नयी दिल्ली. भारत को ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिए हरित ऊर्जा पर बल दिये जाने की आवश्यकता को स्वीकार करते हुए विपक्षी दलों के सदस्यों ने मंगलवार को सुझाव दिया कि सौर एवं पवन ऊर्जा की परियोजनाओं को प्रोत्साहन देने के लिए अधिक सब्सिडी दी जानी चाहिए. नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के कामकाज पर राज्यसभा में हुई चर्चा में भाग लेते हुए विभिन्न विपक्षी दलों के सदस्यों ने यह भी मांग की कि सौर पैनल और पंप लगाने को प्रोत्साहन देने के लिए बैंकों को निर्देश दिया जाए कि वे किसानों को सुगमता से ऋण प्रदान करें.
चर्चा में भाग लेते हुए राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) की फौजिया खान ने कहा कि भारत ने 2070 तक शून्य कार्बन उत्सर्जन की प्रतिबद्धता जतायी है. उन्होंने कहा कि कार्बन उत्सर्जन पर लगाम कसने के मामले में भारत अभी पीछे चल रहा है. उन्होंने कहा कि कार्बन उत्सर्जन पर रोक के लिए नवीन ऊर्जा को अपनाना अति आवश्यक हो गया है. उन्होंने महाराष्ट्र राज्य का उदाहरण देते हुए कहा कि यह नवीन ऊर्जा के उत्पादन में मामले में काफी प्रगति कर सकता है किंतु यह अभी लक्ष्य से पीछे चल रहा है.
खान ने कहा कि सौर ऊर्जा के मामले में हमें योजनाओं के क्रियान्वयन पर ध्यान देना होगा. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री सौर घर योजना निश्चित रूप से लाभकारी है विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों के लिए, क्योंकि वहां बिजली की आपूर्ति काफी अनियमित होती है. उन्होंने कहा कि किसानों को सौर पैनल एवं सौर पंप लगाने के लिए बैंक से ऋण लेना बहुत ही मुश्किल है. उन्होंने सरकार से ‘विनती’ की कि किसानों को आसानी से ऋण देने के लिए वह बैंकों को निर्देश दे अन्यथा यह महत्वपूर्ण योजना कागजों तक ही सिमट जाएगी.
अन्नाद्रमुक सदस्य एम थंबीदुरै ने चर्चा में भाग लेते हुए कहा कि केंद्रीय बजट 2024-25 में नवीन एवं नवीनीकरण ऊर्जा मंत्रालय के लिए 19,100 करोड रूपये आवंटित किए गये हैं. उन्होंने कहा कि उनके प्रदेश तमिलनाडु में पवन ऊर्जा एवं सौर ऊर्जा के उत्पादन की विपुल संभावनाएं हैं. उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की कि दक्षिण के इस राज्य को इन दोनों ऊर्जा की परियोजनाओं को स्थापित करने में प्रोत्साहन देने के लिए अधिक सब्सिडी और प्रोत्साहन राशि दी जानी चाहिए. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के संदोष कुमार पी ने कहा कि हमें अपनी अगली पीढ़ी को स्वच्छ पर्यावरण सौंपना है इसलिए देश को अपने पर्यावरण के लिए बहुत सतर्क रहना पड़ेगा.
उन्होंने सरकार के रुख में विरोधाभास होने का दावा करते हुए कहा कि एक तरफ तो वह नवीन एवं नवीनकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा दे रही है वहीं वह परंपरागत ऊर्जा को भी प्रोत्साहन दे रही है. उन्होंने कहा कि देश में कोयला अधारित नये बिजली संयंत्र शुरू किए जा रहे हैं, ऐसे में वैकल्पिक ऊर्जा को प्रोत्साहन कैसे मिलेगा? संदोष ने मिसाल देते हुए कहा कि बिजली उत्पादन में कोयला आधारित संयंत्रों का योगदान पहले ही 50 प्रतिशत है तथा कोयला आधारित संयंत्रों की क्षमता बढ़ायी जा रही है. उन्होंने कहा, ”हाल में 13.9 जीडब्ल्यू की क्षमता वाला बिजली संयंत्र स्थापित किया गया है…इसका मतलब है कि एक तरफ तो हम कोयले को प्रोत्साहन दे रहे हैं… मुझे संदेह है कि क्या अडाणी समूह हमारी सरकार की बिजली नीति को दिशानिर्देश दे रहा है.”
उन्होंने कहा, ”हाल में अडाणी (समूह) के एक शीर्ष अधिकारी ने कहा था कि भारत आने वाले वर्षों में भी कोयले का आयात जारी रखेगा. वो ऐसा कैसे कह सकते हैं? मैं यही कहना चाहता हूं कि हम कोयला आयात को कैसे बढ़ावा देना जारी रख सकते हैं.” उन्होंने छत पर सोलर पैनल लगाए जाने को प्रोत्साहन देने और उनके लिए सब्सिडी मुहैया कराने का सुझाव दिया. उन्होंने केरल के ‘हाउस बोट’ को सोलर पैनल प्रणाली में तब्दील करने की मांग की जिससे राज्य के पर्यटन को प्रोत्साहन मिल सके. उन्होंने कहा कि राज्य में अभी तक ऐसे ‘हाउस बोट’ डीजल पंप सेट से चल रहे हैं.
असम गण परिषद के वीरेंद्र प्रसाद वैश्व ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में वर्तमान सरकार ने नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा पर पिछले दस वर्ष से जो जोर दिया है, उसके परिणाम अर्थव्यवस्था में स्पष्ट परिलक्षित हो रहे हैं. उन्होंने कहा कि ताप बिजली परियोजनाएं पर्यावरण के लिहाज से ठीक नहीं हैं वहीं पर्वतीय क्षेत्र में स्थित पनबिजली परियोजनाएं भी भूकंप आदि की दृष्टि से सुरक्षित नहीं हैं.
उन्होंने कहा कि छोटी पनबिजली परियोजनाओं को अवश्य प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि जर्मनी जैसे कुछ देश परमाणु बिजली परियोजनाओं से हाथ खींच रहे हैं. उन्होंने कहा कि इन बातों को देखते हुए नवीकरणीय ऊर्जा पर सबसे अधिक ध्यान देने की जरूरत है. वैश्य ने सुझाव दिया कि लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में सौर ऊर्जा परियोजनाओं को प्रोत्साहन देना चाहिए.
शिवसेना की प्रियंका चतुर्वेदी ने चर्चा में भाग लेते हुए कहा कि महाराष्ट्र में एक नया ऊर्जा मॉडल निकला है, जो सत्ता को मजबूत करने का काम करता है. उन्होंने कहा कि यह मॉडल है, ”खोखे लो, धोखे दो मॉडल.” उन्होंने राज्यसभा में दिये गये एक प्रश्न के लिखित जवाब के हवाले से कहा कि महाराष्ट्र में अनुमानित पवन ऊर्जा की क्षमता 98,213 मेगावाट है किंतु राज्य में इसका मात्र पांच प्रतिशत उत्पादन हो रहा है. उन्होंने कहा कि इसी प्रकार राज्य में लघु पनबिजली परियोजनाओं में अनुमानित क्षमता का मात्र 48 प्रतिशत उत्पादन तथा सौर ऊर्जा की अनुमानित क्षमता का मात्र 60 प्रतिशत उत्पादन हो रहा है.
चतुर्वेदी ने कहा कि महाराष्ट्र में पीएम कुसुम योजना के तहत विभिन्न मदों में स्वीकृति के बावजूद जमीन पर कोई काम नहीं हुआ. उन्होंने इसे महाराष्ट्र के साथ अन्याय करार दिया. उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार एक ओर आत्मनिर्भरता की बात करती है वहीं देश में 50 प्रतिशत से अधिक सोलर पैनल का चीन से आयात किया जा रहा है. झारखंड मुक्ति मोर्चा की महुआ माझी ने कहा कि सोलर पैनल को प्रोत्साहन देने के साथ ही इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि इससे पर्यावरण को नुकसान पहुंच सकता है.
उन्होंने कहा कि पनबिजली के लिए बनाये जाने वाले बड़े-बड़े बांधों से लोगों का विस्थापन होता है, वहीं पवन बिजली परियोजनाओं से पक्षियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. उन्होंने सरकार को हरित ऊर्जा को प्रोत्साहन देने के मामले में सतर्कता के साथ आगे बढ़ने का सुझाव दिया.
आईयूएमएल के हारिस बीरन ने कहा कि नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय देश के वर्तमान एवं भविष्य के लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण मंत्रालय है. उन्होंने कहा कि उनके राज्य का कोचीन हवाई अड्डा देश का एकमात्र ऐसा विमानपत्तन है जो सौर ऊर्जा से संचालित है. उन्होंने मांग की कि सरकार को सौर ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए कम से कम 50 प्रतिशत सब्सिडी देनी चाहिए. उन्होंने कहा कि भारत के पास विशाल तटरेखा है और इसका उपयोग पवन ऊर्जा के लिए किया जाए तो हम प्रदूषण उत्पन्न करने वाली ऊर्जा से निजात पा सकते हैं.