पुतिन से ही डीज़ल लेने की डील कर ली ट्रंप ने? कहां त भारत और चीन को धमकी दे रहे थे कि रूस से तेल ले रहे हो तो अमेरिका में सामान बेचोगे तो उसपर 100% टैरिफ़ लगा देंगे, यानी 100% इंपोर्ट ड्यूटी लगा देंगे। मतलब भारत का कोई सामान अगर अमेरिका में बेचा तो उसके दाम अमेरिका में ख़रीदने वाले को डबल देने पड़ेंगे क्योंकि 100% ड्यूटी देनी पड़ेगी अमेरिका की सरकार को। यानी भारत और चीन का सामान इतना महंगा कर देंगे अमेरिका में कि कोई ख़रीदेगा ही नहीं। मतलब सीधा-सीधा भारत और चीन को धमका रहे थे कि क्योंकि आप लोग रूस से तेल ख़रीदकर रूस की कमाई करवा रहे हो तो फिर अमेरिका के बाज़ार में आपका सामान बेचना ही मुश्किल कर देंगे। और ख़ुद ही रूस से डीज़ल लेने की डील कर ली?
कर क्या रहे हैं डॉनल्ड ट्रंप ये समझने की ज़रूरत है। ये कौन से चुनाव होने वाले हैं अमेरिका में जिनसे ट्रंप डरे हुए हैं? और डरे हुए हैं तो क्यों डरे हुए हैं? ये समझने की ज़रूरत है। अमेरिका में 3 नवंबर को चुनाव होने वाले हैं। इन्हें मिडटर्म इलेक्शन कहते हैं। मध्यावधि चुनाव। ये राष्ट्रपति चुनाव नहीं हैं। ट्रंप तो 4 साल के लिए चुने जा चुके हैं। वहां राष्ट्रपति को 4 साल के लिए चुना जाता है। और अभी 2 ही साल हुए हैं उनके कार्यकाल के। दो साल बाक़ी हैं। तो फिर ये कौन से चुनाव हैं? ये वहां की संसद के चुनाव हैं। यहां पब्लिक को ये समझ नहीं आ रहा कि तो क्या वहां राष्ट्रपति के चुनाव अलग होते हैं और संसद के अलग? दो साल पहले जब ट्रंप का चुनाव हुआ था तब संसद के चुनाव नहीं हुए थे?
अमेरिका में सिस्टम थोड़ा अलग है भारत से। राष्ट्रपति का चुनाव हर 4 साल में होता है। वहां की संसद के चुनाव हर 2 साल में होते हैं। संसद को वहां कहते हैं कांग्रेस। हमारे यहां तो पार्टी का नाम है कांग्रेस। वहां संसद को ही कांग्रेस कहते हैं। पार्टियां वहां मुख्य तौर पर दो हैं। एक है डेमोक्रैटिक पार्टी और दूसरी है रिपब्लिकन पार्टी। ट्रंप हैं रिपब्लिकन पार्टी के। पिछले वाले राष्ट्रपति बाइडन जो थे वो डेमोक्रैटिक पार्टी के थे। जब दो साल पहले 2024 में ट्रंप राष्ट्रपति चुने गए थे, उसी समय वहां की संसद यानी कांग्रेस के चुनाव भी हुए थे। और वहां राष्ट्रपति के लिए अलग वोट पड़ता है और अपना सांसद चुनने के लिए अलग। मतलब जैसे हमारे यहां तो अपने सांसद के लिए वोट करते हैं लोग और सांसद फिर प्रधानमंत्री चुनते हैं अपने में। वहां ऐसा नहीं है। तो ऐसा भी हो जाता है वहां पर कि संसद में एक पार्टी के सांसद ज़्यादा हो जाएं, लेकिन राष्ट्रपति दूसरी पार्टी का चुन लिया जाए।
अमरीाक में भी संसद में दो सदन हैं। जैसे हमारे यहां लोक सभा और राज्य सभा हैं। तो लोक सभा की तरह वहां हाउस ऑफ़ रेप्रेज़ेंटेटिव्ज़ है, इसको शॉर्ट में सिर्फ़ ‘हाउस’ भी कहते हैं। और राज्या सभा की तरह एक सदन है जिसको कहते हैं सेनेट। लोक सभा जैसा जो हाउस ऑफ रेप्रेज़ेटेटिव्ज़ है, जिसको हाउस भी कहते हैं, उसकी सभी सीटें हर 2 साल में खाली होती हैं, इसलिए 2024 में भी उसकी सब सीटों के लिए चुनाव हुए थे। अब फिर हो रहे हैं। और सेनेट की लगभग एक-तिहाई सीटों के लिए भी उसी साल चुनाव हुए थे। यानी राष्ट्रपति चुनाव वाले साल में राष्ट्रपति और कांग्रेस, दोनों के चुनाव साथ-साथ होते हैं। तो ‘मिडटर्म’ क्या है? बीच में दो साल बाद फिर कांग्रेस के चुनाव होते हैं और तब राष्ट्रपति का चुनाव नहीं होता। सिर्फ कांग्रेस के चुनाव होते हैं। इन्हें मिडटर्म इलेक्शन कहते हैं। यानी अभी सिर्फ कांग्रेस के चुनाव हो रहे हैं, राष्ट्रपति नहीं बदलने वाला। फिर 2028 में फिर से राष्ट्रपति और कांग्रेस दोनों के चुनाव होंगे।
कांग्रेस में दो सदन हैं, हाउस और सेनेट। ये लोग क़ानून बनाते हैं और बजट पास करते हैं। अभी ट्रंप की पार्टी, रिपब्लिकन पार्टी का इन दोनों सदनों पर कंट्रोल है। मतलब राष्ट्रपति भी रिपब्लिकन पार्टी का और सरकार भी रिपब्लिकन पार्टी की। लेकिन संसद का चुनाव जो वहां बीच में 2 साल पर फिर से हो जाता है तो उससे हर राष्ट्रपति को ये ख़तरा बना रहता है कि कहीं संसद में उनकी विरोधी पार्टी ना जीत जाए। क्योंकि ऐसा हो जाता है तो राष्ट्रपति की मर्ज़ी के क़ानून बनाने पर ही अड़ंगा लग जाता है। मतलब फिर विपक्ष के साथ मिल कर काम करना पड़ता है। मनमानी की आज़ादी ख़्तम हो जाती है। और ट्रंप तो जिस तरीक़े से काम कर रहे हैं, कभी कुछ करते हैं कभी कुछ, बोलते कुछ हैं करते कुछ हैं, तो अगर काग्रेस के चुनाव में ट्रंप की पार्टी हार गई तो ट्रंप के लिए आगे काम करना मुश्किल हो जाएगा।
अगर ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी हार गई, तो दो चीज़ें हो सकती हैं, या तो हाउस में हार जाएं या हाउस और सेनेट, मतलब जैसे लोक सभा और राज्य सभा, दोनों में बहुमत चला जाए। अभी रिपब्लिकन पार्टी का दोनों पर कंट्रोल है। ज़्यादा संभावना इस बात की है कि हाउस में ट्रंप की पार्टी की हार हो जाए। ऐसा हो गाय तो ट्रंप के लिए क़ानून बनाना बहुत मुश्किल हो जाएगा। बजट, टैक्स, नए बिल, कुछ भी आसानी से पास नहीं करवा सकेंगे वो। ज़्यादातर काम अटक सकता है। विपक्षी पार्टी ट्रंप सरकार की जांच के आदेश भी दे सकती है। लेकिन राष्ट्रपति पद से उनको हटाना मुश्किल है। हाउस उनके ख़िलाफ़ महाभियोग चला सकता है, लेकिन हटाने के लिए सेनेट में 2/3 बहुमत चाहिए, जो आमतौर पर नहीं मिलता। क्योंकि सेनेट के चुनाव हर दो साल में नहीं होते। सेनेट के सदस्य चुने जाते हैं 6 साल के लिए। और हर दो साल में एक-तिहाई सदस्यों के चुनाव होते हैं। तो अब भी सेनेट की एक-तिहाई सीटों के चुनाव होंगे।
इसलिए सेनेट में दो-तिहाई बहुमत अभी हो जाए विपक्ष का, ये मुश्किल लगता है। लेकिन अगर ट्रंप की पार्टी ने सेनेट में बहुमत खो दिया, जो मुश्किल लग रहा है, लेकिन अगर हो गया तब तो और ज़्यादा मुश्किलें हो जाएंगी ट्रंप के लिए। क्योंकि फिर वो जज, मंत्री और अन्य महत्वपूर्ण नियुक्तियां आसानी से नहीं कर पाएंगे। विपक्ष उन्हें रोक सकता है। पूरी संसद ही ट्रंप के खिलाफ हो जाएगी अगर दोनों सदनों में बहुमत नहीं रहा तो। हालांकि अमेरिका में राष्ट्रपति के पास फिर भी काफ़ी पावर रहती है। वो अकेले कई फैसले कर सकतें हैं बिना संसद के भी। विदेश नीति चला सकते है, सेना संबंधी कुछ काम कर सकते हैं। लेकिन पैसे पर, बजट पर कांग्रेस का कंट्रोल होता है। बिना कांग्रेस के बड़ी योजनाएं चलाना मुश्किल हो जाता है। इसलिए ट्रंप परेशान चल रहे हैं आजकल। ईरान पर युद्ध तो छेड़ दिया लेकिन अमेरिका में डीज़ल और पेट्रोल की क़ीमतें बहुत ज्यादा हो गई हैं।
कई वजहें हैं इसकी। ईरान वाला युद्ध हो गया, समुद्री रास्तों में दिक्कतें आ गईं, ऊपर से यूक्रेन ने रूस की तेल रिफ़ाइनरियों पर हमले कर दिए। सऊदी अरब पर हुथी लड़ाके हमले कर रहे हैं। इससे दुनिया भर में डीज़ल की कमी हो रही है। अमेरिका में किसान और ट्रक से माल ढोने वाले ट्रांस्पोर्टर डीज़ल बहुत इस्तेमाल करते हैं। कीमतें आसमान छू रही हैं तो उनके ख़र्चे बढ़ गए हैं। और ये लोग ट्रंप का बड़ा वोट बैंक माने जाते हैं। लेकिन महंगाई और डीज़ल की क़ीमतें देखकर लोग ट्रंप और उनकी पार्टी से नाराज़ चल रहे हैं। अपनी पर आई तो ट्रंप ने पूरी पल्टी ही मार दी। पुतिन को ही फ़ोन घुमा दिया। कि डीज़ल दे दो। ट्रंप अगर पत्ते फेंटने में माहिर हैं तो पुतिन हैं शतरंज के खिलाड़ी। वो तो जैसे इंतज़ार में ही बैठे थे कि ऊंट पहाड़ के नीचे आएगा ही। अपनी पर आई तो अमेरिका ने रूस पर लगे प्रतिबंध ही हटा दिए कुछ टाइम के लिए, ताकि उससे डीज़ल ले सकें। ट्रंप दलील दे रहे हैं कि ये तो दुनिया भर में डीज़ल की सप्लाई बढ़ाने के लिए उन्होंने किया है। लेकिन असल वजह तो सब जान रहे हैं। पॉलिटिशियन आख़िर पॉलिटिशियन ही होता है। बाप बड़ा ना भैया, जब मझधार में हो चुनाव की नैया। सौ बात की एक बात।