अनोखी वैदिक परंपरा को लुप्त होने से बचाने की कोशिश में लगे शिष्य

Author: Yogesh Kumar Sahu
UPDATED: Sun, 31 Jul 2022 08:18 PM
अनोखी वैदिक परंपरा को लुप्त होने से बचाने की कोशिश में लगे शिष्य
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कोट्टायम. तत्कालीन कांची शंकराचार्य चंद्रशेखरेंद्र सरस्वती के समय पर किए हस्तक्षेप ने केरल में सामवेद जप की सदियों पुरानी परंपरा को बचाने में मदद की, जो 1970 के दशक में गायब होने के कगार पर थी. केरल के पूर्व मुख्यमंत्री ई एम एस नंबूदरीपाद के दूर के रिश्तेदार, डॉ. थोट्टम शिवकरण नंबूथिरी ने बताया कि जैमिनीय सामवेद में ऋग्वेद और अन्य स्रोतों से लिए गए 1,700 मंत्रों की एक संगीतमय व्यवस्था है, लेकिन यह लुप्त होने के कगार पर है क्योंकि वर्तमान में दो ही ऐसे लोग हैं जिन्हें जप की इस अनूठी परंपरा के बारे में पूरी जानकारी है.

नंबूथिरी के अनुसार, ऋषि वेदव्यास ने प्राचीन वैदिक मंत्रों को यज्ञ संस्कारों में उनके उपयोग के आधार पर चार भागों में वर्गीकृत किया और अपने चार शिष्यों में से एक शिष्य ऋषि जैमिनि को सामवेद की शिक्षा दी. उनकी पंरपरा का पालन करने वाले लोगों को केरल के सामवेदी कहा जाता है. उन्होंने बताया कि यूनेस्को ने इसे मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया है.

हालांकि, केरल शैली के जैमिनीय सामवेद की जानकारी रखने वाले दो लोगों में से नंबूथिरी (57) ने केरल के एक गांव में ‘गुरुकुलम’ शुरू करके इस अनूठी मौखिक परंपरा को संरक्षित करने के प्रयास शुरू किए हैं. नंबूथिरी ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ”यह 12 साल लंबा प्रयास है. जैमिनीय सामवेद के हजारों मंत्रों का केरल शैली में जप सीखना बहुत कठिन और उबाऊ काम है क्योंकि हमें यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्येक शब्द की ध्वनि अपरिर्वितत रहे.” उन्होंने इस बात पर अफसोस जताया कि इस समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा को स्मृति से बाहर होने से बचाने के लिए केंद्र और राज्य की सरकारों की ओर से कोई प्रयास नहीं किया गया.

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