छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने पूर्व ‘सलवा जुडूम’ कर्मियों से जुड़े एक महत्वपूर्ण सेवा मामले की सुनवाई करते हुए छत्तीसगढ़ राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है। इन कर्मियों को बाद में छत्तीसगढ़ सशस्त्र पुलिस बल में शामिल कर लिया गया था। याचिका में उनकी सेवा शर्तों, समानता के अधिकार और लंबे समय से चले आ रहे भेदभाव के आरोपों से जुड़े अहम सवाल उठाए गए हैं।
याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व संयुक्त रूप से भारत के सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता फतेश कुमार साहू और छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के अधिवक्ता विद्याभूषण सोनी कर रहे हैं। याचिकाकर्ताओं की ओर से, पूर्व ‘सलवा जुडूम’ कर्मियों की सेवा शर्तों, उनके साथ कथित भेदभावपूर्ण व्यवहार, और समानता तथा निष्पक्ष व्यवहार सुनिश्चित करने की आवश्यकता से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए गए हैं। पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, माननीय उच्च न्यायालय ने छत्तीसगढ़ राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है और उन्हें छह सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
अब गेंद राज्य सरकार के पाले में है। जवाब दाखिल किए जाने के बाद, यह मामला सुनवाई के अगले चरण में आगे बढ़ेगा। नोटिस जारी होना न्यायिक प्रक्रिया का एक हिस्सा है और मामले पर आगे विचार करने के बाद ही न्यायालय द्वारा अंतिम निर्णय लिया जाएगा।
जानते चलें कि सलवा जुडूम नक्सल-विरोधी एक आंदोलन था, जो 2005 के आसपास छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में शुरू हुआ था। इसमें बड़ी संख्या में स्थानीय आदिवासी ग्रामीण और युवा शामिल थे। इस आंदोलन से जुड़े कुछ युवाओं को ‘विशेष पुलिस अधिकारी’ (SPO) के रूप में नियुक्त किया गया था। 2011 में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने नक्सल-विरोधी सशस्त्र अभियानों में SPOs के इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी। इसके बाद, ‘सलवा जुडूम’ से जुड़े कुछ कर्मियों को छत्तीसगढ़ सशस्त्र पुलिस बल में शामिल कर लिया गया। वर्तमान सेवा मामला इन कर्मियों के सेवा अधिकारों, मिलने वाले लाभों और समानता से जुड़े सवालों पर केंद्रित है।
याचिकाकर्ताओं ने न्यायालय से अनुरोध किया है कि उनके सेवा-संबंधी अधिकारों और हकदारियों पर उचित विचार किया जाए, और उनके साथ हुए कथित ऐतिहासिक भेदभाव का न्यायपूर्ण समाधान निकाला जाए। इस मामले के संवैधानिक महत्व को रेखांकित करते हुए, याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ताओं ने जोर दिया है कि यह मुद्दा केवल सेवा लाभों तक सीमित नहीं है। इसका संबंध भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 में निहित ‘कानून के समक्ष समानता’ और ‘सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता’ के सिद्धांतों से भी है।