कृत्रिम बारिश वायु प्रदूषण से निपटने का महंगा उपाय, राहत भी स्थायी नहीं

Author: Yogesh Kumar Sahu
UPDATED: Tue, 19 Dec 2023 08:39 PM
कृत्रिम बारिश वायु प्रदूषण से निपटने का महंगा उपाय, राहत भी स्थायी नहीं
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नयी दिल्ली. क्या कृत्रिम बारिश हवा से प्रदूषकों का बिखराव कर सकती है? उत्तर भारत के ज्यादातर हिस्सों में आसमान साफ हो गया है और प्रदूषण का स्तर ‘गंभीर’ से सुधर कर ‘बहुत खराब’ श्रेणी में पहुंच गया है, लेकिन सवाल यह है कि ‘क्लाउड सीडिंग’ समस्या का दीर्घकालिक समाधान है या नहीं.

वैज्ञानिकों का कहना है कि यह एक आकर्षक संभावना है और इससे ज्यादा कुछ नहीं. उन्होंने बुनियादी समस्या से निपटाने की जरूरत पर जोर दिया. कृत्रिम बारिश काफी खर्चीली है और इससे लगभग 100 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में बारिश कराने के लिए एक करोड़ रुपये का खर्च आने का अनुमान है. इससे मिलने वाली राहत भी स्थायी नहीं होती है.

‘सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर’ में विश्लेषक सुनील दहिया ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ” कृत्रिम बारिश से मिलने वाली राहत अल्पकालिक है… और कुछ समय बाद प्रदूषक हवा में वापस आ जाते हैं, लिहाजा अधिक टिकाऊ समाधानों की जरूरत है.ह्व उन्होंने कहा, ह्ल राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) या उत्तर भारत जैसे बड़े भौगोलिक क्षेत्र में कई दिनों तक कृत्रिम बारिश नहीं कराई जा सकती है और यह बात वायु प्रदूषण कम करने की तकनीक के रूप में इसके उपयोग की संभावना को सीमित करती है.”

‘क्लाउड सीडिंग’ में विमान का उपयोग करके बादलों पर सिल्वर आयोडाइड या क्लोराइड जैसे लवण के कण का छिड़काव किया जाता है. ये लवण के कण नाभिक के रूप में काम करते हैं, जो बादलों के भीतर बर्फ के क्रिस्टल के निर्माण को बढ़ावा देते हैं. इसके बाद, बादलों में मौजूद नमी इन क्रिस्टल से चिपक जाती है, जिससे वर्षा होती है. लंबे समय से चर्चा में रहा यह मुद्दा तब फिर से सुर्खियों में आ गया जब भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान-कानपुर ने दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए ‘क्लाउड सीडिंग’ परीक्षणों में अपनी सफलता की घोषणा की.

आईआईटी कानपुर में टिकाऊ ऊर्जा इंजीनियरिंग में प्रतिष्ठित विशेषज्ञ सच्चिदानंद त्रिपाठी ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया,  “आईआईटी कानपुर के पास ‘क्लाउड सीडिंग’ उपकरण से लैस एक विमान है. विमान करीब चार घंटे तक 10,000 फुट की ऊंचाई तक उड़ सकता है. संस्थान ने लवण का अपना नया ‘सीडिंग सलूशन’ भी विकसित किया है जिसे कृत्रिम बारिश शुरू करने के लिए ‘क्लाउड सीडिंग’ के लिए आजमाया गया है.ह्व उन्हें सेंसर आधारित वायु गुणवत्ता नेटवर्क पर बड़े पैमाने पर शोध कार्य करने के लिए ‘इंफोसेस प्राइज 2023’ से सम्मानित किया गया है.

त्रिपाठी ने कहा कि इस प्रक्रिया के स्थायी प्रभाव की जांच की जा रही है. भारत में ‘क्लाउड सीडिंग’ प्रयोग की सटीक लागत का खुलासा नहीं किया गया है, लेकिन माना जाता है कि लगभग 100 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में बारिश कराने पर एक करोड़ रुपये का खर्च आएगा. यह अनुमान मनिन्द्र अग्रवाल की अध्यक्षता वाली आईआईटी कानपुर टीम ने बताया है. अग्रवाल संस्थान में कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग विभाग में प्रोफेसर हैं.

दिल्ली-एनसीआर में नवंबर और दिसंबर के शुरुआती दिनों में वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 400 के पार दर्ज किया जा रहा था जो स्वीकार्य सीमा से 10 गुणा ज्यादा है. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की वायु गुणवत्ता सूचकांक रिपोर्ट के अनुसार, 18 दिसंबर को दिल्ली में हवा की गुणवत्ता ‘बहुत खराब’ श्रेणी में थी और एक्यूआई 330 था.

दिल्ली के पर्यावरण मंत्री गोपाल राय ने नवंबर में कहा था कि सरकार प्रदूषण के स्तर को कम करने के लिए बारिश कराने वाली तकनीक ‘क्लाउड सीडिंग’ के इस्तेमाल पर विचार कर रही है. पर्यावरण शोधकर्ता कृष्ण अचुताराव के अनुसार, ‘क्लाउड सीडिंग’ के प्रभावी होने के लिए विशिष्ट वायुमंडलीय स्थितियों की जरूरत होती है.

आईआईटी दिल्ली में वायुमंडलीय विज्ञान केंद्र के प्रमुख अचुताराव ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ह्लऐसा नहीं है कि विमान से गए और कुछ डाल दिया और बारिश हो गई. इसके लिए जरूरी स्थितियां तब हासिल करना बहुत मुश्किल है जब वायु प्रदूषण उच्च रहता है, क्योंकि यह स्थितियां बारिश के लिए सही नहीं होती हैं.”

उन्होंने कहा, ह्ल मैंने एक व्यक्ति को यह दावा करते हुए सुना कि ये स्थितियां पश्चिमी विक्षोभ के दौरान उत्पन्न होंगी. लेकिन इस तरह के विक्षोभ के कारण स्वयं बारिश होती है या अगर बारिश न भी हो , तो हवाएं चलती हैं… जिससे वायु प्रदूषण न केवल दिल्ली में, बल्कि उस बड़े क्षेत्र में भी कम हो जाता है जहां विक्षोभ का असर होता है.ह्व पश्चिमी विक्षोभ चक्रवाती तूफान हैं जो ज.मीन पर बनते हैं और ये ज़्यादातर भूमध्यसागरीय क्षेत्र में उत्पन्न होते हैं.

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