स्टेंस हत्याकांड: शीर्ष अदालत ने वक्त से पहले रिहाई की दारा सिंह की याचिका पर ओडिशा से जवाब मांगा

नयी दिल्ली. उच्चतम न्यायालय ने 1999 में क्योंझर जिले में ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टुअर्ट स्टेंस और उनके दो नाबालिग बेटों की हत्या के जुर्म में उम्रकैद की सज.ा काट रहे रविंद्र पाल उर्फ दारा सिंह की वक्त से पहले रिहा करने की याचिका पर मंगलवार को ओडिशा सरकार से जवाब मांगा. न्यायमूर्ति हृषिकेश रॉय और न्यायमूर्ति एसवीएन भट्टी की पीठ ने ओडिशा सरकार को नोटिस जारी कर छह सप्ताह के भीतर जवाब देने को कहा.

सिंह के नेतृत्व में भीड़ ने 22-23 जनवरी 1999 की रात्रि को क्योंझर जिले के मनोहरपुर गांव में स्टेंस और उनके दो बेटों- 11 वर्षीय फिलिप और आठ वर्षीय टिमोथी- पर उस समय हमला किया, जब वे अपनी खड़ी गाड़ी में सो रहे थे और फिर वाहन को आग लगा दी.
तिहरे हत्याकांड के मुख्य आरोपी दारा सिंह को 2003 में सीबीआई अदालत ने दोषी ठहराया और मौत की सजा सुनाई. उड़ीसा उच्च न्यायालय ने 2005 में उसके मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदल दिया तथा 2011 में उच्चतम न्यायालय ने भी इसे बरकरार रखा.

सिंह ने विष्णु शंकर जैन के जरिये दायर अपनी याचिका में कहा कि वह 24 साल से जेल में है और उसे अपने कृत्य पर ‘पछतावा’ है जो उसने युवास्था के आवेश में आकर अंजाम दिया था. याचिका में उसने कहा है कि वर्तमान में वह इस न्यायालय से दया की याचना कर रहा है, ताकि वह अपने सेवा-उन्मुख कार्यों के माध्यम से समाज को कुछ दे सके.

उसने राज्य सरकार को यह निर्देश देने का न्यायालय से आग्रह किया कि वह उम्रकैद की सज.ा पाए दोषियों की समय-पूर्व रिहाई पर 2022 में जारी दिशानिर्देशों के तहत उसके तीन मामलों पर विचार करे, जिसमें उसे दोषी ठहराया गया है. याचिका में उसने कहा है कि वह 61 साल को हो गया है और बिना किसी पैरोल के 24 साल से ज्यादा वक्त से जेल में है. उसने कहा कि उसे उसकी मां के निधन होने पर भी पैरोल पर रिहा नहीं किया गया था.

दारा सिंह का साथी महेंद्र हेम्ब्रम भी इस मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहा है, जबकि 11 अन्य आरोपियों को उच्च न्यायालय ने सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था. स्टेंस और उनकी पत्नी ग्लेडिस मयूरभंज इवेंजेलिकल मिशनरी संगठन के साथ काम करते थे और कुष्ठ रोगियों की देखभाल करते थे. ग्लेडिस स्टेंस ने कहा था कि उन्होंने अपने पति और बेटों के हत्यारों को माफ कर दिया है और उनके प्रति उनके मन में कोई कटुता नहीं है. उन्हें 2005 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था.

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