पड़ सकता है। इसलिए आवेदक विनम्रतापूर्वक यह आग्रह करता है कि फैसले को किस समय से लागू किया जाएगा, इस बारे में स्पष्टीकरण दिया जाए। इससे पहले पूरी हो चुकी चयन प्रक्रियाओं, नियुक्तियों और दाखिलों तथा उनसे जुड़े अधिकारों में बदलाव की स्थिति से बचा जा सके।

केंद्र ने किन दो मांगों के लिए मांगा था समय?
केंद्र सरकार ने दो साल का समय मांगा था। इसका उद्देश्य दूसरे संगठनों में मौजूद पदों की सरकारी पदों के बराबर स्थिति तय करना था। इसके लिए संबंधित पक्षों से बातचीत की जानी थी। साथ ही, जहां पदों की बराबरी तय नहीं हुई है, वहां ओबीसी क्रीमीलेयर का दर्जा तय करने के लिए एक समान व्यवस्था बनाने की मांग की गई थी।

केंद्र ने संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की लोक सेवा परीक्षा (सीएसई) 2025 में अनुशंसित 958 अभ्यर्थियों को सेवा आवंटित करने की अनुमति भी मांगी थी। यह मांग स्पष्टीकरण आवेदन पर फैसला आने तक के लिए की गई थी।

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