जातीय आधार पर निर्भर राजनीतिक दल देश के लिए खतरनाक: उच्चतम न्यायालय

Author: Yogesh Kumar Sahu
UPDATED: Tue, 15 Jul 2025 09:48 PM
जातीय आधार पर निर्भर राजनीतिक दल देश के लिए खतरनाक: उच्चतम न्यायालय
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नयी दिल्ली. उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि जातीय आधार पर निर्भर राजनीतिक दल देश के लिए समान रूप से खतरनाक हैं. इसी के साथ उसने ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) का पंजीकरण रद्द करने के अनुरोध वाली याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया.

न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि एआईएमआईएम के संविधान के अनुसार, इसका उद्देश्य अल्पसंख्यकों सहित समाज के हर पिछड़े वर्ग के लिए काम करना है, जिसका संविधान में भी उल्लेख है. पीठ ने याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील विष्णु शंकर जैन से कहा, “पार्टी का कहना है कि वह समाज के हर पिछड़े वर्ग के लिए काम करेगी, जिनमें अल्पसंख्यक समुदाय के लोग और मुस्लिम भी शामिल हैं, जो आर्थिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हैं. हमारा संविधान भी यही कहता है. संविधान के तहत अल्पसंख्यकों को कुछ अधिकारों की गारंटी दी गई है और पार्टी के राजनीतिक घोषणापत्र या संविधान में कहा गया है कि वह संविधान के तहत दिए गए उन अधिकारों की सुरक्षा के लिए काम करेगी.” पीठ ने जैन से दिल्ली उच्च न्यायालय के उस आदेश के खिलाफ दायर याचिका वापस लेने को कहा, जिसमें एआईएमआईएम को निर्वाचन आयोग से मिले पंजीकरण और मान्यता को चुनौती देने वाली रिट याचिका को खारिज कर दिया गया था.

उसने याचिकाकर्ता को रिट याचिका दायर करने की स्वतंत्रता दी, जिसमें वह विभिन्न मुद्दों पर राजनीतिक दलों के संबंध में सुधारों के लिए व्यापक प्रार्थना कर सकता है. शीर्ष अदालत ने कहा, “आपकी यह बात सही हो सकती है कि कुछ ऐसे क्षेत्र हैं, जहां शपथपत्र देने के बाद भी कोई पार्टी या पार्टी उम्मीदवार ऐसे अभियान में शामिल हो सकता है, जिससे धार्मिक भावनाएं भड़क सकती हैं, लेकिन इसके लिए घटना को उचित मंच के संज्ञान में लाया जा सकता है.”

उसने कहा, “कुछ राजनीतिक दल जातिगत आधार पर निर्भर हो सकते हैं, जो देश के लिए उतना ही खतरनाक है. इसकी अनुमति नहीं है. इसलिए आप एक निष्पक्ष याचिका दायर कर सकते हैं, जिसमें किसी विशिष्ट राजनीतिक दल या व्यक्ति पर आरोप न लगाया जाए और सामान्य मुद्दे उठाए जाएं. इसे हमारे संज्ञान में लाएं और हम इस पर ध्यान देंगे.” याचिकाकर्ता तिरुपति नरसिम्हा मुरारी का प्रतिनिधित्व करने वाले जैन ने कहा कि एआईएमआईएम का यह भी कहना है कि वह मुसलमानों के बीच इस्लामी शिक्षा को बढ़ावा देगा और शरीया कानून का पालन करने के लिए सामान्य जागरूकता पैदा करेगा.

न्यायमूर्ति सूर्य कांत ने कहा, “तो इसमें गलत क्या है? इस्लामी शिक्षा देना गलत नहीं है. अगर ज्यादा से ज्यादा राजनीतिक दल देश में शैक्षणिक संस्थान स्थापित करें, तो हम इसका स्वागत करेंगे. इसमें कुछ भी गलत नहीं है.” जैन ने दलील दी कि यह भेदभाव है. उन्होंने दावा किया कि अगर वह हिंदू नाम से राजनीतिक दल पंजीकृत कराने के लिए निर्वाचन आयोग का रुख करते हैं और यह हलफनामा देते हैं कि वह वेद, पुराण और उपनिषद पढ़ाना चाहते हैं, तो उनका आवेदन अस्वीकार कर दिया जाएगा.

पीठ ने कहा, “अगर निर्वाचन आयोग वेद, पुराण, शास्त्र या किसी भी धार्मिक ग्रंथ की शिक्षा के खिलाफ ऐसी कोई आपत्ति उठाता है, तो कृपया उचित मंच के संज्ञान में लाएं. कानून इस पर गौर करेगा. हमारे पुराने ग्रंथों, पुस्तकों, साहित्य या इतिहास को पढ़ने में कुछ भी गलत नहीं है. बिल्कुल, कानून के तहत कोई प्रतिबंध नहीं है.” न्यायमूर्ति सूर्य कांत ने जैन से कहा कि अगर कोई राजनीतिक दल कहता है कि वह छूआछूत को बढ़ावा देगा, तो यह पूरी तरह से अपमानजनक है और इसे समाप्त कर प्रतिबंधित किया जाना चाहिए, लेकिन अगर संविधान किसी धार्मिक कानून की रक्षा करता है और पार्टी कहती है कि वह लोगों को यह सिखाना चाहती है, तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है.

उन्होंने कहा, “मान लीजिए कि कोई धार्मिक कानून संविधान के तहत संरक्षित है और एक राजनीतिक दल कहता है कि हम उस कानून को पढ़ाएंगे, तो उन्हें पढ़ाने की अनुमति दी जाएगी, क्योंकि यह संविधान के तहत संरक्षित है. यह संविधान के ढांचे के भीतर है और आपत्तिजनक नहीं है.” दिल्ली उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने एआईएमआईएम के पंजीकरण और मान्यता को चुनौती देने वाली याचिका को 16 जनवरी को खारिज कर दिया था. उसने कहा था कि पार्टी कानून के तहत अनिवार्य सभी आवश्यकताओं को पूरा करती है.

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