नयी दिल्ली/न्यूयॉर्क. विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा है कि आत्मनिर्भर भारत से ‘आर्थिक संरक्षणवाद’ का आशय निकालने की गलती नहीं की जानी चाहिए और भारत सहयोग के लिए तैयार है, लेकिन अपनी शर्तों और अपने रणनीतिक तरीकों से. जयशंकर ने यहां विदेश संबंध परिषद में एक परिचर्चा के दौरान कहा, ”यह आज भारत में एक अंतर है. आज हम आत्मनिर्भर भारत की बात कर रहे हैं. कई लोग इसे गलती से आर्थिक संरक्षणवाद समझ लेते हैं. दरअसल, यह समय है जब हम विदेशी निवेश को आमंत्रित करने और विदेशी प्रौद्योगिकी मांगने में बहुत सक्रिय हैं. सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में हमारे पास प्रोत्साहन योजना है.”
उन्होंने मंगलवार को एक प्रश्न के उत्तर में कहा, ”लेकिन हम चाहते हैं कि वे हमारे साथ साझेदारी करें. यह हमारी शर्तों पर किया जाए. इसे उनकी रणनीति का हिस्सा बनाने के बजाय हमारे रणनीतिक रास्ते से किया जाए.” जयशंकर से इस बाबत उनके दृष्टिकोण के बारे में पूछा गया था कि 25 साल पहले पोकरण (जब भारत ने परमाणु परीक्षण किया था) के बाद भारत ने अपना रास्ता कैसे तैयार किया और उनमें से कुछ सबक कैसे उपयोगी रहे, खासकर 5जी और एआई जैसी तकनीक के संबंध में.
संयुक्त राष्ट्र महासभा के 78वें सत्र में शामिल होने यहां आए विदेश मंत्री ने इस बारे में विस्तार से बताया कि भारत कोविड ढांचे के लिहाज से ठीक से तैयार नहीं था और किस तरह उसने समस्या से पार पाया. उन्होंने यह भी कहा, ”एक समय था, जब लोग कहते थे कि आपके 5जी विकल्प या तो चीन अथवा यूरोप हैं. हमें खुद भी आश्चर्य हुआ कि हमने वास्तव में साबित किया है कि हम अपनी खुद की 5जी प्रौद्योगिकी तैयार करने और उसका इस्तेमाल करने में सक्षम हैं.”
अमेरिका कर रहा है ‘बहु-ध्रुवीय विश्व से सामंजस्य ‘ : जयशंकर
विदेश मंत्री सुब्रमण्यम जयशंकर ने कहा कि अमेरिका ‘बहुध्रुवीय विश्व से सामंजस्य’ कर रहा है, भले ही वह इस शब्द का स्वयं इस्तेमाल नहीं करे. ‘काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशन’ में मंगलवार को बातचीत के दौरान जयशंकर ने कहा कि अमेरिका सक्रिय तरीके से उन शक्तियों को आकार देना चाहता है जो ध्रुव (विश्व शक्ति) हो सकते हैं और यह भी आकलन करने की कोशिश कर रहा है कि उक्त ध्रुव की क्या ताकत होगी और उससे अमेरिका को क्या लाभ हो सकता है.
जयशंकर की यह टिप्पणी अमेरिकी वार्ताकारों के साथ द्विपक्षीय वार्ता के लिए 27 से 30 सितंबर के बीच होने वाली उनकी वाशिंगटन यात्रा से पहले आई है. विदेश मंत्री ने कहा कि दुनिया अधिक लोकतांत्रिक हुई है और अधिक सार्वभौमिक तरीके से अवसर प्राप्त हुए हैं. उन्होंने कहा, ”ऐसी परिस्थिति में स्वभाविक है कि उत्पादन और उपभोग के अन्य केंद्र उभरेंगे और विश्व में शक्तियों का पुर्निवभाजन होगा, जो हुआ है.”
जयशंकर ने कहा कि यद्यपि अमेरिका इस शब्द का इस्तेमाल न करे लेकिन वह ‘बहु ध्रुवीय विश्व से सामंजस्य कर रहा है.’ अपने इस दावे को तार्किक करार देते हुए विदेश मंत्री ने कहा, ”इसके कुछ भाग में इराक और अफगानिस्तान के दीर्घकालिक असर शामिल हैं. यह उसका एक महज एक हिस्सा है. इसमें यह भी (शामिल) है कि यदि आप विश्व में अमेरिका के वर्चस्व तथा अन्य के संदर्भ में उसकी ताकत को देखेंगे तो पिछले एक दशक में उसमें बदलाव हुआ है.”
जयशंकर ने कहा, ”संभवत: हम ऐसी दुनिया में प्रवेश कर चुके हैं जहां अमेरिका अब नहीं कह सकता कि मैं केवल अपने साझेदारों के साथ ही काम करूंगा.” उन्होंने कहा कि भारत, ऑस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका की सदस्यता वाला ‘क्वॉड’ यह प्रतिबिंबित करता है.
जयशंकर ने कहा कि क्वॉड में भारत साझेदार देश नहीं है जबकि ऑस्ट्रेलिया और जापान संधि आधारित साझेदार हैं. विदेश मंत्री ने कहा कि इसकी बहुत अधिक संभावना है कि भारत और अमेरिका एक दूसरे के हितों को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं.
उन्होंने कहा, ” अगर अमेरिका दुनिया को देखे और कहे कि क्या प्रतिस्पर्धा है और कहां पर साझेदार (वास्तविक या संभावित) हैं, हम भी वहीं कर रहे हैं, मेरा मानना है कि मतभिन्नता की तुलना में विचारों का मिलना अधिक प्रभावी है.” जयशंकर से प्रश्न किया गया भारत-अमेरिका साझेदारी की सीमा कौन सी हैं. इसके उत्तर में उन्होंने कहा, ”भारत और अमेरिका के सरोकारों को देखेंगे तो आप देखेंगे कि आज की हम एक दूसरे के हितों को आगे बढ़ाने में भूमिका निभा सकते हैं. मेरा मनना है कि इसमें असीम संभावनाएं है जिसको लेकर सहमति है.”
उन्होंने कहा, ”मैं वास्तव में अब यह नहीं देखता कि सीमा कहां हैं. मैं कहूंगा कि वास्तव में अवसर कहां हैं और हम कितनी तेजी से आगे बढ़ सकते हैं? हम कैसे चीजों को आगे ले जा सकते हैं.” जयशंकर ने कहा कि गत पांच वर्ष में ही भारत और अमेरिका के सुरक्षा और राजनीति संबंध बदल गए हैं. उन्होंने कहा कि आज भारत-अमेरिका साझेदारी’ बहुत ही मजबूती से’ से प्रौद्योगिकी पर केंद्रित है.
भारत और अमेरिका को मिलकर काम करने की ‘बहुत सख्त जरूरत’ है: जयशंकर
विदेशमंत्री एस.जयशंकर ने यहां कहा कि भारत और अमेरिका को मिलकर काम करने की ‘बहुत सख्त जरूरत’ है. उन्होंने जोर देकर कहा कि यह अमेरिका के हित में है कि उसके साझेदार ऐसे हों जो उसकी बेहतरी के बारे में सोचते हो एवं बोलता हों. जयशंकर ने यह टिप्पणी न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के सत्र को संबोंधित करने के बाद मंगलवार को ‘विदेश संबंध परिषद’ से बातचीत के दौरान एक सवाल पर की.
विदेशमंत्री बुधवार को वाशिंगटन जाएंगे और अमेरिकी वार्ताकारों के साथ द्विपक्षीय वार्ता करेंगे. उनका कार्यक्रम अपने अमेरिकी समकक्ष एंटनी ब्लिंकन के साथ द्विपक्षीय वार्ता करने के साथ-साथ अमेरिकी प्रशासन, अमेरिकी कारोबारियों और थिंक टैंक से चर्चा करने का भी है.
उन्होंने कहा, ” मुझे लगता है कि आज, भारत-अमेरिका संबंधों को प्रौद्योगिकी पर बहुत दृढ.ता से ध्यान केंद्रित करना होगा. मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि, कई मायनों में, दुनिया में शक्ति का संतुलन हमेशा प्रौद्योगिकी के संतुलन पर कार्य करता है, जिसकी जरूरत आज और भी अधिक तीव्र है. हमारे रोजमर्रा के जीवन पर प्रौद्योगिकी का प्रभाव बहुत व्यापक है.”
भारत अमृत काल में वैश्विक शक्ति भी बनने का प्रयास करेगा : जयशंकर
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि अगले 25 वर्ष में भारत अपने अमृत काल में एक विकसित राष्ट्र बनने का प्रयास करेगा और यह भी ”तर्कसंगत” है कि वह एक वैश्विक शक्ति बनने का भी प्रयास करेगा. जयशंकर ने मंगलवार को यहां विदेश संबंध परिषद में कहा कि भारत अब दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है तो ”जाहिर है कि आपके हित ज्यादा हैं, आपकी जिम्मेदारियां ज्यादा हैं, आपका योगदान ज्यादा है.” उन्होंने कहा, ”आप आज वास्तव में ऐसा भारत देखते हैं जिसके पदचिह्न अधिक हैं, जिसके हित और गतिविधियां अधिक हैं. दूसरा वास्तव में खुद दुनिया की संरचना है. हमने पिछले कुछ वर्षों, शायद चार या पांच वर्षों में कई तरीकों से देखा है, विश्व राजनीति की प्रकृति बदल गयी है.” उन्होंने कहा कि प्रौद्योगिकी और ऊर्जा समेत मुद्दे अब बदल गए हैं.
जयशंकर ने ‘अमृत काल’ के संदर्भ में कहा, ”आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सदी की अगली तिमाही योजना के बारे में बात करते हैं. हमारे पास इसके लिए विशिष्ट भारतीय शब्द है.” उन्होंने कहा, ”हमारा लक्ष्य यह है कि अब से एक चौथाई सदी बाद हमें विकसित देश बनने के लिए प्रयास करना चाहिए. देश का यह लक्ष्य है. लेकिन अगर आप उसके नतीजों पर गौर करें तो मुझे लगता है कि उस चौथाई सदी में यह तर्कसंगत होगा कि हम वैश्विक शक्ति बनने का भी प्रयास करें.”
यह भारत सरकार की नीति नहीं है, विशिष्ट सूचना पर विचार करने के लिए तैयार हैं : जयशंकर
एक खालिस्तानी अलगाववादी की हत्या में भारत की ”संभावित” संलिप्तता के कनाडा के आरोपों के बाद विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि नयी दिल्ली ओटावा को बता चुका है कि यह भारत सरकार की नीति नहीं है तथा वह मामले में ”विशिष्ट” और ”प्रासंगिक” सूचना पर विचार करने के लिए तैयार है. जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र को संबोधित करने के बाद मंगलवार को न्यूयॉर्क में विदेश संबंध परिषद में बातचीत के दौरान ये टिप्पणियां कीं.
कनाडा में 18 जून को खालिस्तानी अलगाववादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में भारत सरकार के ”एजेंटों” की संलिप्तता के कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के आरोपों पर जब जयशंकर से सवाल किया गया कि क्या उन्हें इस पर कुछ कहना है तो उन्होंने कहा, ”हां, मुझे कहना है. हमने कनाडा से जो कहा, उसे मैं आपके साथ बहुत स्पष्टता से साझा करूंगा.”
उन्होंने भारत में अमेरिका के पूर्व राजदूत केनेथ जस्टर के साथ बातचीत के दौरान मुद्दे पर अपनी पहली सार्वजनिक टिप्पणी में कहा, ”पहली बात तो ये कि हमने कनाडाई अधिकारियों को बताया कि यह भारत सरकार की नीति नहीं है. दूसरा, हमने कनाडाई लोगों से कहा कि देखिए, अगर आपके पास कोई खास सूचना है, अगर आपके पास कुछ प्रासंगिक जानकारी है तो हमें बताइए. हम इस पर विचार करने के लिए तैयार हैं.”
जयशंकर ने कहा कि आपको संदर्भ भी समझना होगा क्योंकि इसके संदर्भ के बिना ”तस्वीर स्पष्ट नहीं है.” उन्होंने कहा, ”आपको यह भी समझना पड़ेगा कि पिछले कुछ वर्ष में कनाडा में अलगाववादी ताकतों, संगठित अपराध, हिंसा, चरमपंथ से जुड़े काफी संगठित अपराध देखे गए हैं. इनका आपस में बहुत गहरा संबंध है.” उन्होंने कहा कि भारत ”विशिष्ट जानकारियों और सूचनाओं” के बारे में बात कर रहा है.
भारत और रूस के बीच रिश्ते ‘बहुत ज्यादा स्थिर’: जयशंकर
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि भारत और रूस के संबंध ‘बहुत, बहुत ज्यादा स्थिर’ बने हुए हैं और संबंध ऐसे ही बने रहे, यह सुनिश्चित करने के लिए ‘हम काफी सावधानी बरतते हैं’. विदेशी संबंधों से जुड़ी एक परिषद में बातचीत के दौरान जयशंकर ने मंगलवार को कहा कि फरवरी 2022 में यूक्रेन में युद्ध के कारण रूस के यूरोप तथा पश्चिमी देशों के साथ संबंधों पर ‘इतना गंभीर असर’ पड़ा है कि वह अब वास्तव में एशिया तथा दुनिया के अन्य हिस्सों की ओर हाथ बढ़ा रहा है.
उन्होंने कहा, ”भारत-रूस के रिश्ते वास्वत में बहुत ज्यादा स्थिर हैं.” उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच रिश्ते सोवियत काल और सोवियत के बाद के काल से बने हुए हैं. जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के 78वें सत्र को संबोधित करने के बाद कहा, ”मुझे लगता है कि दोनों देशों में यह समझ है कि एशियाई महाद्वीप की बड़ी शक्तियों के रूप में साथ आने के लिए हमारे पास एक तरह का संरचनात्मक आधार है. इसलिए यह सुनिश्चित करने के लिए हम काफी सावधानी बरतते हैं कि रिश्ते बने रहे.” विदेश मंत्री ने कहा कि रूस ने ऐतिहासिक रूप से अपने आप को यूरोपीय शक्ति के रूप में देखा है, भले ही वह यूरोप और एशिया दोनों में फैला हुआ है.
गलवान झड़प के बाद से भारत-चीन संबंध सामान्य नहीं हैं: जयशंकर
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने यहां कहा कि 2020 में गलवान घाटी में हुई झड़प के बाद से भारत और चीन के बीच संबंध ”सामान्य” नहीं हैं और ऐसा लगता है ये मसला अपेक्षा से ज्यादा लंबा खिंच सकता है. विदेश संबंध परिषद में भारत-चीन संबंधों के बारे में एक सवाल पर उन्होंने कहा कि अगर दुनिया के दो सबसे बड़े देशों के बीच इस हद तक तनाव है, तो इसका असर हर किसी पर पड़ेगा.
जयशंकर ने कहा कि चीन के साथ रिश्ते की खासियत ये है कि वे आपको कभी नहीं बताते कि वे ऐसा क्यों करते हैं. इसलिए आप अक्सर इसका पता लगाने की कोशिश करते रहते हैं और हमेशा कुछ अस्पष्टता रहती है. विदेश मंत्री ने कहा, ”ऐसे देश के साथ सामान्य होने की कोशिश करना बहुत कठिन है जिसने समझौते तोड़े हैं. इसलिए अगर आप पिछले तीन वर्षों को देखें, तो यह सामान्य स्थिति नहीं है.” उन्होंने कहा, ”संपर्क बाधित हो गए हैं, यात्राएं नहीं हो रही हैं. हमारे बीच निश्चित रूप से उच्च स्तर का सैन्य तनाव है. इससे भारत में चीन के प्रति धारणा पर भी असर पड़ा है.”