रेलवे में ‘कैंसर ट्रेन’ नाम की कोई ट्रेन नहीं चल रही: केंद्र सरकार

Author: Yogesh Kumar Sahu
UPDATED: Tue, 22 Jul 2025 08:57 PM
रेलवे में ‘कैंसर ट्रेन’ नाम की कोई ट्रेन नहीं चल रही: केंद्र सरकार
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नयी दिल्ली. सरकार ने मंगलवार को बताया कि भारतीय रेलवे में ‘कैंसर ट्रेन’ नाम से किसी ट्रेन का परिचालन नहीं हो रहा है. स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव ने एक प्रश्न के लिखित उत्तर में राज्यसभा को यह जानकारी दी. उनके अनुसार, रेल मंत्रालय ने सूचित किया है कि ‘कैंसर ट्रेन’ नाम की कोई ट्रेन भारतीय रेलवे के तहत नहीं चलाई जा रही है.

मंत्री ने बताया कि केंद्र सरकार देशभर में कैंसर उपचार सेवाओं को सुदृढ़ करने के लिए ‘तृतीयक कैंसर देखभाल सुविधाओं को मजबूत करने’ संबंधी योजना चला रही है. इसके तहत राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को राज्य कैंसर संस्थान (एससीआई) और तृतीयक कैंसर देखभाल केंद्र (टीसीसीसी) की स्थापना के लिए वित्तीय सहायता दी जाती है.

जाधव ने बताया कि प्रति राज्य कैंसर संस्थान के लिए अधिकतम 120 करोड़ रुपये और प्रति तृतीयक कैंसर देखभाल केंद्र के लिए 45 करोड़ रुपये की सहायता दी जाती है. उन्होंने बताया कि अब तक इस योजना के तहत कुल 39 संस्थानों (19 एससीआई और 20 टीसीसीसी) को मंजूरी दी जा चुकी है. इनमें से पंजाब के अमृतसर स्थित सरकारी मेडिकल कॉलेज में एससीआई और फजिल्का के सिविल अस्पताल में टीसीसीसी शामिल हैं.

मंत्री ने बताया कि सरकारी मेडिकल कॉलेज, अमृतसर में रेडियोथेरेपी और कीमोथेरेपी सेवाएं उपलब्ध हैं, जबकि फजिल्का के सिविल अस्पताल में कीमोथेरेपी सेवाएं दी जा रही हैं. उनके अनुसार, परमाणु ऊर्जा विभाग के तहत टाटा मेमोरियल सेंटर ने पंजाब के संगरूर में सिविल अस्पताल परिसर में होमी भाभा कैंसर अस्पताल (एचबीसीएच) और न्यू चंडीगढ़ में होमी भाभा कैंसर अस्पताल एवं अनुसंधान केंद्र (एचबीसीएच एंड आरसी) की स्थापना की है, जो कार्यरत हैं. पंजाब सरकार की मुख्यमंत्री पंजाब कैंसर राहत कोष योजना (एमएमपीसीआरकेएस) के अंतर्गत भी कैंसर उपचार सेवाएं फजिल्का, पटियाला, फरीदकोट और बठिंडा में उपलब्ध कराई जा रही हैं.

‘निष्क्रिय’ इच्छामृत्यु को लागू करना राज्यों की जिम्मेदारी : केंद्र

सरकार ने मंगलवार को राज्यसभा में कहा कि स्वास्थ्य के राज्य का विषय होने के कारण राज्यों की प्राथमिक जिममेदारी है कि वे स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में ‘निष्क्रिय’ इच्छामृत्यु और जीवनकाल हेतु वसीयत को अस्पताल प्रोटोकॉल में शामिल करके लागू करें. स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जे.पी. नड्डा ने एक प्रश्न के लिखित उत्तर में राज्यसभा में कहा कि राज्यों की यह भी ज.म्मिेदारी है कि वे नैतिक सुरक्षा उपाय स्थापित करें.

नड्डा ने उच्चतम न्यायालय के 2018 के एक फैसले के आलोक में स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में ‘नि्क्रिरय’ इच्छामृत्यु को लागू करने के लिए उठाए गए विशिष्ट उपायों को लेकर पूछे गए प्रश्न के उत्तर में यह टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि 2018 के ‘कॉमन कॉज’ बनाम भारत संघ मामले में उच्चतम न्यायालय ने अग्रिम निर्देशों के क्रियान्वयन और ‘निष्क्रिय’ इच्छामृत्यु के कार्यान्वयन के लिये विशिष्ट दिशानिर्देश निर्धारित किए थे. उन्होंने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने ”कॉमन कॉज” बनाम भारत संघ संबंधी विविध आवेदन संख्या 1699 में इन दिशानिर्देशों को क्रियान्वित करने संबंधी प्रक्रिया को 2023 में सरल बनाकर इनमें छूट दी है.

इन संशोधनों का उद्देश्य असाध्य रूप से बीमार रोगियों के लिए सिर्फ जीवित रखने वाले उपचार से इनकार करके सम्मानपूर्वक मृत्यु के अपने अधिकार का प्रयोग करने की प्रक्रिया को अधिक सुलभ बनाना था. नड्डा ने कहा कि ‘स्वास्थ्य’ राज्य का विषय होने के कारण राज्यों एवं केंद्रशासित क्षेत्रों का यह प्राथमिक दायित्व है कि वे स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में ‘निष्क्रिय’ इच्छामृत्यु और जीवनकाल के लिये वसीयत को अस्पताल प्रोटोकॉल में शामिल करके लागू करें. ‘निष्क्रिय’ इच्छामृत्यु में मृत्यु ‘प्राकृतिक’ तरीके से होती है, क्योंकि रोगी को जीवित रखने के लिए आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं रोक दी जाती हैं.

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