भारत में वन कार्बन सिंक कमजोर हो रहे हैं, वनों की गुणवत्ता बढ़ाना महत्वपूर्ण: रमेश

Author: Yogesh Kumar Sahu
UPDATED: Sun, 13 Jul 2025 07:31 PM
भारत में वन कार्बन सिंक कमजोर हो रहे हैं, वनों की गुणवत्ता बढ़ाना महत्वपूर्ण: रमेश
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नयी दिल्ली. पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने रविवार को एक अध्ययन का हवाला दिया, जो पुष्टि करता है कि वर्तमान और भविष्य के जलवायु परिवर्तन परिदृश्यों में भारत में वन कार्बन सिंक कमजोर हो रहे हैं. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि वनों की गुणवत्ता बढ़ाने के साथ-साथ उनकी सुरक्षा करना भी अत्यंत महत्वपूर्ण है. कांग्रेस महासचिव ने कहा कि ”ग्लोबल वार्मिंग” और जलवायु परिवर्तन के युग में वनों को बहुत महत्व दिया गया है, क्योंकि वे प्राकृतिक कार्बन सिंक हैं.

रमेश ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, “अब आईआईटी (भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान)-खड़गपुर के दो वैज्ञानिकों ने एक विस्तृत रिमोट सेंसिंग-आधारित अध्ययन प्रकाशित किया है, जो इस बात की पुष्टि करता है कि वर्तमान और भविष्य के जलवायु परिवर्तन परिदृश्यों के कारण भारत में वन कार्बन सिंक कमज.ोर हो रहे हैं. वनों की गुणवत्ता बढ़ाना और उनका संरक्षण करना अत्यंत महत्वपूर्ण है.” उन्होंने कहा कि हरियाली का मतलब स्वत? ही कार्बन अवशोषण नहीं होता.

रमेश ने कहा, “भारत के जैव विविधता से भरपूर प्राकृतिक वन गंभीर खतरे में हैं. हम पूरी तरह से इस गलत धारणा पर अड़े हुए हैं कि प्रतिपूरक वनीकरण, योजनाबद्ध तरीके से वनों के कटाव और अच्छी गुणवत्ता वाले वन नुकसान की भरपाई कर सकता है.” उन्होंने दावा किया कि वन क्षेत्र के रूप में दर्ज किए गए आधे से ज़्यादा क्षेत्र “वास्तव में क्षरित और खराब गुणवत्ता वाले वन” हैं. रमेश ने ‘भारत में वर्तमान और भविष्य के जलवायु परिवर्तन परिदृश्यों में पारिस्थितिकी तंत्र की प्रकाश संश्लेषण क्षमता में गिरावट के कारण वन कार्बन भंडार का कमज.ोर होना’ शीर्षक वाले लेख का लिंक भी साझा किया.

एसओ2 उत्सर्जन नियमों में छूट देने का सरकार का फैसला गलत आधारों पर आधारित है: जयराम रमेश

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सरकार की ओर से लगभग 78 प्रतिशत कोयला आधारित संयंत्रों को प्रमुख प्रदूषण रोधी प्रणालियां लगाने से छूट दिए जाने पर रविवार को कहा कि पर्यावरण मंत्रालय की इस नीति के पीछे की दलील ‘गलत आधार’ पर आधारित है. उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों (एनएएक्यूएस) में संशोधन के अभाव में सरकार की नीति बनाने की प्रक्रिया “त्रुटिपूर्ण” रहेगी.

केंद्र सरकार ने एक बार फिर कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्रों के लिए सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जन मानदंडों का अनुपालन करने की समय सीमा बढ़ा दी है और अत्यधिक प्रदूषित क्षेत्रों या दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों से दूर स्थित संयंत्रों को इससे पूरी तरह छूट दे दी है.

रमेश ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कटाक्ष करते हुए कहा, “मोदी सरकार ने पहले ही भारत को सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जन में वैश्विक नेता बनाने का गौरव हासिल कर लिया है. अब हमें पता चला है कि पर्यावरण मंत्रालय ने भारत के 78-89% ताप विद्युत संयंत्रों को सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कटौती करने वाले फ्लू गैस डिसल्फराइजेशन (एफजीडी) सिस्टम लगाने से छूट दे दी है.” कांग्रेस महासचिव ने कहा कि एफजीडी सिस्टम लगाने की समय सीमा पहले 2017 निर्धारित की गई थी, जिसे कई बार आगे बढ़ाया जा चुका है. रमेश ने कहा कि सल्फर डाइऑक्साइड (एसओ2) जन स्वास्थ्य के लिए सीधा खतरा है और यह बादलों के बनने की प्रक्रिया भी प्रभावित करती है, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा कहा जाने वाला मानसून प्रभावित होता है.

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